शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

खेतिहर मजदूर के जीवन की अभिव्यक्ति हैं 'चंद्र' की कविताएँ

खेतिहर मजदूर के जीवन की अभिव्यक्ति हैं 'चंद्र' की कविताएँ
(चंद्र


हिंदी की एक राजनीति रही है कि जो कथित हिंदी-क्षेत्र से नहीं है उनकी रचनाओं पर बहुत कम चर्चा की जाती है। ऐसा नहीं है कि हिंदी प्रदेश में ही अच्छा हिंदी साहित्य लिखा जा रहा है, उसके बाहर नहीं। सुदूर उत्तर-पूर्व में भी साहित्य-सृजन हो रहा है और वहाँ से अच्छी रचनाएँ सामने आ रही हैं। अपनी भी सीमाएँ हैं सूचना-तंत्र के इतने विकसित होने के बावज़ूद हम उनसे लगभग न के बराबर जुड़ पाये हैं। जो जुड़े हैं उनमें से एक हैं असम निवासी 'चंद्र'।

चंद्र गाँव में रहते हैं और खेतीबाड़ी करते हैं। इसी के बीच वे कविताएँ भी लिखते हैं जिनमें वे, उनका पूरा गाँव, खेत-खलिहान, चिरई-चुरूंग, कपिली नदी आदि पूरी संजीदगी से मौज़ूद हैं। एक खेतिहर मजदूर जो सुविधाओं से दूर रहने के कारण किसी तरह काट-कपट के अपना पेट पालता है, उसके मन में निराशा स्थायी भाव की तरह घर किये रहती है। लेकिन चंद्र की कविताओं की एक ख़ासियत रही है कि उनमें निराशा तो है, हताशा नहीं। उनमें एक आग है जो मशाल की तरह उनका पथ आलोकित करती रहती है।
ग्रामीण प्रकृति से इनकी कविताओं का जुड़ाव लोगों को आकर्षित करता है। इन कविताओं के भाव कहीं से उधार लिये हुए नहीं हैं, सर्वथा मौलिक हैं। चंद्र की कविताएँ इतनी सहज हैं कि वह जो कहना चाहती हैं, पाठक उस तक आसानी से पहुँच जाता है। चंद्र का जैसा जीवन है उनकी कविताएँ ठीक वैसी ही हैं। उनकी कविताओं से उनका जीवन अलग करके नहीं देखा जा सकता, यही उनकी कविताओं की सार्थकता है।
वे देश-दुनिया समाज के प्रति भी जागरूक हैं। समकालीन घटनाओं पर भी उनकी नज़र है। आने वाले दिनों में उनकी कविताएँ और भी निखरेंगी इसी उम्मीद के साथ उनकी कुछ कविताएँ यहाँ दी जा रही हैं -




अवसाद में आत्महत्या
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खेतों में काम करते-करते
जब-जब थोड़ा मरने का मन करता है
तब-तब मैं इस नदी के तट पर घंटों नदी से बतियाता हूँ
ज्यादा उदास हो जाता हूँ
तो बस यहीं कहीं विशाल गूलर के वृक्ष के पास चुपचाप
पत्थर घाट के शमशान में कई दिनों के जले हुए
किसी किसान की पुरातन राख को अँजूरियों से उड़ा कर
संध्या के अकेले सूरज की तरह रंगीन सपने देखने लगता हूँ
तो ऐसा लगता है मुझे
कि कबीर और बुद्ध के रास्ते की ओर लौटना चाहिए।

ज्यादा रोने का मन करता है
तो दिनभर के हारे-थाके हुए बचपन की तरह
समतल बालू पर
पेट के बल लेट जाता हूँ
तो कुछ संताप और विलाप से
सुकून मिलता है सीमाहीन।

श्रम से दुही गई छाती की बाती-बाती में
एक ऐसी बेचैनी की मौन-हाहाकार गूँजती है
कि अचानक करवटें बदलने लगता हूँ
चीखने लगता हूँ पुरजोर
पीड़ा के शब्दों के अथाह काल-जल में
डूबने लगता हूँ इस तरह कि
आँसू बहता रहता है बहुत देर तक
और मायावी मछलियाँ पीती रहती है घुट-घुट।

कुछ देर बाद तो होश ही उड़ जाती है
कि मुझे यहाँ से पलायन करना चाहिए
मुझे अब जीना नहीं चाहिए, जीना नहीं चाहिए
मैं बस एक अंतहीन भार हूँ
प्रेमिका,संगी-साथियों के लिए
और इस घूमती हुई पृथ्वी के लिए
कब जंगली हाथी आएँगे और मुझे मार देंगे कब,पता नहीं
सामने गहरी नदी है कूद जाऊँ क्या
पुरखों के पुराने बक्से में रखी सल्फास की गोली भी
अब नहीं बची
नहीं,नहीं
खेती में दवाई मारने वाली दवाई भी नहीं

फिर सोचना लगता हूँ देवता ईश्वर कैसे मरे?मैं भी मर जाता हूँ कि तमाम नकारात्मक मिथ्य-कथाओं से भर जाता हूँ मैं
कि कविता कहानी सब मोह माया है
कि कलंक का बेहया मेरे बदन पर छाया है
कि मैंने इतना सहन का हँस-हलाहल जहर पिया है कि
इतना सहा नहीं जाता,अब जिया नहीं जाता
कि मेरी गरीब दुनिया अब इस पृथ्वी पर रहने के लायक नहीं बची है दोस्त।

फिर खुद ही थक-हार कर लेटने लगता हूँ वहीं के वहीं
सोचने लगता हूँ कुछ
फिर सफेद बालू के बियाबानों में घास के घुंघरूओं की तरह
रोने लगता हूँ इस तरह कि
नदी नींद के लिए वही दादी की “चंदा मामा आरे आवा
पारे आवा नदिया किनारे आवा”लोरी सुनाती है

बरौनी मुदाने लगती हैं हौले-हौले
नींद लग जाती है
तो सो जाता हूँ रात भर बेफिक्र!

उठता हूँ जब सुबह
तो देखता हूँ-
नदी के इर्द-गिर्द पत्थर
पत्थर पर जमे हुए
अनाम-अनाम फूल के पौधे
इन तमाम खुशबूओं के शोर में
पशु-पंछियों का कलरव
नदी का कल-कल
रंग-बिरंगी तितलियाँ
घने-घने जंगल
आमने-सामने पर्वत-अंचल
हँसते-खिलखिलाते सुन्दर-सुन्दर वन फूल
नदी की निश्चल धार
नदी में मछुआरे,नाव
पुल पर चलते अमर लोग
और ज़िन्दा बालू

तो एक सुन्दर जीवन से भर जाता हूँ
और जीने की सौगंध खाकर अपनी धूल और धुएँ और बालू से उठता हूँ एक मज़दूर की तरह

फिर खेतों की ओर जाता हूँ काम पर
फिर संध्या को लौटता हूँ घर,घर से फिर नदी
नदी में सूरज का वही सत्य बिम्ब
नदी के गोद में झड़ती हुई वही बियाबानों की विरानी
वही बिरहा का धुन वही बगानिया बिहू गीत
वही प्रीतम के होठ के ओट में से चुमी हुई पिली बाँसुरी

और ऐसा सिलसिला चलता ही रहता है हर दिन
हर रोज

इस नदी से पूछो
यह बताएगी
कि अवसाद में आत्महत्या को कैसे रोका जाता है।



“मैं पृथ्वी से बहुत प्यार करता हूँ "
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मैं पृथ्वी से बहुत प्यार करता हूँ
बहुत... बहुत ...प्यार करता हूँ

इतना स्नेह के साथ प्यार करता हूँ
इतना स्नेह के साथ
कि पता ही नहीं चलता
मेरे देह से लाल लहू ,पसीना और आँसू
कब गिर-गिर जाते हैं पृथ्वी पर

और कब सोख लेती है पृथ्वी
मेरे देह का अनमोल रतन
और जाने कब भर देती है
लहूलुहान ज़ख्म!

पता ही नहीं चलता
पता ही नहीं चलता
जब पृथ्वी को अपनी बाहों में
कस के पकड़ लेता हूँ!!

                                      (चंद्र) 

बहुत ऐसी कविताएँ थीं
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बहुत ऐसी कविताएँ थीं
जिन्हें लिखा न गया कागज पर

जोत कर ज़मीन हल से
रोप दिया गया

गन्ने की तरह!



ये गेहूँ के कटने का मौसम है
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ये गेहूँ के कटने का मौसम है

इस मौसम में
देशी-परदेशी चिड़ियाएँ
उदास होती हुईं
लौटेगीं
कपिली नदी के उस पार घने वन जँगलों में दूर कहीं

इस मौसम में
गेहूँ के खेतों में झड़े हुए गेहूँ के दानों को
पँडूक खूब खाएँगे
और फुर्र-फुर्र उड़ जाएँगे बड़े ही अफसोस के साथ
जब हम गेहूँ को काट कर घर आँगन में ढोने लगेंगे
दाँने के लिए

इस मौसम में
गेहूँ काटने के लिए
गाँव-जवार के सभी खेत मज़दूर-किसान
लोहारों के यहाँ
हँसुवे को पिटवाएँगे
धार दिलवाएँगे

ये गेहूँ के कटने का मौसम है
इस मौसम में
हँसी-खुशी मज़दूरी मिलेगी खेत मज़दूरों को

इस मौसम में
गेहूँ के खेतों में बनिहारिन स्त्रियाँ
कटनी की लहरदार गीतें गाएँगी
तब झुरू-झुरू बहेंगी
शीतल बयरिया भी
तब चिलकती धूप भी रूप को मुरझा देंगी

ये गेहूँ के कटने का मौसम है दोस्तों !
इस मौसम में
चौआई हवाएँ भी खूब बहेंगी

और यह बहुत डर भी है
कि धूप तो तेज होगी ही
धूप में हम श्रमिकों की समूची देह जलेगी ही

लेकिन हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं
कि इस बार जले न गेहूँ किसी का
न फँसे खेत में ही बारिश के चलते
न जमे खेत में ही गेहूँ बारिश के चलते !!



मेरे दुनिया के बच्चों”
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मेरे दुनिया के बच्चों
तुम पर कविता लिख नहीं सकता कभी भी
क्योंकि
यदि तुम पर कविताएँ लिख सकता
तो तुम्हें जरूर,जरूर
इस कड़ाके की सर्दी में
एक छोटा सा जाँघिया और फटही गंजी को
पहने हुए
थरथराते-काँपते तुम्हारे रोयें-रोयें को
देखकर
तरस जाता
रहम और वफ़ा से भर जाता !

और सारे संसार में
चुप-चुप के छापेमारी नहीं करता
तुम्हारे नंगे बदन पर एक बित्ता कपड़ा न होने पर

बल्कि तुमसे तुम्हारे देह की हकों को
छिनने वालों के
आलीशान महलों पर टंगे हुए
कई-कई कपड़ों को बरीयाई खींचकर
अपने कंधों पर बोझा बना कर लाता
तुम्हारे दिल-देह में जमे हुए बर्फ-से खूनों को
हृदय के भीतर तेज रफ्तार में दौड़ाने का करता मदद भी!

माफ करना मेरे दुनिया के तमाम बच्चों
मैं तुम पर कविता लिख नहीं सकता कभी भी!

पर तैयारी में हूँ,मेरे दुनिया के बच्चों!
अब खेत में अनाज के साथ-साथ
गर्म कपड़ों का बीज बोऊँगा
और रुई और मखमली कपड़ों को
आसमान तक लहलहाने के लिए

मैं किसानी-मज़दूरी करूँगा!

अन्यथा
भविष्य में
मैं खुद सर्दी से सिकुड़ कर

बर्फ का पत्थर बन जाऊँगा !!!!!!

                                      (चंद्र) 

अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
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अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!

सच को सच बोलो तो भी खतरा है
झूठ को झूठ बोलो तो भी खतरा है
पर, झूठ मत बोलो
झूठ बोलने से ज़बान का खतरा है

मत चलो पहनकर गले में सोना-चाँदी का गहना
महँगी चीजों पर गद्दारों का अनवरत पहरा है!

अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!

यह वर्दी वाले,कानून वाले,पुलिस वाले,नेता,अफसर,गद्दार इन्होंने ईमान बेच दिया
ये ईमान बेच सकते
क्योंकि यह जानते हैं कि यह मुर्दों का देश है
इस देश का काला कानून,आवारे पूँजीपतियों के रखैलों की तरह गूँगा है,बहरा है
कि यहाँ बड़ी दलदल है,खून का पानी बड़ा गहरा है

अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!

क्या भरोसा कब खरोच देंगे ये
क्या भरोसा कब माँस के चिथड़े नोच देंगे ये
कब खेतों के बेटों के अनाजों के दाम गोदाम में बंद कर देंगे ये
क्या भरोसा कि कब गू-गोबर भर जाए इन नाखूनों में

इन नाखूनों को अब जहरीली लताओं की तरह पसरने मत दो-
मादरे-हिंद के धरती पर
क्योंकि नमकीन खून इनमें नहीं होता है
पर,खून बहुत करते हैं
खून करके ये देश के दीवारों पर रंग-बिरंगे अलते से रंगते हैं
कि कोई चिन्ह भी न पाएगा इन नाखूनों को
अब इन नाखूनों से तोप-तलवारों से भी अधिक खतरा है

अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढते नाखूनों से खतरा है!



“तब तो मुझे ही मर जाना चाहिए
थोड़ी-सी सुन्दर पृथ्वी के लिए”
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यदि मुझ में नहीं है तनिक भी प्यार
यदि मैं आदमी नहीं हूँ मिलनसार
यदि मैं सीख नहीं सकता तनिक भी ज्ञान
यदि मैं लिख नहीं सकता अपनी लोक भाषा में मधुर गान
यदि मैं पढ़ नहीं सकता और कवियों की कविताएँ
यदि मैं अपने श्रम का लहू बहाकर
इस धरती पर उपजा नहीं सकता अनाज
यदि मैं इस धरती पर रोप नहीं सकता एक भी पेड़ का बीज
यदि मैं पीड़ितों की पीड़ाएँ देख
नहीं सकता भीतर बाहर पसीज

यदि मैं दुनिया के अनाथ और मासूम-मासूम
बच्चे बच्चियों के होठों पर नहीं सकता चुम
और नहीं दे सकता यदि इन्हें दो जून की रोटी औ’ नून

यदि मैं थोड़ी सी दुनिया में
अपने पैरों पर खड़ा हो कर नहीं सकता घुम
यदि मैं अपने जीवन में कभी भी न करूँ दान पुण्य

यदि मैं बचा नहीं सकता चिड़ियों के सुन्दर घोंसलों के लिए
घास-फूस का घर
यदि मैं बचा नहीं सकता नदी पर्वत झील सरोवर और विश्व पर्यावरण

यदि मैं सिर्फ अपने ही दुखों को दुख कहूँ ,समझूँ
और औरों के दुखों पर दूँ लात मार

यदि मेरे जीने से पृथ्वी भी धीरे-धीरे मरने लगे..

तो मुझे ही मर जाना चाहिए
मर जाना चाहिए मेरे भाई
थोड़ी-सी सुन्दर पृथ्वी के लिए
मुझे ही मर जाना चाहिए!!!



सदानंद चाचा
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गेहूँ के खूबसूरत खेतों की तैयारी के लिए
अभी कल ही मिर्च के गाँछों को
कुदाली से काट रहे थे सदानंद चाचा
संग-साथ कटवा रही थीं सदानंद बो चाची
सदानंद चाचा के अपाहिज पिता काट रहे थे
सदानंद चाचा का नन्हा यश काट रहा था
छुटकी खुशी काट रही थीं
लगभग सब अपने-अपने कुदालियों से काट रहे थे
लगभग सब मिर्च के बगानों को दुख के साथ विदा कर रहे थे
और मैं गन्ने के खेत में गन्ना काट रहा था!

अचानक देखा कि
चाचा इस बार पुरजोर देकर मिट्टी में कुदाल मार रहे हैं
फिर अचानक देखा कि
मिर्च के जड़ में न लगकर सदानंद चाचा के पाँव में
कुदाल का धारदार फाल लग कर आधा पाँव ही कट गया
उफ!वहाँ का माँस कटकर फेंका गया वहीं कहीं
लाज़मी है कि खून बहेगा ही!
दुख-दरद तो बढ़ेगा ही!

चाचा वहीं मिट्टी को बाहों में कस के पकड़कर बेहोश हो गए
चाची दौड़ी-दौड़ी पानी लाईं
उनकी आँखों पर छिड़कीं
चाची अपने आँचल के बेने से हवा आँख पर स्नेह से हाँकीं
चाची अपने आँचल के छोर को फाड़ कर बाँध दीं
और अपाहिज पिता करते भी क्या
खेत के इर्द-गिर्द वनतुलसी के पल्लव ढूँढ रहे थे
बहते हुए लाल लहू को बन्द करने के लिए
बाबू यश और बनी खुशी अपनी भूखी आँखों से पिता के आँखों में टुकुर-टुकुर ताक रहे थे सिर्फ!

आज जब सुबह सुबह उठा
पहले आँख नहीं धोया
रात के बहे हुए बर्फीले आँसुओं को भी नहीं पोंछ पाया
बाँस के अलगनी पर रखा हुआ पिता का पुराना धुराना कुर्ता पहना
दीवार के कोने में धरा हुआ दाव लिया
दाव को रेती से पिजाया और पत्थरों से पिजाया
और लाल गमछा मस्तक पर लिए
लहराता हुआ चल दिया
दूर गन्ने के खेतों में

कुछ देर बाद देखा कि
बिजली के तारों पर बैठे हुए पँक्तिबद्ध पंछी
प्रातः के गज़ल-गीत गा रहे थे
इस खुशी में गीत गा रहे थे कि
एक दो टेटनिस का इंजेक्शन और दस बीस लगे हुए कटे पाँव में टाँके और ढेर सारे बेंडिसों के
आथाह दर्द का चादर ओढ़े हुए सुबह-सुबह
अपने उसी खेत में लंगड़ाते हुए
हल जोत रहे हैं
गेहूँ के दाने छिट-बो रहे हैं

मैं देख रहा हूँ सामने से
वहाँ से खून रिस कर बह रहा है
और खून के रंग पर छीटे हुए दाने को
चुग रहें हैं
देसी-परदेसी पंछी!

मैं देख रहा हूँ अपनी खुली आँखों से
सदानंद चाचा रो नहीं रहे हैं

रो रही है छाती पीट-पीटकर
पृथ्वी की पसरी हुई अन्तहीन आत्मा!!



[ऐ पूँजीपति कवियो ! ]
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ऐ पूँजीपति कवियो !

क्या तुम्हारी महँगी-महँगी
और ब्राण्डेड डायरियों में
ज़रा जगह नहीं
लिखने को
उनका नाम भी

जिनकी समूची देह से अंग-अंग से
लहू, पसीना, स्वेद-रक्त और आँसू
पूरी तरह से,
बुरी तरह से दूहे जा चुके हैं

और जिनकी देह, देह नहीं रह गई है अब
जिनके नेत्र, नेत्र नहीं रह गए हैं अब
जिनका मस्तक, मस्तक नहीं रह गया है अब
जिनके हाथ, हाथ नहीं रह गए हैं अब
जिनके पाँव, पाँव नहीं रह गए हैं अब
जिनके दाँत, दाँत नहीं रह गए हैं अब
जिनकी छाती, छाती नहीं रह गई है अब
जिनकी छाती की बाती-बाती
रूई की तरह धुनी जा चुकी है

जिनका पूरा शरीर
श्रम के लोहाें की मसलन से,
भय़ावह चिन्ता, रोग, भूख, घोर दुख की जलन से
खेतों में खटते हुए चुपचाप शहीदों जैसे मरण से
अब बचा है कृषकाय
मुट्ठी भर

उनके लिए
क्या तुम्हारी क़ीमती क़लमों को लिखने का
टैम नहीं है

चिकन-बिरयानी खाकर भी
लिखने की थोड़ी सी भी शक्ति नहीं बची है
आत्मा में

तुम सिगरेट और शराब पीने के बाद भी
लिखने के मूड में नहीं हो
या फुर्सत नहीं है प्रेमिकाओं के बारे में लिखने से

तो कहो न, साहब जी !
मैं अपनी देह में बचा लहू का आख़िरी कतरा भी
दे दूँगा तुम्‍हें
तुम्हारी क़लम के रिफिल में लाल स्याही के लिए !



ये धान के रोपने का सुनहरा मौसम है
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ये धान के रोपने का सुनहरा मौसम है

इस मौसम में रिमझिम-रिमझिम बारिश होंगी
नद-नदी ,वन-जंगल ,पर्वत-अँचल
प्रेमी ,कवि और पागल की तरह मौसमी बंसी बजाएंगे

जो कविता की कजरी आधी अधूरी रह गई थीं पिछले बरस
उसे पर्वतों के बादलों के पेड़ों के झूलों पर झुलते-झुलते
ताल सुर दे, लय छंद दे, कल-कल निनाद बनाएंगे

हल्की-हल्की धूप भी श्रमिक रूप को मुरझाएगी
चहूँ दिशि मस्तानी हवाएँ सरसराएगी
भंवरे, मधुमक्खियाँ और तितलियाँ
रंग-बिरंगे खिले,हरी-भरी लताओं से गले मिले ,
फूलों के पृथ्वी पर, नृत्य पर नृत्य कर, झूमेंगे , झूमेंगे
चूमेंगे, चूमेंगे सुख-दुख भरे जीवन के इंद्रधनुषी तरंग को
उत्साह और उमंग से
सिरजेगें ,सिरजेगें किलकता हुआ शिशुपन...

मिट्टी का कीचड़ हम मजदूर-किसान बनेंगे
बच्चे और बच्चियाँ इन्हीं कीचड़ों में खूब खेलेंगे
दूर-दूर से देशी-परदेशी चिरई – चुरूँग आस लगाकर आएंगे

मेरे कृषक भाई, बहिनी नन्ही-नन्ही कुदालिओं से आलियाँ छाँटेंगे
पथारों की पगडंडी की तरह मेड़ बनाएंगे
हल-बैलों-हेंगिंओं से खेतिओं को मुलायम दही की तरह मह- मह कर
धान रोपने लायक गीली मिट्टी और कीचड़ बनाएंगे
कविता से भी सुंदर, बहुत सुंदर-सुंदर ,पंक्तिबद्ध-पंक्तिबद्ध
क्यारियाँ बनाएंगे

ये धान – रोपनी का सुनहरा मौसम है
इस मौसम में
दिन होगा चाहे रजनी होगी
हाड़-तोड़ की खटनी होगी

पिया गया होगा परदेस मगर
मस्तक पर ओढ़े बदरिला आसमान
चुपचाप धान रोपती उसकी सजनी होगी

बनिहारिन स्त्रियाँ धानों की बिता -बिता भर की
हरियर-हरिहर बीजें
अपने कर्मठ हाथों से उखाड़ेगीं ,बोयेंगी
रसीली,लसीली मिट्टी में
हाथों की उंगलियों को गोद-गोद कर, टप-टप ,टप-टप..
हंस-हंसकर, खिल-खिल कर, मिल-मिल कर
बच्चे बच्चियाँ जवान बूढ़े सब के सब
पंकीली मिट्टी में रोपते जाएंगे, रोपते जाएंगे
गाते हुए धन-रोपनी की लहरें दार गीतें
जीवन का नव-नव रंगरूप रोपते जाएंगे

मन सावन-सावन होता जाएगा
चहूँ ओर हरियाली लहराएगी
हम कीचड़ के बच्चे
हमारी मेहनतकश आत्माएँ
कीचड़ में धरती भर नहाएंगी

झींगुर-दादुर खूब मस्ती में मल्हार गाएंगे
जब तक न खिल जाते धानों में धान
जब तक न सफल हो जाते हमारी मेहनत की धरती से बहे लहू और पसीने और श्रम और प्यार
जब तक न कमल के लह-लह फूल बन जाते
पथारों में रेगिस्तान की तरह समतल, अनंत श्रम के कीचड़

तब तक हरे-हरे धान के पत्तों को
चुप-चुप कर,
छुप-छुपकर, चुग-चुग कर

ये चिरई -चुरूँग खाएंगे!

कि मिट्टी अपना गुण धर्म निभाएंगी
हम मिट्टी के बच्चे नन्हें-नन्हें धान
नीले आसमान में फहरेंगे सयान बनकर एक दिन..!



“जब-जब मेरी माई रोतीं हैं!!!!”
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जब-जब मेरी माई रोतीं हैं
तब-तब
तब-तब
कल- कल ,कल-कल बहती हुई
कपिली – नदी माई भी
चुपचाप -चुपचाप रोतीं हैं

तब-तब,
तब-तब
धीमी धीमी
झीनी झीनी
धरती माई भी
रोतीं हैं

तब -तब
तब -तब
शिवफल -वृक्ष के
शितल छईंयाँ में
बँधाई हुई
छूटकी खुँटियाँ में
उदास नन्हकी बछिया भी
माँ-माँ ,माँ-माँ
बाँ -बाँ , बाँ बाँ चिघरते हूए
रोने लगतीं हैं

तब -तब ,
तब -तब ,
झोपड़ी के मुरेड़ पर बैठी हुई प्यारी चिरईयाँ भी
चिहूँ -चिहूँ , चिहूँ -चिहूँ
रोने लगतीं हैं

और
तब -तब
तब -तब
मैं औरी मोर अनपढी बहिनि भी
माई का लहूलूहान हाथ – पांव के घाव पर
बड़ी ही सनेह के साथ
अपना गर्म और सुंदर हाथ धर -धर के
झर -झर के
डर -डर के
कहंर कहंर के
आह् उउफ से
भर -भर के
मर -मर के
मर -मर के
रोने लगते हैं

रोने लगती हैं
कपिली नदी तट पर की
वंशी सी
आहतम्यी आवाज में बजती हुई
झूरमूठ -बांस -झाड़ियाँ !!!!!!

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(नोट- सभी कविताएँ और ऊपर की तस्वीरें चंद्र के फेसबुक वॉल से ली गई हैं) 
                                  विनोद मिश्र
                       शोधार्थी, भारतीय भाषा केन्द्र
              जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

रविवार, 12 जुलाई 2020


मिट्टी का हूँ, मिट्टी की हैं मेरी कविताएँ : विराग की कविताई






परिचय–

नाम - विराग विनोद
शिक्षा– एम.ए. , पी-एचडी.(हिंदी)
मो.– 6306813815
email– viraag1994@yahoo.com

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कुछ लोगों को शिकायत रहती है कि आजकल हिंदी में अच्छी कविताएँ नहीं लिखी जा रही हैं। ऐसे शिकायतकर्ता या तो मध्यकालीन भावबोध के प्रेमी होते हैं या समकालीन कविता के वे पाठक ही नहीं हैं। अगर वे राजेश जोशी, विनोद कुमार शुक्ल, अरुण कमल आदि प्रतिष्ठित हिंदी कवियों से लेकर आज के युवा कवियों/ कवयित्रियों - विहाग, अदनान, वीरू सोनकर, रूपम मिश्र, सुधांशु फिरदौस आदि की कविताएँ पढ़ रहे होते तो शर्तिया वे ऐसा न कहते। हिंदी कविता की युवा पीढ़ी अभी अपनी पहचान बना रही है(कुछ की तो बन भी चुकी है)। कुछ युवा कवियों से हिंदी कविता को बहुत उम्मीद भी है, जिनकी कविता का प्रकाशन अभी ज्यादा नहीं हो पाया है। ऐसे ही एक युवा कवि हैं – विराग।

विराग कौन हैं? कहाँ रहते हैं? क्या करते हैं? – ये सब मुझे नहीं मालूम। लेकिन वे अच्छा लिखते हैं इतना पता है। उनसे परिचय का एकमात्र स्रोत उनकी कविताएँ हैं जो मुझे फेसबुकिया मित्र होने के कारण दिखती रहती हैं। उनकी कविताएँ पढ़ने से ऐसा लगता है कि वे एक किसान/मजदूर परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं, नहीं तो जो विषय, दृश्य, बिंब और भाषा पूरी संजीदगी से उनकी कविता में आती है वह तो नहीं ही होती। इसके साथ ही देश की वर्तमान परिस्थिति से भी वे अनभिज्ञ नहीं हैं। ‘अपनी खाल रगड़कर देखने का यही समय है', ‘ईश्वर पैरों का छाला है', ‘पृथ्वी के तपते भूगोल पर एक वृक्ष है गाँव', ‘मजदूर चल रहे हैं', ‘तुम्हारे बच्चे का बाप कौन है सफूरा जरगर', ‘ हम किसानों और मजदूरों की संताने हैं प्रतीक्षा हमारे खून में है' जैसी कविताओं का शीर्षक ही समय के साथ उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इनकी कविताओं में किसान से मजदूर बनते पिता का दर्द है, माँ को सही तरह से समझने की एक कवायद है, शहर से गाँव लौटते मजदूर की व्यथा है। सभ्यता, संस्कृति और मानवता की बंदूकें हैं जिसका उपयोग कवि के शब्दों में सिर्फ कत्ल करने के लिए ही हुआ है, रक्षा करने के लिए नहीं। उनकी ऐसी अनेक कविताएँ हैं जिन्हें उनको जरूर पढ़ना चाहिए जो समकालीन कविता को बिना पढ़े गरियाने वाले हैं। इन कविताओं से उन्हें कुछ अपनापा जरूर महसूस होगा। उन्हें लगेगा कि दौर अब बदल चुका है कविता का स्वर, विषय, शिल्प सब बदल चुका है और जो बदला है वो आज के अनुकूल ही है।

 विराग की चुनिंदा कविताएँ आप यहाँ पढ़ें उससे पहले विराग की कुछ पंक्तियाँ यहाँ पेश करता हूँ जिससे आप उनकी कविताओं को(कवि को भी) और करीब से जाकर पढ़ सकें –

मैं अमर कविताओं का कवि नहीं हूँ
मिट्टी का हूँ
मिट्टी की हैं मेरी कविताएँ... ।"


कुछ चुनिंदा कविताएँ
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अपनी खाल रगड़कर देखने का यही समय है


एक रात बिजली कटने अथवा चाय का दूध फटने से
जितना आहत होते हैं लोग
उतना मृत्यु की खबरों से नहीं होते

महामारी, भुखमरी, हत्या, दुर्घटना
जिस भी चेहरे में हो मृत्यु
आहत नहीं होते लोग
जितना रामायण-महाभारत के एपिसोड छूटने से

[ अपने घरों के भीतर भयभीत जरूर होते हैं
   कुछ लोग ]

लेकिन यदि आपके घर प्रतिदिन व्यंजनों के प्रकार
पहले की अपेक्षा अधिक बन रहे हैं, तो
यकीन करें सरकार
आईने में चेहरा नहीं अपना पेट देखिए

यही ठीक समय है

अब हमें वातानुकूलित आराम भवनों में रतिमग्न
भेड़ियों की देह से आदमी की उतरी खाल
और उत्तेजित शिश्नों को
सड़कों पर सार्वजनिक कर देना चाहिए
करुणा और सहानुभूति से भरी
तमाम छद्म सरकारी आँखें नोच लेनी चाहिए
रक्त से आचमन कर रहे हाथों को मिट्टी में दबा देना चाहिए

अन्यथा अपनी-अपनी आत्मा को सभ्यता और संस्कृति के
हत्यारे वृक्ष पर स्वार्थ और अनंत ग्लानि के बीच
लटकने के लिए छोड़ देना चाहिए

भाईयों!
स्वार्थों और शब्दों के बीच
एक आईना रखने का यही समय है
यही समय है चुप अपनी खाल रगड़ देखने का भी।


ईश्वर पैरों का छाला है


जैसे गाय, भैंस, कुत्ता, बिल्ली, सुअर, चमगादड़
सबका कोई न कोई ईश्वर होगा वैसे ही
मैं भी निरीश्वर नहीं हूँ

जैसे एक पत्थर तोड़ती स्त्री का ईश्वर हथौड़ा है
और लोहा गलाने वाले मजदूरों का ईश्वर
उनकी मजबूत बाहें हैं

जैसे रोगियों का ईश्वर जो उनका इलाज करता है
जैसे पुजारियों का ईश्वर वे मूर्तियाँ जिनसे
रोजगार चलता है

जैसे लोलुप नेताओं की ईश्वर है वह मूर्ख जनता
जो जाति-धर्म पर वोट करती
दुम हिलाती है

यकीन करें ईश्वर है
लेकिन उसकी कोटियाँ अलग-अलग हैं
जैसे कुछ ईश्वर सड़कों पर मदद के लिए खड़े हैं
वहीं कुछ ईश्वर भरपेट भोजन कर सो रहे हैं
कुछ और भी वातानुकूलित ईश्वर हैं
जो रतिमग्न हैं

आप पूछते हैं इस संकट में मजदूरों का ईश्वर
क्या कर रहा हैं ?

कविता में कहूँ तो मजदूरों का ईश्वर पैरों का छाला है
जो फूट कर बह रहा है ।


पृथ्वी के तपते भूगोल पर एक वृक्ष है गाँव



जो मुड़-मुड़ कर देख रहे थे गली-राह
उनकी प्रतीक्षा में है गाँव
जो कहते हुए गये नहीं रहना यहाँ
उनके भी स्वागत में बिछी हैं गलियाँ

जो महानगरों में रक्त का लोहा गला रहे थे
जो किस्मत के पत्थर काट रहे थे
जो एक घर की चाह लिए
ईंटा-गारा कर रहे थे
जो आलीशान भवनों की रखवाली में थे
वे जो रोजगार की तलाश में
मुँह मोड़ गए थे

वे सब आ रहे हैं

भूख-प्यास, नींद-थकान, जीवन-मृत्यु के बीच
गिरते-उठते, उठते-गिरते, तपती सड़कों पर
छिलते पाँव आ रहे हैं

गाँव जहाँ आज भी स्मृति की धूल उड़ती है
गाँव जिसके माथे पर घास उगी है
जहाँ मिट्टी कुछ नम है
अंखुए फूटते हैं

वे सब आ रहे हैं जीवन की तलाश में
मृत्यु से पंजा लड़ाते हारते-जीतते
जीतते-हारते

वे आ रहे हैं

वहाँ
जहाँ नाल गड़ी है
जहाँ एक टूटी चारपाई पड़ी है
जहाँ किसी कोने जंग खायी एक सायकिल खड़ी है
जहाँ दफ़्न हैं पुरखें और उनके सिरहाने पेड़ खड़े हैं

वे आ रहे हैं।

पिता के जूते
[ जो हमारी पीठ का मैदान हरा किये रहते ]



पिता के जूते सिर्फ पहनने के काम नहीं आते थे
हमें पीटने के भी काम आते थे

जो जूते सुबह से शाम तक पिता के पैरों में होते
और उन्हें कांटा-खूंटी-ठोकर से बचाते
वही हमारी पीठ सीधी करने का
महान काम भी करते

पिता जो हमेशा सीधी राह
और विनम्रता से सबको नमस्कार करते चलते
हम जो हमेशा क़ु-राह चलते और झगड़ा करते
तब पिता के जूते ही हमें सही राह पर लाते

पिता के जूतों के निशान खेतों-पगडंडियों पर ही नहीं
हमारी पीठ का मैदान भी हरा किये रहते
छपे रहते

हमने बचपन से टायर के जूतों को नजदीक से देखा
वह जल्दी कटते-फटते नहीं थे और न ही
ईंट-पत्थर से पैरों में ठेव लगने देते

हमें पिता के जूतों से हद दर्जे की नफरत थी
हम उन्हें कुँओं में फेंक देना चाहते थे
हँसिया से काट डालना चाहते थे
कउड़ा में जलाना चाहते थे

लेकिन एक दिन पिता जब खेत में पानी से टूटती
मेढ़ बाँध रहे थे तभी एक कालिया नाग ने
उनके पैर पर फन पटका
पिता कहते हैं वह छिटक कर मेड़ से दूर गिरे
यह जूते थे जिन्होंने जान बचाई
इस तरह उम्र भर के लिए हम जूतों के शुक्रगुजार हुए

सच कहें तो किताबों और अनुभवों से हमने जितना सीखा
पिता के जूतों ने भी हमें कम नहीं सिखाया
पिता ने हमारी टेढ़ी पीठ पर जितने जूते मारे
हम उतने सीधे हुए

इतने सीधे की छरहरे और पूरे छः फुट के हुए ।


मजदूर चल रहे हैं


१.

पाताल और धरती से, महल और खंडहर से
पूरब-पश्चिम से, उत्तर और दक्षिण से
सिर और पीठ पर सामान लादे
चींटियों-से निकल पड़े हैं
मजदूर

दसों दिशाओं के मजदूर पैदल चल रहे हैं
चल रहे मजदूरों की दिशा एक है
जिस ओर गाँव है
परिवार है
घर है

मजदूरों को भरोसा नहीं रहा दिक्पालों पर
दिक्पाल अपने आराम-भवनों से
प्रवचन दे रहे हैं

और मजदूर चल रहे हैं
जांगर और हाथों के भरोसे निकले थे
कभी घर से

निकले हैं हिम्मत और पैरों के भरोसे
घर को

चीटियों की तरह पैर तले कुचल जाने से पहले
घर पहुँचने के अस्पष्ट सपने हैं
लंबी प्रतीक्षा है
अपने हैं

२.

मजदूर चल रहे हैं
एक की बिटिया पूछती है–‘पापा
मैं थक गई अभी और कितनी
दूर चलना है?’

एक कि पत्नी फोन करती है–
‘आप सब ठीक तो हैं न
कहाँ पहुँचे ?’

एक की माँ कहती है– ‘कुछ मिले तो
खाते-पीते रहना थोड़ा आराम करना
धूप में कम चलना’

एक कि बहन कहती है– ‘भैया,
ऐसी-वैसी जगह मत बैठना और
अपरिचितों से मुँह ढँककर
बात करना’

पिता कसम खाते हैं–‘बस आ जाओ
गाँव-घर में ही कमाओ
यहीं रहो

जब मरना ही है
तो अपनी माटी और देहरी पर मरो’

३.

मजदूर चल रहे हैं
कहते हैं मजदूरों की देह से जब नींद की ट्रेन गुजरी
वह सब भोर के सपने देख रहे थे
सपने जो सच होते हैं

एक मजदूर अपनी बिटिया के साथ खेल रहा था
एक रूठी पत्नी को मना रहा था
एक माँ के घुटनों की दवा
लेकर पहुँचा था

एक पिता से गले लगकर रो रहा था
एक भाई को पढ़ाई-लिखाई का
मतलब समझा रहा था

एक कह रहा था वह अब गाँव में ही
खेती-किसानी करेगा

एक कह रहा था
बहन के लिए लड़का खोजेगा

एक और एक और एक और एक
सब किसी न किसी सपने में थे
थके थे, भूखे थे
और रोटियाँ लिए घर जा रहे थे

लेकिन सरकार का कहना है कि
मजदूर रेल की पटरियों पर
सो रहे थे ।

४.

मजदूर चल रहे हैं

जब आप अपनी हवसों का समान जुटाकर
आराम-भवनों में सो रहे हैं और टीवी पर
बहस कर रहे हैं
उसी समय मजदूर पैदल चल रहे हैं

क्या आपको दिखाई नहीं देता कि
माँ-बाप की कुचली देह पास
बच्चे रो रहे हैं !

क्या आप देख नहीं रहे कि घायल-चोटिल
और वृद्ध-बच्चों को पीठ पर लादे
वे गिर रहे हैं

क्या आप देख नहीं रहे कि मजदूर
मृत्यु की ट्रकों पर बैठ कर
जीवन खोज रहे हैं

आप देख रहे हैं मजदूर स्त्रियां बीमार हैं
आप देख रहे हैं वे बूढ़ी हैं
कुछ गर्भ से हैं
और चलते हुए गिर पड़ी हैं

सरकार आप सबकुछ देख रहे हैं

लेकिन आप आराम कुर्सी पर बैठे हुए
रंगीन टी.वी पर देख रहे हैं
चैनल बदल रहे हैं...


वह सब मेरी माँ हैं



वह जो नर्क से बदतर जिंदगी जीने को और
बिटिया का ब्याह जल्दी करने को मजबूर हैं
जो बिके खेत की याद के आँसू सुखाते
खेतों में रोपाई कर रही हैं
जिनके बच्चे भात को तरस रहे हैं
वह मेरी माँ हैं

जो नन्हें पौधों के स्वप्नों की निराई करती हैं
जो अँखुओं के मुँह धुलाती हैं
गुड़ाई करती जड़ों में
मिट्टी चढ़ाती हैं
जो फसलों की कटाई करती
कुछ रुपए और गृहस्थी के लिए अन्न जुटाती हैं
वह मेरी माँ हैं

जिनकी जरा सी देरी पर पारा चढ़ता खून खौलता है
जिसे तुम कहते हो हाथ बहुत धीरे चलता है
ठीक से करो अन्यथा मत आओ
जो भीतर सुलगती
चुप रहती हैं
मेरी माँ हैं

वह जिन्हें जवानी के दिनों में अतिरिक्त पैसा और
काम का लोभ देकर तुम रिझाने की कोशिश करते रहे
जो अब तुम्हारे लिए बूढ़ी हो रहीं
कामचोर मजदूरन हैं
मेरी माँ हैं

वह जो बहुत दिनों से भीतर लावे-सी बह रही हैं
वह जिनके हाथ में तेज धार हँसिया हैं
चमकती दरातियाँ हैं
वह जिनके हाथों में हथौड़े और कुदालें हैं
जो एक साथ चट्टानों पर बैठी
सुस्ता रही हैं

वह सब मेरी माँ हैं ।


पिता की मृत्यु के बाद माँ
[ मातृ-दिवस पर एक मित्र का एकालाप ]



१.

पिता के जाने से हम अनाथ नहीं हुए
न बेसहारा, माँ जीवित है
हमारी

पिता जो मिट्टी के घर की कच्ची छत थे
माँ लिपा-पुता महकता आँगन

कहते हैं जिस रात आँधी-बारिश ने उखाड़ दिए थे
बगीचों में तमाम नये पौधे और वट वृक्षों की
डालें टूट गिरी थीं
उसी रात एक बिजली आँगन की
तुलसी पर भी गिरी और आकाश बन गए पिता

फिर माँ हमारी छत बनी और आँगन भी
हाँ, आँगन की खुशबू जरूर कुछ
कम हुई

२.

विवाह के सातवें बसन्त में ऋतुओं का बेरंग होना
और छब्बीस की उम्र के अंधेरे रास्ते में
स्त्री का दो बच्चों संग छूट जाना
कितना त्रासद है

पति की मृत्यु से सिकुड़ जाती है स्त्री की दुनिया
आकाश कंधों पर आ गिरता है
नदियां गहरी हो जाती हैं
परिवार दुश्मन
पड़ोसी चरित्रहीन हो जाते हैं

कभी खेत न जाने वाली माँ पिता की मृत्यु बाद
अपने खेतों में खटती रहती और दूसरों के
खेतों में मजूरी करती

परिवार वालों की गालियाँ सुनती लाँछन सहती
आँधी-बारिश और बिजली की धार में भीगती
उसने हमें पढ़ाया-लिखाया काबिल बनाने की
कोशिश की

३.

हमारी पढ़ाई-दवाई में माँ के तमाम गहने बिक गए
लेकिन बचाए रखा दो जोड़ी जड़ाऊ बिछुए
सहेज रखी लाल-गुलाबी साड़ियाँ
पिता के हाथ की
विवाह का शृंगारदान अभी भी है लेकिन वहाँ
सिंदूर-टिकुली-काजल के बजाय
गृहस्थी की चीजें रखी हैं

माँ ने सम्भाल लिया था सबकुछ गिरते-पड़ते
लेकिन जब हम पगडंडियों में गिरे तो
पिता याद आए
गाँव के मेला में पिता याद आए
परीक्षाओं के रिज़ल्ट आते हैं तो पिता याद आते हैं

हमें नहीं पता पिता की यादें माँ के पास कब
और किस तरह आती हैं लेकिन कभी-कभार
माँ कहती है कि– ‘तुम दोनों
बिल्कुल नहीं डरते हो उन्हीं की तरह लगते हो ।‘



बंदूक़



इतिहास गवाह है कि बंदूक़ें जब भी उठी हैं
हत्याएँ हुई हैं, रक्षा नहीं हुई कभी
किसी बंदूक़ से

धर्म के लिए उठी बंदूक़ों ने हत्या की धर्म की
संस्कृति के लिए उठी बंदूक़ों ने संस्कृति की
शांति की बंदूक़ों ने नष्ट किया
शांति को

बंदूक़ से कभी रक्षा नहीं हो सकी किसी विचार की
न ही स्थापित हुआ कोई मूल्य
न ही कोई व्यवस्था

अंधी हैं बंदूक़ें
अंधे आदेशों का पालन करती हैं
अंधे हो जाते हैं बंदूक़ उठाने वाले हाथ
वह हाथ चाहे धर्म के हों
संस्कृति के हों
शांति के हों
व्यवस्था के हों या किसी देश के हों ।


तुम्हारे बच्चे का बाप कौन है सफूरा जरगर ?



नवजात योनि पर अपनी महान संस्कृति सम्पन्न शिश्न
रखने वाले पूछते हैं- ‘तुम्हारे बच्चे का बाप कौन है
सफूरा जरगर ?’

स्त्री को देह मात्र समझने वाले, अपने सम्बन्धों में भी
सेंध लगाने वाले कहते हैं– ‘तुम्हारा निकाह तो
नहीं हुआ सफूरा जरगर ?’

सफूरा जरगर तुम तो सब जानती हो कि यह
इस देश की महान परंपरा रही है
जिसे जगतजननी सीता कह कर पूजता है देश
उससे भी पूछता है- ‘क्या अब भी राम की हो
रावण की तो नहीं हो गयी ?’

सत्य-शील और मर्यादा के अवतार माने जाने वाले
राम ने तो भरे दरबार अपनी ही पत्नी से पूछा था–
‘तुम्हारे बच्चों का बाप कौन है ?’

बताओ तुम्हारे बच्चे का बाप कौन है
सफूरा जरगर ?

ऐसे ही प्रश्नों के बीच फंसी थी एक स्त्री और नदी में
विसर्जित हुआ था निर्दोष शिशु

प्रश्न तो प्रश्न हैं सफूरा जरगर तुम विवाहित हो
या अविवाहित फ़र्क नहीं पड़ता है
मुझे खुशी है कि तुम लड़ी हो
हिम्मत से खड़ी हो

हमारे देश की महान परंपरा रही है सफूरा जरगर
कि इंकलाब (?) का परचम लिंग पर ही लहराएगा
स्वप्न में भी नहीं स्वीकारेंगे ये स्त्री स्वयत्तता
तमाम तरीकों से तुम्हें तोड़ेंगे
लाँछन लगाएंगे !

ऐसे तमाम लांछनों से भरे हैं हमारे देश के महाख्यान
कितनो के जवाब दोगी सफूरा जरगर ?


किसान



जो भूमि पर सूरज की खेती करता था
तारों को उर्वरक की तरह छीटता था
जिसके माथे से भोर की ललाई फूटती
ऋतुएँ सहचरी थीं जिसकी
उदास मौसम में भी जिसके चेहरे पर
सरसों के फूल की हँसी थी

पक्षी जिसे हर शाम धन्यवाद कहने आते
पशुओं से मित्रवत व्यवहार था जिसका
मिट्टी में जन्म ले जो मिट्टी को
अन्न बनाता

जो मिट्टी में ही जीता मिट्टी में ही
खेत जाता

वह भी अब राजधानी की किसी फैक्ट्री में लगा है
वह भी दूर शहर के भट्ठों में बैलों-सा जुता है
वह भी लेबर चौराहे पर सिर झुकाए
बंधे हाथ खड़ा है

वह जो तमाम बीमारियों से घिरा है
परिवार जिसका ऋण में दबा है
चेहरे पर जिसके कालिमा है
धुंआ है

वह हम सबका पिता है ।


हमने पिता को किसान से मजदूर बनते देखा
     [ एक मजदूर के लड़के की कविता ]


पहले-पहल पिता को मुंह-अंधेरे खेतों की ओर जाते देखा
फिर बैलों की तरह जुते देखा, फावड़ा करते हुए,
कोन गोड़ते, बीज छीटते हुए देखा
[ जब हम गुड़-पानी लिए माँ के साथ पहुँचते
 वह माँ को देख मुस्कुराते, हमें दुलराते
 पानी-पीते ]

हमने नये बीजों, खाद और सिंचाई के लिए
माँ के गहने गिरवी रखे जाते देखा
हमारी पढ़ाई के लिए पड़ोसियों से
कुछ उधार माँगते देखा
खाने को रखा गेंहूँ-धान बेंचते हुए देखा
मां को भूखे सोते
पिता को रात भर खेतों में जागते हुए देखा

ओलों और बारिश से खड़ी फसलें बर्बाद होते देखीं
खलिहानों और खेतों में आग लगते हुए
पिता को बे-वजह माँ से झगड़ते हुए
एकांत में सिर पर हाथ रख सोचते
हुए देखा [ लेकिन कभी रोते हुए
नहीं देखा ]

फिर हमने पिता को दूसरों के खेतों में काम करते देखा
ईंट के भट्ठे पर झुकाई के लिए जाते हुए देखा
लोगों के घरों में ईंटा-गारा करते और
सिर झुका कर घुड़की सुनते हुए
सुना/देखा

मुट्ठी भीचते
गाली को अनसुना करते
हमने पिता को किसान से मजदूर बनते देखा ।


  मेरी भाषा ही मेरी जाति है !



मैं चाहता था कि आपको बताऊं मिट्टी के गर्भ में बीज
और माँ के गर्भ में शिशु एक जैसे स्वप्न देखते हैं
हँसते और डरते हैं

शिशु अँखुओं के मुँह धुलाने को ही ओस झरती है
और धूप आती है फसलों और चिड़ियों को जगाने
वृक्षों की पत्तियों को डाट काम पर लगाने
फूलों-फलों को सहलाने

मैं आपको बता सकता हूँ पक्षियों के रूठने के बारे में
किस मौसमी फूल पर कब किस रंग की
तितली दिखाई पड़ती है
और किस फूल की पंखुड़ियां कितने दिनों में झरती हैं

मेरी चिन्ताओं में है– अनियमित क्यों है बारिश
क्यों सूख जा रहे तालाब हर बार कुछ जल्दी
क्यों झर रहे हैं वृक्षों से असमय पत्ते
कहाँ चले गए चिरई-चुरङ्गुर
क्यों भटक रहे मजदूर
और किसान क्यों कर रहे आत्महत्या ?

लेकिन आप हैं कि आपको कुछ मतलब ही नहीं
आप मुझसे मेरी जाति पूछते हैं ?

मैं आपसे पूछता हूँ
क्या आप बता सकते हैं अन्न की जाति क्या है ?
ओस बूँदों और आँसुओं की जाति क्या है ?
वृक्षों और पक्षियों की जाति क्या है ?
नदियों-तालाबों-कुओं की जाति क्या है ?
इनमें किसी एक ने भी कभी मुझसे मेरी जाति नहीं पूछी
लेकिन मैं आपको बताता हूँ किसानों और मजदूरों की
कोई जाति नहीं होती

रही बात मेरी तो जान लीजिए मजदूर-किसान
मेरे पिता हैं, पृथ्वी मेरी माँ है, पुस्तकें मेरा धर्म
और मेरी भाषा ही मेरी जाति है ।


हम किसानों और मजदूरों की संतानें हैं
प्रतीक्षा हमारे खून में है’


जिन दिनों हम गर्भ में थे
सरकारी अस्पताल की लाइन में लगी रहती माँ
और डॉक्टर लंच के लिए उठ जाता कहते हुए
–‘प्रतीक्षा करो’ ।

जिन दिनों हम गोद में थे
दिन भर सरकारी राशन की दुकान पर बैठी रहती माँ
शाम ढले कोटेदार कहता–‘देर हो गयी
कल जल्दी आना ।‘

जिन दिनों हमने चलना सीखा
दिन-रात बैलों की तरह जुते रहते हमारे पिता
पसीने में भीगी खेतों में मिट्टी हुई जाती मां
मेड़ पर बैठे हम बदली से सूरज ढकने की प्रतीक्षा करते

भाइयों! हम किसानों और मजदूरों की संतानें हैं
प्रतीक्षा हमारे खून में है...
(या भर दी गयी है
  कौन कहे ? )

हम मिट्टी में बीज दबाकर प्रतीक्षा करते हैं
हम नील गायों, साँड़ों और साहूकारों से लड़ते हैं
हम रात भर जागकर फलियों में दूध गढ़ाने की
प्रतीक्षा करते हैं

हमें ओलों का भय रहता है लेकिन बारिश की प्रतीक्षा करते हैं
हम नहीं चाहते कभी कुआँ-तालाब सूखें
या वृक्षों से असमय पत्ते झरें
चिरई-चुरङ्गुर भूखे मरें
हम धूप से
प्रार्थना करते हैं
हम हवा से प्रार्थना करते हैं !

हम गांव छोड़कर शहरों में मजदूरी करते हैं
और वर्ष भर घर लौटने की
प्रतीक्षा करते हैं।


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विनोद मिश्र
शोधार्थी, भारतीय भाषा केन्द्र
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली