मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

बचपन की कुछ स्मृतियाँ : बरास्ते अम्बेडकर
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कहते हैं न! बचपन में जो संस्कार पड़ जाते हैं वे जल्दी पीछा नहीं छोड़ते। और यह संस्कार सिर्फ अपना परिवार ही नहीं देता बल्कि गाँव, गली-मोहल्ले, स्कूल, मित्र-मंडली, रिश्तेदार, बाजार सब इसे मिलकर बनाते हैं। मुझमें भी वे संस्कार पड़े और निसंदेह आज भी उनका कुछ न कुछ असर जरूर होगा मेरे अंदर। ख़ैर...


‌बचपन गुजरा ये समझने में कि मैं कुछ अलग हूँ सबसे। खासकर अन्य जातियों से। कोई बाबा कहता, कोई पंडित जी तो कोई कभी-कभी पंडितवा भी कह देता। पापा की किराने की एक दुकान थी जो थी तो चौराहे पर लेकिन दलित बस्ती के मुहाने पर थी। जब भी वहाँ होता उस बस्ती के अधिकांश लोग , यहाँ तक कि हमउम्र लड़के भी कहते -बाबा इ समान देइदा, बाबा एतना उ समान देइदा। कुछ दिन तो झेंपा फिर सामान्य हो गया क्योंकि गाँव में ऐसा उतना माहौल नहीं था। रहेगा भी कैसे मैं इस वर्ग से मुखातिब ही कितना हुआ था। मजदूर जब खेत में लगते तो तब थोड़ा मिलना होता वो भी मेरी पहचान होती - फलाने बाबा, पण्डित बाबा के पोता या बेटवा। यही मेरी पहचान होती। जब सीधे मुझसे बात करनी होती तो वे मुझे बबुआ या पंडित बाबा या छोटका पंडित कहते। मैं तब बहुत खुश होता। इस वर्ग के कुछ लोग जब मिलते तब मुझे चिढ़ाते थे - पांइलागी पंडित बाबा। चिढ़ाना इसलिए कि मैं कोई जवाब, कह लें तो तथाकथित आशीर्वाद, नहीं देता था। एक तो ऐसे थे कि जब तक मैं उनको एक लंबा चौड़ा आशीर्वाद नहीं दे देता, पीछा नहीं छोड़ते थे। दिन में अगर चार बार मिले तो चारो बार वही। मैं उन्हें देखकर रास्ता बदलने लगा था। गाँव में किसी के यहाँ झगड़ा होता तो लोग कहते "का चमरउट बना दिहले हया।" अहिर(यादव जाति) मेरे लिए बैलबुद्धि वाले लोग थे जिनकी बुद्धि दिन के बारह बजे के बाद खुलती थी। शरीर या कपड़े की गंदगी चमार या मुसहर होने की प्रतीक थी। कोहार(कुम्हार जाति) गड़कटे थे। घर से किसी काम से निकलते वक्त अगर उनका मुँह देख लिए तो शर्तिया काम नहीं होगा, ऐसा कहते थे। मुझे बार-बार ये महसूस कराया गया कि तुम अलग हो। जैसे - किस जाति के यहाँ पूड़ी खाने जानी है किस जाति के यहाँ नहीं। कुछ बड़े होने तक भर (राजभर जाति) के यहाँ तेरही में हमारी पहुँच होने लगी। और बाद में कुछ चमारों के यहाँ से भी तेरही के निमंत्रण की खबर मिली, लेकिन कोई नहीं गया। हाँ शादी-विवाह में नेवता करने हम जैसे बच्चे या घर के बड़े-बूढ़े भेजे जाते, जिसमें इतना ध्यान रखना होता कि वहाँ कुछ खाना-पीना नहीं है। नेवता लिखाते समय जो जलपान के तौर पर मिठाई मिलती उसे घर लाकर खाना होता। वो भी घर के बाहर सिर्फ बच्चों का ही दायित्व था कि वे ही मिठाई खायें, घर के सदस्य उसे छूते न थे। ऐसे ही मुसलामानों के यहाँ से जो मिठाईयाँ बैने के रूप में आती उसे भी केवल बच्चे ही खाते। शायद बच्चों को कम छूत लगता रहा हो। हम उस दिन बड़े उत्साहित रहते जिस दिन मिठाई मिलने की जुगत रहती।

इधर मेरे घर पर यदि किसी दिन चमार या मुसलमान को चाय या खाना खिलाना होता तो जो हम खाते-पीते वही उन्हें भी परोसा जाता बशर्ते उनके लिए अलग बर्तन निकाले गये थे। पापा के कुछ ऐसे मुसलमान दोस्त थे जो लगभग रोज आकर बैठ जाते और घण्टों उनके साथ देश-दुनिया, नात-रिश्तेदार और तमाम तरह के खोज-खबर लेते रहते। यहाँ तक कि उनके नात-रिश्तेदार मेरे हो गये थे और मेरे उनके। शादी-विवाह, तीज-त्यौहार में वे हमेशा साथ होते और हम भी रहते। आवाजाही दोनों तरफ लगी रहती। लेकिन घर में बर्तन मुसलमानों के लिए काँच या चीनी मिट्टी के होते, वहीं चमारों के लिए घर के परित्यक्त स्टील के बर्तन। ये स्टील के बर्तन भी दो तरह के रहते। एक तो वे रहते जो निरंतर उपयोग के क्रम में चिटक गये होते। वहीं दूसरी श्रेणी में वे बर्तन आते जो रहते तो बहुत अच्छे लेकिन किसी के भूलवश वे उनसे कभी छुआ गये होते। एक बार जब मैं शायद आठवीं-नौंवी क्लास में रहा हूंगा तब मेरे अंदर एक क्रांति जागी थी। हुआ यूँ था कि घर के सामने हम लोग दिन भर मैच खेलते रहते। जिसमें मुख्यतः बाभन और मुस्लिम बच्चों की जमात ही रहती क्योंकि वह स्थान दोनों समुदायों के निवासस्थान के बीच में स्थित था। मैच चल रहा था और दोपहर हो गयी थी। हमारी टीम में हमारा मुस्लिम साथी बहुत अच्छा खेल रहा था और खूब रन बना रहा था। गर्मी के कारण उसे प्यास लगी और मैं तुरंत अपने घर में से एक लोटा ठंडा पानी लेकर आया। मैंने जानबूझकर लोटा उसे थमा दिया और वह गटगटाकर पूरा पानी पी गया। लोटे को वापस घर में रखकर मैं फिर खेलने में मशगूल हो गया। उस दिन के बाद बहुत दिनों तक वह लोटा मुझे नहीं दिखा घर में। एक दिन भूसा उतारने के लिए जब कोठे पर चढ़ा था तब वह लोटा वहाँ फेंका हुआ मिला। मैं बहुत खुश होकर उस लोटे को लेकर मम्मी के पास गया और कहा कि 'देखो! ये लोटा पता नहीं कौन कोठे पर फेंक दिया है। मैं कितने दिन से इसे ढूँढ रहा था।' मम्मी ने उस दिन मुझे पानी पिलाते हुए देख लिया था और मुझे बिना डाँट लगाये लोटे को अपने बासन से निष्काषित कर दिया था। मम्मी को मैंने बहुत समझाया था कि ऐसा कुछ नहीं होता कि किसी के छूने से कुछ अपवित्र हो जाये। लेकिन घर का बहुमत मेरे खिलाफ निकला और वह लोटा कई सालों तक उसी कोठे पर पड़ा रहा। एक दिन जब उसे एक मजदूर को रस पिलाने के लिए उतारा गया तो उसमें एक बहुत बारीक छेद हो गया था। मम्मी कहती थी कि "एहके बिच्छी मार देहे हव"। फिर कुछ दिन के बाद उसको बर्तनवाले से बदलकर कुछ नया बर्तन ले लिया।

स्कूल के दिनों में दो भाई मिले। जो चमार थे और हमारे पड़ोस के गाँव के थे। उन्हें चमार इसलिए भी कह रहा हूँ क्योंकि वे अपने को गर्व से चमार कहते थे। अंबेडकर को वे जानते थे और प्रत्येक अंबेडकर जयंती पर किसी न किसी कार्यक्रम में वे पुरस्कृत होते थे। लेकिन वे हिंदू देवी-देवताओं को खूब देशिया गाली देते। मैं इसी को लेकर उनसे झगड़ भी जाता। यहीं से अंबेडकर के प्रति एक नफरत भरा लगाव होना चालू हुआ। मेरा समुदाय उसमें घी का काम किया। खैर! वे शुरू से ही संस्कृत नहीं पढ़ते थे उसकी जगह उन्होंने उर्दू विषय चुना था। मैं उनसे अक्सर ही कहता -'तुम लोग मुस्लिम हो बे! जो संस्कृत छोड़कर उर्दू पढ़ते हो। ' वे हँसते और एक पगाड़ हम अपने अपने बुद्धि को गेंद बनाकर लोकउवल खेल लेते। चमार परिवार से होने के बावजूद उनका घर मेरे पूरे गाँव से ज्यादा शिक्षित और अग्रगामी सोच वाला था। उसके घर में डॉक्टर, अध्यापक और समाजसेवी थे। इधर हमारा छोटा सा गाँव अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बनने वाला था। हजार आदमी के आबादी से भी कम वाले हमारे दंभी गाँव में न तो कोई वकील था, न डॉक्टर, न शिक्षक। कोई ढंग का पढ़ा-लिखा भी नहीं। जब तक हम साथ में रहे हमारी खूब जमीं। हम एक ही बेंच पर बैठते और टीचरों के सवालों के जवाब देने में पहले नंबर पर रहते।

अब आज की अंतिम बात। अंबेडकर मुझे तब सुनाई देते या याद दिलाये जाते जब स्कूल में कोई कार्यक्रम हो या उनकी जयंती पर घर के दक्षिण में बसी सघन चमरौटी में हो-हल्ला हो(यद्यपि उसमें उनसे संदर्भित गीत और नारे ही रहते थे) या जब चमारों ने कहीं ढीठता दिखाई हो और उसकी देन अंबेडकर और मायावती को बताया जाता हो। आरक्षण वाली बात तब या तो मेरे सामने होती नहीं थी या मैं उसके मायने कुछ समझता ही नहीं था। बाद में जब समझा या समझाया गया तो पिछले कुछ वर्षों तक अंबेडकर को खूब गरियाया भी। अप्रैल में ही इनकी जयंती पड़ती है और इसी समय गेहूँ की कटाई-मड़ाई जोरों पर रहती है। जयंती के दिन चमरौटी से कोई भी मजदूर खेत में नहीं आता था। यह उनका पर्व घोषित हो चुका था और वे उस दिन काम पर नहीं आते थे। उस दिन लाउडस्पीकर पर गा रहे गीतों और नारों को हमारे कान न चाहते हुए भी सुन लेते थे और हमारे मुँह चाहते हुए भी बहुत कम बोल पाते थे। शायद शब्दों की कमी पड़ जाती रही हो। मुझे अच्छी तरह याद है अगर कोई जयभीम, जयभारत का नारा लगवाता (वैसे ये कभी-कभी हुआ है) तो इसे चमारों का नारा बतलाते हुए हम चुप रहते। इसकी शिकायत घर पर और वहाँ से टीचर तक भी हो जाती।

सच कहूं तो अंबेडकर को तब मैं नहीं जानता था, नहीं तो मुझे पता चलता कि अंबेडकर के मायने क्या होते हैं। अब जब उनसे रूबरू हुआ हूँ तो खुद को कितना तुच्छ महसूस कर रहा हूँ, बता नहीं सकता। एक फौलादी विचार के सामने हम बिल्कुल खोखले हैं,खोखले.....


©विनोद मिश्र