गुरुवार, 31 जुलाई 2025

रहस्यपूर्ण पीड़ाएँ


रात किसी विषकन्या की तरह

चुपके से रख देती है होंठों पर होंठ

और लिए जाती है देह को एक नयी दुनिया में


इस सघन निर्जनता में कभी दौड़ता है एक धड़
अपने सिर को हाथ में लिए हुए
और एक जज़्बाती दिमाग़ पोंछता है
टपका हुआ ख़ून

कभी लकवाग्रस्त ज़बान बाहर झूलती है
आँखें बाहर निकलती हैं बार-बार

अट्ठहास-सी करती शापित इच्छाएँ
अपनी मुक्ति का पता पूछती हैं बार-बार
सब ध्वनियाँ गूँजती हैं
नक्कारे की घाटी में

ये कौन-सी दुनिया है जहाँ
हृदय में फूटता है लावे का गुबार
जहाँ जलती हैं अपनी ही सजल स्मृतियाँ

जहाँ घुटता है दम
फूलती हैं घृणा की संस्कृतियाँ

ये कौन-सी दुनिया है जहाँ
बसते हैं अपने ही सपनों से निष्कासित हुए नागरिक
हाथ-पाँव में बेड़ियाँ बाँधे
बिना किसी अधिकार के

जहाँ सहमता है मन
लूटती हैं ख़ुद को अपनी ही इन्द्रियाँ

ये कौन-सी दुनिया है जहाँ
भरी जाती है नवजात फेफड़ों में बारूद की गंध
हड्डियाँ नृत्य करती हैं सूखी हुई देह पर

जहाँ ढहता है अपना ही घर
बनता है रोज़ ही एक नया कब्रिस्तान

यहाँ कोई चौकीदारी करता है रामनामी ओढ़े
और करता है हमारी संभावनाओं की तस्करी
कोई उद्घोष करता है शांति का
और जलाने में लगा हुआ है हमारी ही बस्ती

ये कौन-सी दुनिया है जहाँ
बहती है हमेशा दर्द की नदी
जिसमें तैरते-डूबते रहते हैं सब फ़टे सीने वाले

जहाँ वाणी हो जाती है मूक
जबकि एक भरोसेमंद भाषा के सभी शब्द
मस्तिष्क के अंतरिक्ष में तैरते रहते हैं

इस नयी दुनिया में बस्स
रहस्यपूर्ण पीड़ाएँ अपनी रौ में बह रही हैं...


-विनोद मिश्र