रात किसी विषकन्या की तरह
चुपके से रख देती है होंठों पर होंठ
और लिए जाती है देह को एक नयी दुनिया में
अपने सिर को हाथ में लिए हुए
और एक जज़्बाती दिमाग़ पोंछता है
टपका हुआ ख़ून
कभी लकवाग्रस्त ज़बान बाहर झूलती है
आँखें बाहर निकलती हैं बार-बार
अट्ठहास-सी करती शापित इच्छाएँ
अपनी मुक्ति का पता पूछती हैं बार-बार
सब ध्वनियाँ गूँजती हैं
नक्कारे की घाटी में
ये कौन-सी दुनिया है जहाँ
हृदय में फूटता है लावे का गुबार
जहाँ जलती हैं अपनी ही सजल स्मृतियाँ
जहाँ घुटता है दम
फूलती हैं घृणा की संस्कृतियाँ
ये कौन-सी दुनिया है जहाँ
बसते हैं अपने ही सपनों से निष्कासित हुए नागरिक
हाथ-पाँव में बेड़ियाँ बाँधे
बिना किसी अधिकार के
जहाँ सहमता है मन
लूटती हैं ख़ुद को अपनी ही इन्द्रियाँ
ये कौन-सी दुनिया है जहाँ
भरी जाती है नवजात फेफड़ों में बारूद की गंध
हड्डियाँ नृत्य करती हैं सूखी हुई देह पर
जहाँ ढहता है अपना ही घर
बनता है रोज़ ही एक नया कब्रिस्तान
यहाँ कोई चौकीदारी करता है रामनामी ओढ़े
और करता है हमारी संभावनाओं की तस्करी
कोई उद्घोष करता है शांति का
और जलाने में लगा हुआ है हमारी ही बस्ती
ये कौन-सी दुनिया है जहाँ
बहती है हमेशा दर्द की नदी
जिसमें तैरते-डूबते रहते हैं सब फ़टे सीने वाले
जहाँ वाणी हो जाती है मूक
जबकि एक भरोसेमंद भाषा के सभी शब्द
मस्तिष्क के अंतरिक्ष में तैरते रहते हैं
इस नयी दुनिया में बस्स
रहस्यपूर्ण पीड़ाएँ अपनी रौ में बह रही हैं...
-विनोद मिश्र