#रामचरितमानस_पाठ_कुपाठ
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रामचरितमानस की कुछ घटनाएं/प्रसंग/सूक्तियाँ हर एक पाठक को आकर्षित करती हैं। मैं भी आकर्षित हुआ हूँ, लेकिन अपनी साधारण सी बुद्धि के साथ। रामचरितमानस को जैसा मैंने समझा उसी को एक क्रम में बताने की योजना है मेरी।
सबसे पहले तो यह बताना चाहूंगा कि मेरी जो बात होगी, वो सिर्फ़ रामचरितमानस पर केन्द्रित होगी, तुलसी की अन्य रचनाओं पर नहीं। यहाँ तक कि वाल्मीकि कृत रामायण या अन्य किसी ग्रंथ/रचना/लोककथा/जनश्रुति से भी भरसक दूर ही रहकर बात करना चाहूंगा।
रामचरितमानस की कई टीकाएँ हैं, कई संस्करण हैं। मेरे पास जो है वो गीताप्रेस गोरखपुर का संस्करण है। सचित्र, सटीक व्याख्या, हनुमानप्रसाद पोद्दार वाला। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए जो उद्धरण दिये जायेंगे, इसी से होंगे। वैसे ये संस्करण साहित्य वालों को नहीं पढ़ना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य है कि यही मेरे पास है। मेरे पास ही क्या अधिकांश लोगों के पास यही संस्करण होगा। क्यों नहीं पढ़ना चाहिए साहित्य वालों को ये संस्करण?... इसकी शुरुआत और अंत के साथ ही इसकी जो व्याख्या/टीका की गई है वो साहित्य प्रेमियों को हानि ही पहुंचायेगी। गीताप्रेस ने इसे विशुद्ध धार्मिक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। शुरू में पूजा पद्धति से लेकर अंत में आरती तक इस संस्करण ने पुस्तक (रामचरितमानस) की महत्ता घटाई है। अगर आप इसकी व्याख्या/टीका को पढ़ेंगे वहाँ भी आपको दिक्कत होगी/हो सकती है।
रामचरितमानस एक धार्मिक काव्य है। वह धर्म ही नहीं धर्म की राजनीति भी करता है। अगर आप बुद्धि को साथ लेकर इस कविता(?) में प्रवेश करेंगे तो बौखलाहट ज्यादा होगी और निराशा ही हाथ लगेगी। तुलसी ने इस ग्रंथ में बहुत मेहनत की है जिससे लोग उनकी कविता की आलोचना न कर सकें। फिर भी कुछ अटपटे-सटपटे प्रसंगों और विचारों पर बात तो होती ही रही है, होनी भी चाहिए। मैं भी कुछ बात करूंगा। वैसे इस ग्रंथ के कुछ मार्मिक प्रसंगों/सूक्तियों पर शायद मैं अपनी बात न रखूँ, क्योंकि जो आस्वादक हैं (साहित्य के भी और धर्म के भी) उनको सब पता है।
एक और बात रामचरितमानस मध्यकालीन भावबोध से ग्रसित रचना है। अगर इस परिप्रेक्ष्य में बात हो सकेगी तो ठीक रहेगा। साहित्य की दृष्टि से रामचरितमानस लाल कपड़े ( अब भगवा कपड़े) में बाँध कर रखने लायक किताब नहीं है। लेकिन उसमें कुछ ऐसा जरूर है जो इसे इन कपड़ों में बाँधकर पूजा करने को प्रेरित करता रहा है। यह कुछ क्या है? अगर इसकी भी पड़ताल हो सके तो बेहतर रहेगा।
अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि रामचरितमानस की जो व्यापक प्रसिद्धि है मेरी नज़र में उसके प्रमुख दो कारण हैं - पहला तो यही कि यह हिंदू धर्म(?) की आदर्श स्थिति को एक कथा के माध्यम से व्याख्यित करता है। दूसरा जो इसका प्रमुख कारण है और इसी के कारण वह अपने विरोधियों/आलोचकों में भी प्रिय है, वह है - इसकी सूक्तियाँ। ये सूक्तियाँ लोकजीवन से भी हैं और शास्त्र से भी। इस ग्रंथ की सूक्तियाँ ही इसका प्राण है अगर इसको निकाल दिया जाय तो रामकथा होने के बावज़ूद रामचरितमानस को कोई नहीं पूछेगा।
रामचरितमानस ने कई लोगों को मतिमंद भी किया है और इसके लिए मैं सर्वथा तुलसी को ही दोषी मानता हूँ। गली-गली, घर-घर रामचरितमानस का पाठ (अखण्ड रामायण पाठ) जो लोग करते हैं, अधिकांश उसके बारे में कुछ नहीं जानते। पण्डितों और अंध-प्रोफेसरों की मकड़जाल में रामचरितमानस उलझ सा गया है। इससे इसकी मुक्ति संभव भी नहीं है क्योंकि इसमें कुछ ऐसे तत्व हैं जो इसे पोंगापंथियों के हवाले करने से बाज नहीं आ सकते। तुलसी ने इन पोंगापंथियों के लिए खुद ज़मीन तैयार की है। ख़ैर...
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रामचरितमानस के कुछ अटपटे प्रसंग
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रामचरितमानस में कुछ ऐसे प्रसंग हैं जो आपको कथा की दृष्टि से अटपटे लग सकते हैं। आगे क्रम में उनकी ही चर्चा होगी।
(1). बालकाण्ड में एेसा ही एक प्रसंग हैं। सती ( शिव की पूर्व पत्नी) आत्महत्या के बाद पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेती हैं। राम के नररूप के प्रति उनका संदेह अभी पूरी तरह से शांत नहीं हुआ है। शिव संदेह निवारण के लिए रामचरित्र सुनाने के क्रम में राम के अवतार के हेतु पर प्रकाश डाल रहे होते हैं। वे बताते हैं कि राम के अवतार लेने के लिए कितनी परिस्थितियाँ उत्तरदायी थीं। कितने लोगों के श्राप ने उन्हें अवतार लेने को विवश किया। इसी क्रम में वे हरि के दो द्वारपाल जय और विजय का जिक्र करते हैं। दोनों ने सनकादि मुनि के श्राप से राक्षस होने का श्राप पाया।
पहले जन्म में तो वे हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष हुए। जिनका वध हरि के अवतार नरसिंह और वाराह ने किया। लेकिन वे मुक्त नहीं हुए -
"मुकुत न भए हते भगवाना।
तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।।" (पेज.97)
चूंकि ब्राह्मण द्वारा दिए गया श्राप तीन जनम तक प्रभावी था। इसलिए उन राक्षसों की मुक्ति नहीं हुई। वे अगले जन्म में रावण और कुम्भकर्ण हुए।
अब दिक्कत यहीं हैं। शिव तो कह दिये कि तीन जन्म तक राक्षस हुए, लेकिन उल्लेख वे केवल दो जन्म का कर पाये। तीसरे का क्यों नहीं किये?
बात ये है कि तुलसी को रामकथा कहने की बहुत जल्दी है। तुलसी जब रावण-राम तक आये होंगे, ऊपर कही तीसरे जन्म की बात या तो वे भूल गये होंगे या उसे बताना जरूरी नहीं समझा होगा।
(2). ये भी बालकाण्ड से ही है। अवतार और पुनर्जन्म तुलसी के धर्म और मिथकों की जहाँ सबसे बड़ी विशेषता है , वहीं कहीं-कहीं इसके चित्रण में उनसे भूल भी हो गयी है। कथा-विन्यास इससे प्रभावित भी हुआ है।
प्रसंग है - राम का अवतार किस कारण हुआ? इसी विषय पर याज्ञवल्क्य मुनि भरद्वाज मुनि को कथा सुना रहे हैं। स्वायम्भुव मनु और शतरूपा घोर तप करते हैं। फलस्वरूप वर देने के लिए भगवान प्रकट होते हैं। भगवान का स्वरूप देखिए -
"केहरि कंधर चारु जनेऊ। बाहु विभूषन सुंदर तेऊ।।
करि कर सरिस सुभग भुजदंडा।कटि निषंग कर सर कोदंडा।।
... भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई।।
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।।
चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा।।" (पेज.113-114)
इसमें दो राय नहीं कि ये जो भगवान का स्वरूप है वह राम का है। यही राम का स्वरूप वरदान के रूप में मनु और शतरूपा का अगले जनम में पुत्र होने की बात करता है -
" तहँ करि भोग बिलास तात गएँ कछु काल पुनि।
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत।। 151 (पेज.116) "
अब इस प्रसंग को लेकर दो दिक्कतें सामने आती हैं। पहला यही कि हिंदू मिथक जब अवतार लेते हैं तो उनके स्वरूप में बदलाव हो जाता है। वे अपने पूर्वरूप में नहीं रहते, अगर वैसे ही रहते तो अवतार ही क्यूँ कहलाते? और इसपर भी राम स्वयं कह रहे हैं कि मैं तुम्हारा पुत्र होउंगा।
राम का अस्तित्व ही अयोध्या में जन्म लेने के बाद होना चाहिए, पहले नहीं। उसके पहले जैसा कि हिंदू धर्म (वैष्णव) में कहा गया है उन्हें नारायण, विष्णु, हरि आदि होना चाहिए, राम नहीं।
दूसरी समस्या इससे भी बड़ी है। मनु और शतरूपा तप के बल पर 'राम' को पुत्र रूप में प्राप्त करते हैं। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है। लेकिन मानसकार तुलसी अन्य जगहों पर मनु और शतरूपा की जगह कश्यप और अदिति की बात करते हैं -
"कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता।।" (पेज. 97)
"कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा।।
ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा।।" (पेज. 141)
अब तप करे कोई, क्रेडिट ले कोई। कस्यप और अदिति पूरे मानस में कहीं तप करते हुए नहीं दिखाई देते। उनकी जगह मनु और शतरूपा ही तप करते हैं और पुत्ररूप में 'राम' को प्राप्त करते हैं। यद्यपि अन्य पौराणिक कथाओं में जैसे परशुराम,राम, कृष्ण आदि हरि/विष्णु के अवतार माने गये हैं, वैसे ही कश्यप और अदिति , मनु और शतरूपा के रूप में वर्णित किये गये हैं। लेकिन रामचरितमानस में ऐसा नहीं है। तुलसी को इस जगह पर ध्यान देना चाहिए था। कथा में ये बड़ी भूल है।
(3).
रामचरितमानस के कुछ अटपटे प्रसंग
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(3). ये प्रसंग अयोध्याकाण्ड से है। राम का राजतिलक होते-होते वनवास मिल जाता है। ये खबर पूरे राज्य में आग की तरह फैल जाती है। राम अपनी माता कौशल्या से वन जाने के लिए आज्ञा माँगने आये हैं। जब सीता ने यह खबर सुनी तो वे भी अकुला उठीं और कौशल्या और राम के पास आकर बैठ गईं -
"समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।
जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।"57 (पेज.306)
सीता सिर नीचे करके आँसू बहा रही हैं और अपने पैर के नाख़ून से ज़मीन कुरेद रही हैं। वे सोच रही हैं कि पति के बिना मैं कैसे जीवित रहूँगी। वे सोचबस रही हैं, कुछ कह नहीं रही। लेकिन कौशल्या कहती हैं - हे राम! सीता तुम्हारे साथ वन में जाना चाहती हैं। तुलसी को यहाँ इतनी जल्दबाज़ी नहीं दिखानी चाहिए थी कि सीता के कहने से पहले कौशल्या ही उन्हें राम के साथ जाने को कह दें। वे कहती हैं - " जो सीता कभी कठोर ज़मीन पर पैर तक नहीं रखी हैंं वो आपके साथ वन जाना चाहती हैं।"
"सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।।" (पेज.307)
(4). अगर बिना पनहीं (पादुका) के राम वन में विचर रहे हैं तो भरत चित्रकूट से लौटते हुए उनकी पादुका कैसे ले आये? ये प्रसंग भी विचारणीय है।
भरत को न परलोक का भय है न ही पिता के मरने का शोक। उन्हें तो बस इसी बात का दुख है कि राम लखन सीता बिना पनहीं के मुनियों का वेष बनाये घूम रहे हैं -
"राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं।।
... एहिं दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।। (पेज.410)
भरत चित्रकूट में पूरी सभा के सामने अपने को धिक्कारते हुए पुनः कहते हैं -
" महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।।" (पेज.445)
मैं ही इन सारे अनर्थों का मूल हूँ। यह सब सुन और समझकर ही मैंने सभी प्रकार के दुख सहे हैं। राम लक्ष्मण और सीता के साथ मुनियों का वेष धारण कर बिना जूते (पनहीं, पादुका) पहने पैदल ही वन चले गये। शंकर साक्षी हैं, यह सुनकर भी मैं इस घाव से जीता रह गया(ये सब सुनकर मर क्यों नहीं गया)।
(5). तुलसी को नीचा-ऊँचा सिद्ध करना मेरी प्राथमिकता में नहीं है। लेकिन लोग तुलसी को वहाँ प्रगतिशील एवं कथित ऊँचा सिद्ध करते हैं जब एक ब्राह्मण वशिष्ठ एक नीच (तुलसी की भाषा में) निषादराज गुह को गले लगाते हैं। इस प्रसंग में भी तुलसी का कथा-विन्यास लड़खड़ा गया है।
बात ये है कि भरत राम को मनाने चित्रकूट प्रस्थान करते हैं। उनके साथ सभी माताएं, वशिष्ठ आदि गुरु एवं पुरवासी भी जाते हैं। रास्ते में निषादराज गुह से मिलन होता है। निषादराज दूर से ही अपना नाम बताकर गुरु वशिष्ठ को प्रणाम करते हैं, गुरु आशीर्वाद देते हैं लेकिन गले नहीं लगाते और भरत से उनका परिचय कराते हैं -
"देखि दूर तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।।
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा।भरतहि कहेउ बुझाई मुनीसा।।" (पेज.397)
यही गुरु वशिष्ठ निषादराज समेत तमाम पुरवासियों सहित चित्रकूट में राम के पास जाते हैं। लेकिन निषादराज के साथ में रहने के बावज़ूद क्या बात है कि चित्रकूट में पहुंचने के बाद निषादराज के प्रति उन्हें इतना प्रेम उमड़ पड़ता है?
यही तुलसी चित्रकूट में -
"प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूर तें दंड प्रनामू।।
रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।। (पेज.432)
अब इस प्रसंग से दो बातें उभर कर सामने आती हैं -
पहली तो ये कि जब एक बार परिचय हो चुका है फिर वशिष्ठ से निषादराज 'अपना नाम' बताकर क्यों अपना परिचय दे रहे हैं?
दूसरी बात ये है कि दोनों (वशिष्ठ और निषादराज) श्रृंगवेरपुर से चित्रकूट तक साथ में आते हैं। लेकिन चित्रकूट पहुंचकर ही उन्हें प्रेम क्यों उमड़ता है?
(4).
रामचरितमानस के कुछ अटपटे प्रसंग
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(6). ये प्रसंग अरण्यकाण्ड से है। रावण सीता का अपहरण करने आया है। रावण-सीता संवाद के बीच ही तुलसी रावण की दशा का विरोधाभासी चित्रण कर देते हैं -
"जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।" (पेज.520)
सीता रावण से कहती हैं - जैसे सिंह की स्त्री को तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही (मेरी इच्छा रखने वाले) निशाचर (रावण) तू काल के वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावण को क्रोध आ गया। परन्तु मन में सीता के चरण की वंदना करके सुख माना।।
कोई अपहरण-कर्ता अपहृत के चरण की वंदना मन ही मन करे और बाहर से उसपर क्रोध भी करे। ये थोड़ा अवास्तविक लगता है। (हाँ लेकिन तुलसी के पुनर्जन्म और अवतारवाद के आगे सभी स्थितियाँ जायज़ है।)
(7). जटायु और संपाती नामक गिद्ध प्रजाति ने सीता के बारे में महत्वपूर्ण सूचना दी। एक ने कहा- उन्हें रावण लेकर गया है। दूसरे ने कहा - रावण ने उन्हें अशोक वाटिका में रखा है। किष्किन्धाकाण्ड में संपाती कहता है -
"गिरि त्रिकूट अपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका।।
तहँ असोक उपवन जहँ रहई। सीता बैठि सोच रत रहई।।" (पेज.562)
अब दिक्कत यहाँ है कि जब सबको संपाती ने बता ही दिया कि सीता असोक वन में बैठी हैं। तो सुंदरकांड में हनुमान, रावण के महलों में क्यों उन्हें ढूँढ रहे थे? -
"मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति विचित्र कहि जात सो नाहीं।।
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।" (पेज.570)
पहली बात तो हनुमान को वहाँ जाना नहीं चाहिए था क्योंकि उन्हें पता है कि सीता वहाँ नहीं हैं। दूसरी बात हनुमान जैसे ब्रह्मचारी (?) पुरुष को रात में किसी के शयन-कक्ष में जाना उचित नहीं लगता। क्या इसको तुलसी की त्रुटि न माना जाये?
(8). रामचरितमानस में लक्ष्मण-रेखा और शबरी के जूठे बेर का प्रसंग नहीं है। लेकिन लंकाकाण्ड में मंदोदरी रावण को समझाते हुए कहती हैं -
"कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।।
रामानुज लघुरेख खचाई। सोउ नहीं नाघेहु असि मनुसाई।।" (पेज.639)
जब मूल प्रसंग में इतने महत्वपूर्ण प्रसंग को तुलसी छुपा लेते हैं तो दूसरी जगह उसका उल्लेख करना कुछ अटपटा लगता है।
(9). राम अयोध्या पहुँचने वाले हैं। वे दूत के रूप में हनुमान को भेजते हैं कि जाकर भरत को सूचित कर दो। हनुमान, भरत के पास ब्राह्मण का वेष धारण कर के जाते हैं -
"राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत।।" (पेज.718)
अब इस प्रसंग में दिक्कत ये है कि लक्ष्मण-मूर्छा के दौरान संजीवनी बूटी लेकर जाते हुए हनुमान से भरत की भेंट पहले ही हो चुकी है। तब हनुमान अपनी पहचान छिपाकर उनसे क्यों मिल रहे हैं?
इतना ही नहीं,भरत जब पूछते हैं -
"को तुम तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।।" (पेज.719)
तब हनुमान उनसे कह रहे हैं -
"मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।।" (पेज.719)
ये कितनी बड़ी मूर्खता है कि कोई ब्राह्मण वेषधारी पुरुष कहे कि मैं बंदर हूँ और मेरा नाम हनुमान है।
जब अपना परिचय देना ही था तो हनुमान ने ब्राह्मण का वेष क्यों धारण किया? हनुमान या तो ब्राह्मण नहीं बनते या अपना पूर्व परिचय नहीं देते, तब ठीक रहता।
(10). अब उत्तरकाण्ड में आये रामराज्य का एक प्रसंग है। तुलसी रामराज्य के विविध पहलुओं पर बात करते हुए उसकी एक विशेषता को कुछ ऐसे बताते हैं -
"सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।।
एक नारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।। (पेज.739)
रामराज्य में पुरुष भी एक पत्नीव्रतधारी हैं। शुक्र है! दसरथ पहले ही चल बसे , नहीं तो तुलसी के रामराज्य में इतनी पत्नियों (सिर्फ़ तीन, कहीं-कहीं तो साढ़े तीन सौ रानियों) के साथ वे कहाँ रहते? अगर गौर किया जाये तो राजाओं और सामंतों की कई कथित और कई तथाकथित पत्नियाँ होती हैं। और तुलसी सामंतवाद के उत्कृष्ट चरण में ऐसा कह रहे हैं। अज़ीब नहीं लग रहा? रामराज्य पर बात फिर कभी...
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रामचरितमानस के कुछ अटपटे प्रसंग
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(11). ये प्रसंग अयोध्या काण्ड से है। राम वन जा रहे हैं। रास्ते में वाल्मीकि का आश्रम पड़ता है। राम वहाँ उनसे अपने रहने का स्थान पूछने की नियत से जाते हैं। तुलसी लिखते हैं -
"मुनि कहुँ राम दण्डवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।" (पेज.351)
अब यहाँ वाल्मीकि को विप्रवर (विप्रों में श्रेष्ठ) कहा गया है। ये थोड़ा अज़ीब लगता है। वैसे वर्चस्वशाली जातियों ने उन्हें अपने खेमे में मिलाने की भरपूर कोशिश की है (यहाँ तुलसी भी वही कर रहे हैं) लेकिन सर्वविदित है कि वाल्मीकि ब्राह्मण तो नहीं थे। तुलसी जैसे लोगों की निगाह में यही रहा होगा कि इतनी अच्छी रामकथा कोई ब्राह्मण ही लिखा होगा(अगर वो ब्राह्मण नहीं है तो उसे अपनी जाति का बताने में उन्हें कोई हर्ज़ नहीं लगा होगा इसीलिए उन्हें विप्रवर कहकर संबोधित किया) इतना ही नहीं तुलसी ने इस प्रसंग में वाल्मीकि के मुँह से एक अच्छा खासा प्रवचन भी दिलवाया है।
(12). अहल्या, तारा और मंदोदरी - तुलसी द्वारा रचे गये इन तीन स्त्री-चरित्रों पर बाद में बात होगी। लेकिन तीनों के चित्रण में कुछ अस्वाभाविकता है, उसे यहाँ देखिए। पहले अहल्या को लेते हैं। एक ऐसी स्त्री जिसका पति उसके शीलभंग होने पर पत्थर बनने का श्राप दे देता है। वही स्त्री राम के मिलने पर अपने पति के बारे में कुछ ऐसा कहती है तो ताज़्जुब होता है -
"मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना।।" (पेज. 158)
राम के दर्शन को वह इतना प्राथमिकता दे रही है कि मुनि (पति) के कृत्य को जायज़ बता रही हैं। जबकि उनके ही बदौलत उनकी ऐसी गति हुई है।
बालि की पत्नी तारा और मंदोदरी में एक चीज़ समान है। दोनों के पति को राम मारते हैं फिर दोनों को राम ज्ञान (अपनी भक्ति) देते हैं। जिसका पति मरा हो, वो स्त्री अपने पति के हत्यारे को इतनी वरीयता कैसे दे सकती है? वो भी तुरंत। यहाँ एक बात और विचारणीय है तुलसी पतिव्रता स्त्री को बहुत महत्व दे रहे हैं। ये कैसी पतिव्रता स्त्रियाँ हैं जो अपने पति के हत्या को जायज़ ठहरा रही हैं। तारा की दशा देखिए -
"तारा बिकल देखि रघुराया।दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।।
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।
प्रगट सो तनु तव आगे सोवा।जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।।
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।। (पेज.549)
मंदोदरी के प्रसंग में भी ऐसा ही है। रावण मृत होकर सामने पड़ा है। मंदोदरी विविध प्रकार से रोते हुए कहती है -
" अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं।राम विमुख यह अनुचित नाहीं।।(पेज.699)
... मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।
भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि।।" (पेज.700)
राम से विमुख होने वालों की ऐसी गति कि पत्नी भी अपने पति की हत्या को अनुचित न मानें, आश्चर्य होता है। और तो और वह अपने पति के हत्यारे का गुणगान भी करे, उनकी भक्ति भी ले, ऐसा चित्रण तो तुलसी जैसे विरले कवि ही कर सकते हैं।
(13). कथा की ये असंगति मेरे मन को ज्यादा ही सालती है। तुलसी राम को कितना भी बड़ा घोषित क्यों न कर दें मुझे कोई आपत्ति नहीं। लेकिन जब वे राम को इतना बड़ा घोषित कर दें कि उनके माता-पिता (दसरथ-कौशल्या) और सास-ससुर(जनक-सुनयना) ही उनके चरणों की वंदना करने लगें, और राम को इससे आपत्ति भी न हो, अस्वाभाविक लगता है।
कौशल्या राम के पैदा होने पर राम से कहती हैं-
"कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता।।" (पेज.114)
जब राम बताते हैं कि मैं तुम्हारा बेटा नहीं भगवान हूँ। तब कौशल्या की दशा देखिए -
"तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा।।
बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी।। (पेज.152)
राम रावण को मार देते हैं तब दसरथ उन्हें बधाई देने आते हैं। दसरथ राम को पुत्र ही मानते हैं लेकिन राम अपने को भगवान मान रहे हैं। जब राम भगवान हैं तब तो निश्चय ही दसरथ को उन्हें प्रणाम करना ही पड़ेगा -
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना।चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना।।
... सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं।तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं।।
बार बार करि प्रभुहिं प्रणामा।दसरथ हरषि गए सुरधामा।। (पेज.707)
विवाह होने के उपरांत राम विदा लेने के लिए अपने सास-ससुर के पास आये हैं। उसी क्रम में उनकी सास सुनयना कहती हैं -
"तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय।
जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन।।
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।।" (पेज.249)
जनक भी राम को ऐसा समझकर हाथ जोड़ते हैं -
"ब्यापकु ब्रह्म अलख अबिनासी। चिदानंद निरगुन गुन रासी।। (पेज.252)
... बार बार मागउँ कर जोरें।मनु परिहरै चरन जनि भोरें।।(पेज.253)
इस पूरे प्रसंग के केन्द्र में सिर्फ़ एक बात है। राम भगवान हैं, अन्य उनके भक्त है। अब वो चाहे माता-पिता ही क्यों न हो? राम की वंदना तो करनी ही पड़ेगी।
और भी कई प्रसंग हैं, जो कथा की दृष्टि से सही नहीं लगते। लेकिन अब इस कड़ी को यहीं विराम देता हूँ। आगे रामचरितमानस के कुछ प्रसंगों, तुलसी की राजनीति (आदर्श) आदि पर बात करना चाहूंगा। रामचरितमानस की कविताई पर फ़िलहाल बात नहीं कर रहा हूँ, न करने की कोई ख़ास योजना है। उनकी कविता को बड़े-बड़े आलोचक/विद्वानों ने पहलेे भी व्याख्यायित किया है। कविता के सौन्दर्य, मार्मिकता तक शायद मैं नहीं पहुंच पाऊंगा। (इस संदर्भ में आप हमें पूर्वाग्रही भी कह सकते हैं)
आगे छिटपुट बातचीत होगी...
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(6).
(रामचरितमानस का संवेदनात्मक/काव्यात्मक पक्ष न दिखा पाने के लिए मैं पहले ही माफ़ी माँग रहा हूँ। जो बातें होंगी भरसक कविता पर न होकर कथा पर होगी। आज बालकाण्ड में आये शिव और सती तथा शिव और पार्वती प्रसंग पर बात करना चाहता हूँ।)
लोग कहते हैं कि तुलसीदास ने रामचरितमानस में उन प्रसंगों को हटा दिया जो रामकथा में विवादित माने जाते रहे हैं। मसलन शंबूक-वध और सीता परित्याग तत्पश्चात् भूमि ग्रहण। ऐसा करके तुलसी न सिर्फ़ व्यापक आलोचना से ही बचे, बल्कि पूजनीय भी हो गये। तुलसी ने भले ही राम द्वारा सीता का परित्याग एवं तत्पश्चात् आत्महत्या (जमीन में समाना) न कराया हो, लेकिन उनकी रामायण में ऐसी एक घटना है जिसमें पति ने पत्नी को छोड़ दिया और पत्नी ने आत्महत्या कर ली। ये प्रसंग है - शिव और सती का।
तुलसी जब रामचरितमानस की भूमिका बाँध रहे होते हैं। उसी में शिव-सती प्रसंग आता है। हम जब कोई रचना करते हैं और उसमें पात्रों तथा उनके बीच संवादों का चयन करते हैं इसके पीछे हमारी रणनीति और राजनीति काम करती है। तुलसी की भी अपनी एक राजनीति है। इस राजनीति के तहत तुलसी राम को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए विभिन्न देवताओं और पात्रों को मोहरा बनाते हैं। शिव और सती भी मोहरे हैं। रामकथा की बुनियाद ये ही डालते हैं। अब पहले प्रसंग देखिए फिर उसपर बात होगी -
राम दण्डकवन में हैं, सीताहरण होने ही वाला है। शिव अगस्त्य मुनि से रामकथा सुनने आये हैं। रामकथा सुनने के बाद उनके मन में विचार आता है क्यों न राम (अपने आराध्य) को देखते ही चलें? जब वो उन्हें देखने जाते हैं तब वही सीताहरण हुआ ही रहता है। राम सीता के विरह में व्याकुल होकर विविध तरह के विलाप कर रहे हैं। शिव के साथ उनकी पूर्व पत्नी सती भी हैं। सती सोचती हैं कि ये कैसे भगवान् हैं जो रो रहे हैं? इनकी परीक्षा लेनी चाहिए। सती का यही काम शिव को बुरा लगता है और वे मन ही मन उनका परित्याग कर देते हैं। भारी उपेक्षा के चलते अंततः सती अपने पिता प्रजापति दक्ष के यहाँ आत्महत्या कर लेती हैं।
इस पूरे प्रसंग को कई तरीके से देखा जा सकता है। राम तर्क से परे हैं, जो राम पर संदेह करेगा उसका पतन निश्चित है। (जैसा कि सती का हुआ)। किसी की परीक्षा लेना पुराणों और कथाओं में बहुत आता है, लेकिन तुलसी पहली बार ये लाते हैं कि परीक्षक को परीक्षा लेने के नाते आत्महत्या तक करनी पड़ी हो। ये किस तरह हुआ, देखिए -
"सती कीन्ह सीता कर बेषा।सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।।
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती।।
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु।।" (पेज.50)
अब यहाँ देखिए तुलसी शिव को इतना बड़ा रामभक्त बनाते हैं कि सती ने जब सीता बनकर राम की परीक्षा लेनी चाही शिव से उन्हें छुड़वा दिया। शिव विवश भी हैं। शिव मानते हैं कि सती पवित्र हैं , लेकिन उनसे प्रेम करने पर बहुत बड़ा पाप लगेगा। भक्ति/धर्म वास्तव में आदमी को अंधा बनाकर छोड़ता है। यक़ीन न हो तो आगे देखिए शिव के सती परित्याग संबंधी संकल्प को सुनकर धर्मपुरुष (राम ) शिव को शाबाशी देते हैं -
"एहिं तन सतिहि भेंट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं।।
अस बिचारि संकरु मतिधीरा।चले भवन सुमिरत रघुबीरा।।
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई।।
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना।। " (पेज.51)
रामचरितमानस के राम अपनी भक्ति करने वाले से सिर्फ़ खुश ही नहीं होते बल्कि वे अपनी भक्ति करने का उपदेश भी देते हैं। अनेक प्रसंगों में ऐसा हुआ है, उसपर आगे कभी बात होगी।
अब सती की दशा देखिए -
" संकरु रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेऊँ हृदयँ अकुलानी।।
... सोइ फल मोहि विधाता दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा।। "(पेज.51-52)
अब बिडम्बना ये है कि सती शिव के इस कृत्य को जायज़ भी ठहरा रहीं हैं। ऐसे ही तुलसी के अन्य स्त्री पात्र (तारा, मंदोदरी आदि) अपनी पति की मृत्यु को जायज़ बताती हैं। जो राम विमुख है, उसकी हर स्थिति जायज़ है ऐसा तुलसी का मानना है।
दोष तुलसी की साधना-पद्धति/दर्शन/वैचारिकी में ही है। जब इसके अनुसार तुलसी कथा को आगे बढ़ाते हैं उनकी राजनीति साफ़ दिखाई देने लगती है। वैष्णव धर्म के आगे शैव धर्म नतमस्तक होने लगता है। विशिष्टाद्वैतवाद से जुड़े होने पर भी तमाम तरह के द्वैत दिखाई देने लगते हैं। यह द्वैत सिर्फ़ ब्रह्म और जीव में नहीं है वरन् ब्राह्मण-शूद्र, पुरुष-स्त्री, शैव-वैष्णव, ज्ञान-भक्ति, देव-राक्षस आदि में भी है।
सती की आत्महत्या के बाद सती का पुनर्जन्म पर्वतों के राजा हिमालय के घर होता हैं, वहाँ वे पार्वती कही जाती हैं। नारद के तिकड़मबाज़ी से उनका विवाह पुनः शिव से होता है। इस जन्म में जब वो तथाकथित पाप से मुक्त हो चुकी रहती हैं, शिव से रामकथा सुनने की प्रार्थना करती हैं। तुलसीदास कहते हैं इसी क्रम में रामचरितमानस की कथा कही गई है।
मैं नारद की तिकड़मबाज़ी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि नारद ने पार्वती के बालमन को ऐसा प्रभावित किया है, जैसा आजकल के बाबा अपने भक्तों का करते हैं। उन्हें लगता है कि वे जो कह रहे हैं वह ही सत्य है, बाक़ी सब झूठ। पार्वती अभी बच्ची हैं और नारद हिमालय के घर पहुंच जाते हैं। हाथ की रेखाएँ देखकर वे तमाम तरह की भविष्यवाणी करते हैं। वे कहते हैं कि हिमालय तुम्हारी पुत्री बहुत अच्छे गुणों वाली है,लेकिन दो चार अवगुण मुझे दीख रहे हैं। इसका पति गुणहीन, अनाथ, जोगी, अकामी, अमंगल वेषभूषा वाला होगा। पार्वती के बालमन पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। बाबाओं के आतंक (घनिष्ठ आस्था) के कारण वह उनके कहे को मान लेती हैं -
" होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो वचनु हृदयँ धरि राखा।।" (पेज.58)
तुलसी आगे लिखते हैं -
"कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनहार।।
तदपि एक मैं कहउँ उपाई।होइ करै जौं देउ सहाई।।
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं।मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं।।
जे जे बर के दोस बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने।।
जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई।।
... समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं।।
संभु सहज समरथ भगवाना। एहिं बिबाह सब बिधि कल्याना।।"(पेज.58-59)
ये गज़ब की बात है कि जैसे बाबा लोग कहते हैं आपके ऊपर फलां विपत्ति है, ये जाप या क्रियाकलाप कराइये विपत्ति टल जायेगी। वैसे ही नारद कहते हैं कि शिव से विवाह होने पर पार्वती के सब दोष मिट जायेंगे। लेकिन विघ्न मिटाने के लिए एक पूजा/तप की आवश्यकता होती है, इसलिए पार्वती को तप करने की भी आवश्यकता है -
"जौं तप करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।।
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहिं कहं सिव तजि दूसर नाहीं।। " (पेज.59)
ये नारद की तिकड़मबाज़ी की अंतिम स्थापना है कि शिव को छोड़कर इसके योग्य वर दूसरा नहीं है। पार्वती के बालमन पर नारद के उपर्युक्त कथन का कितना मनोवैज्ञानिक असर पड़ा होगा, उसको समझा जा सकता है। ये असर कुछ वैसा ही है जैसे बचपन को पार करते ही लड़कियां सुंदर पति की चाह लिए सोमवार का व्रत धारण करती हैं। पार्वती के तप से प्रभावित होकर ही यह प्रथा शायद चली ही हो। नारद(बाबा) के कथन का असर ऐसा है कि पार्वती कहती हैं -
"जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।
तजउँ न नारद कर उपदेसू।आपु कहहिं सत बार महेसू।। " (पेज.66)
इतना ही नहीं जब बतौर परीक्षक सप्तर्षि शिव पर आक्षेप लगाते हुए पार्वती से कहते हैं-
"कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ।।
पंच कहें सिवँ सती बिबाही।पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही।।" (पेज.65)
ऐसे वचन सुनकर भी पार्वती बिल्कुल ख़ामोश हैं। शिव से विवाह करने संबंधित नारद के वचनों पर उनकी अंधश्रद्धा है।
ये दृढ़ता नारद की उस तिकड़मबाज़ी की ही देन है। पार्वती की माता मैना जब ऐसे अमंगल पुरुष को अपने दामाद के रूप में देखती हैं तो वे नारद को बहुत -बुरा भला कहती हैं। पुनर्जन्म और अवतारवाद को ढाल बनाकर नारद कहते हैं -
"तब नारद सबहीं समुझावा।पूरुब कथा प्रसंगु सुनावा।
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तब सुता भवानी।।
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनी।सदा संभु अरधंग निवासिनी।।
जग संभव पालन लय कारिनि।निज इच्छा लीला बपु धारिनि।।
सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं।
हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु के जग्य जोगानल जरीं।। "(पेज.79)
स्वयं राम भी शिव को समझाते हैं कि पार्वती से तुम विवाह कर लो। सती ने ही पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया है -
"बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा।।
अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी।। " (पेज.63)
यही पुनर्जन्म और अवतारवाद तुलसी की राजनीति/वैचारिकी का सबसे अहम हिस्सा है। इसी को ढाल बनाकर वैष्णव मत और मनुवाद की स्थापना तुलसी करते हैं। इसी के माध्यम से गैर-वैष्णव और निर्गुणियों को वो धता बताते हैं।
बहरहाल मुझे इस पूरे प्रसंग में आया 'मैना' का चरित्र सबसे अच्छा लगता है। तुलसी द्वारा रचे गये सभी स्त्री-चरित्रों में सबसे पसंदीदा चरित्र। मैना पार्वती की माँ हैं। एक माँ होने के नाते उन्होंने जो कुछ भी कहा है अपने छोटे से चरित्र के बावज़ूद तुलसी के अन्य स्त्री चरित्रों पर वह भारी पड़ जाता है। नारद के वचन सुनकर वह अपने पति हिमालय से कहती हैं -
"जौं घरु बरु कुल होइ अनूपा। करिअ बिबाह सुता अनुरूपा।।
न त कन्या बरु रहउ कुंआरी। कंत उमा मम प्रान पियारी।।
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू।गिरि जड़ सहज कहिहू सबु लोगू।।
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू।।" (पेज.59)
जिस लड़के का घर-दुआर, कुल-खानदान ठीक रहे और वह मेरी बच्ची के लायक हो, उसी से पार्वती का विवाह करूंगी नहीं तो वह कुंआरी रह जाये, चलेगा। अगर ऐसा हुआ तो आप सचमुच के मूर्ख ही साबित होंगे। हिमालय द्वारा बहलाने के बाद वह फिर विवाह के समय कहती हैं -
"कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई।।
तुम्ह सहित गिरि ते गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।
घरु जाऊ अपजस होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं।।" (पेज.78)
(जिस विधाता ने तुमको सुंदरता दी, उसने तुम्हारे लिए बावला वर कैसे बनाया? जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिए था, वह बरबस बबूल में लग रहा है। मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पडूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में कूद पडूँगी। चाहे घर उजड़ जाये और संसार भर में अपकीर्ति फैल जाये, पर जीते जी मैं इस बावले वर(शिव) से तुम्हारा विवाह न करूँगी)।
मैंना नारद को उलाहना देते हुए कहती हैं -
"नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा।।
साचेहुं उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धाम न जाया।।
पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा।। " (पेज.78)
(मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिसने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया। जिसने पार्वती को ऐसा उपदेश दिया कि उसने बावले पति के लिए तप किया। सचमुच उन्हें न मोह है न माया। न धन है, न घर है और न ही स्त्री है - वह सबसे उदासीन है। इसी से वह दूसरों का घर उजाड़ने वाला है। उन्हें किसी की न लाज है न भय। भला, बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा को क्या जाने?)
मैना माँ हैं, और माँ होने के नाते तुलसी ने उनसे जो कहलवाया है उसपर रीझने का मन करता है। बावला और अड़भंगी दामाद भला किसे प्रिय होता है? स्वभाव से ही सुंदर(शक्ल का तो कहना ही क्या) पुत्री को वो ऐसे वर से कैसे विवाह कर दें? अंतिम तक वह इस विवाह के पक्ष में नहीं हैं। इसलिए मुझे तुलसी के सभी स्त्री पात्रों में मैना का चरित्र सबसे बढ़िया लगता है। पूरे रामचरितमानस में एक ऐसा चरित्र जो स्त्री होने के बावज़ूद सच को सच कहती हैं। लेकिन तुलसी की अपनी राजनीति/वैचारिकी भाग्यवाद का सहारा लेकर इस छोटे से चरित्र का अंत कर देती है -
"अस विचारि सोचहि मत माता। सो न टरइ जो रचइ विधाता।।
करम लिखा जौं बाउर नाहू।तौ कत दोसु लगाइअ काहू।। " (पेज.78)
चाहे जो भी हो, जब मैना की बात नहीं मानी गई। या यों कहें कि तुलसी ने भाग्यवाद में उनके विचारों का कायापलट कर दिया, तब मैंना की यह बेबसी (स्त्री, शोषित होने की बेबसी) झलक पड़ती है-
"कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।। " (पेज.82)
यही पंक्ति तुलसी द्वारा सृजित 'मैना' के चरित्र का निचोड़ है। सबसे बेजोड़ स्त्री-चरित्र का यही त्रासद अंत हैं।
हाँ,इस प्रसंग में एक बात और। शिव की बारात सजते और प्रस्थान करते हुए उनके तमाम गणों (भूत, बैताल आदि) का वर्णन है। लेकिन तुलसी की राजनीति/वैचारिकी में ये केवल कौतुहल के लिए है। अगर ऐसा नहीं होता तो तुलसी आगे उनका ज़िक्र जरूर करते। खासकर तब, जब विवाह होता है। विवाह और उसके बाद भोजन करते हुए सिर्फ़ देवताओं का जिक्र हैं। शिव के चेले कहीं नहीं है। यहाँ तक कि सौभाग्यवती स्त्रियाँ जो मंगलगीत (गारी) गाती हैं, उसके केन्द्र में सिर्फ़ देवतागण हैं, शिव के गण नहीं। यही तुलसी की आभिजात्यता है।
वैसे कथा ऐसे ही बनती है। जिस तरह से तुलसी ने कथा गढ़ी है, और उसको अंत तक निभाई है, वह अपने आप में अद्भुत है। नारद वर के सभी अवगुण को शिव में आरोपित कर देते हैं। शिव पत्नी-विहीन हैं। उन्हें भी किसी स्त्री/पत्नी की आवश्यकता रही ही होगी। देवों की भी अपनी आवश्यकता है। उनका मानना है कि शिव के वीर्य से उपजा कोई पुत्र ही तारकासुर नामक दैत्य का वध कर सकता है। शिव जैसे अकामी पुरुष विवाह क्यूँ करना चाहेंगे? मैं इसे इसतरह कहूंगा कि शिव जैसे पुरुष से कोई विवाह करना क्यों चाहेगा? इसीलिए नारद हिमालय और पार्वती को दिग्भ्रमित करते हैं, जिससे पार्वती और शिव का किसी तरह विवाह हो जाये। तुलसी द्वारा कथा-वर्णन की जितनी बड़ाई की जाये कम है, लेकिन इन कथाओं का उद्देश्य उतना पवित्र नहीं है जैसा हम समझते रहे हैं।
दरअसल ये प्रसंग राम को सर्वश्रेष्ठ दिखाने का प्रथम चरण है।
(7).
रामचरितमानस में शिव
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पिछली कई कक्षाओं में एक प्रश्न हमेशा पूछा जाता था - 'सिद्ध कीजिए कि तुलसी समन्वयवादी कवि हैं?' जब ऐसा प्रश्न ही रहता था तो किसी न किसी तरह से उन्हें सिद्ध करना ही पड़ता था। वे समन्वयवादी सिद्ध भी हो जाते थे। लेकिन अब मुझे तुलसी (खासकर रामचरितमानस के संदर्भ में) समन्वयवादी तो नहीं लगते। उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर लिखते समय वैष्णव और शैव (राम और शिव) के माध्यम से भी वे समन्वयवादी सिद्ध किये जाते थे। आज शिव से संदर्भित तुलसी के इसी समन्वयवाद पर बात होगी।
तुलसी चतुर कवि हैं। उनके आलोचक तो महाचतुर हैं। तुलसी को ढोते-ढोते उनके कंधे छिलते ही नहीं। ख़ैर! रामचरितमानस में शिव को तुलसी ने एक कठपुतली की तरह नचाया है। उनका कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है ही नहीं। उनकी छद्म-प्रशंसा करके उन्हें इस ग्रंथ में दोयम स्थान दिया गया है। जिस शैव धर्म का कभी डंका बोलता था, तुलसी बड़ी चतुराई से उसे वैष्णव धर्म के आगे नतमस्तक करवाते हैं। ताज्जुब तो ये कि ये काम तुलसी शिव के हाथों करवाते हैं। कहा गया है न! आप्तपुरुष की बातें ज्यादा प्रामाणिक होती हैं, लोग उनपर सहज ही विश्वास कर लेते हैं। शिव से बड़ा आप्तपुरुष है कौन? इसलिए तुलसी शिव को मोहरा बनाकर अपनी राजनीति करते हैं और बड़े सलीके से शैव धर्म की जगह वैष्णव धर्म को स्थापित कर देते हैं।
सबसे पहले तो ये देखिए कि रामचरितमानस में आये कथावाचक कौन-कौन हैं? शिव, याज्ञवल्क्य और काकभुशुण्डि। इन तीनों को ही चुनने के पीछे तुलसी की राजनीति पूरी तरह स्पष्ट है। शिव सबसे पॉपुलर देवता हैं, तब भी थे। शिव के पीछे भारत का एक बहुत बड़ा जनसमुदाय जुड़ा हुआ है। तुलसी एक चतुर नेता की तरह इस व्यापक जनसमुदाय को अपने पाले में लाने के लिए शिव का प्रयोग करते हैं। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि रामचरितमानस में शिव ही राम को तरह-तरह से व्याख्यायित कर अपना दोयम स्थान बताते रहे हैं। (इसपर आगे बात होगी)। याज्ञवल्क्य के बारे में जैसा कि मैं जानता हूँ वो एक तत्ववेत्ता ऋषि रहे हैं। तुलसी ने उनके मुंह से रामकथा कहलवाकर निर्गुण ब्रह्म को अवतारी सिद्ध किया है जिससे 'राम' को उस औपनिषदिक ब्रह्म के समक्ष रखा जा सके। काकभुशुण्डि के मुंह से कथा कहलवाने के अपने निहितार्थ हैं। चूंकि काकभुशुण्डि शैव मतावलंबी थे, वैष्णव धर्म में उनकी तनिक भी आस्था नहीं थी। तुलसी विविध रीति से उन्हें वैष्णव बनाते हैं। जो किसी दल, मत या धर्म से परिवर्तित हुए रहते हैं उनके मुँह से परिवर्तित मत/धर्म की बड़ाई करना लोगों में ज्यादा विश्वास जगाता है। काकभुशुण्डि का चरित्र इसीलिए रचा गया है।
रामचरितमानस के शुरुआत में ही तुलसी इस रामकथा (रामचरितमानस) का पूरा श्रेय शिव को दे देते हैं। शिव की आड़ लेने पर इस कथा की प्रामाणिकता में कोई संदेह नहीं रह जाता, इसलिए पूरी क्रेडिट शिव को ही -
"रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन।।
रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमय सिवा सन भाषा।।
तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।।" (पेज.34)
ये रामचरितमानस अगर तुलसी की कपोल कल्पना रही होती तो लोग शायद उसे तवज्जो न देते। तुलसी ने इसीलिए वास्तविक रचयिता शिव को माना है। तुलसी की भूमिका बस इतनी सी है कि उन्होंने उसे लिख दिया है। सो कवि वे ही हैं-
"संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।।" (पेज.35)
नाना पुराण निगमादि... कहने के बाद स्वांतः सुखाय वाले तुलसी बार-बार शिव से रामकथा उगलवाते हैं।
बहरहाल भारद्वाज मुनि जब राम के बारे में जानने के लिए याज्ञवल्क्य से पूछते हैं -
"नाथ एक संसउ बड़ मोरे। करगत बेदतत्व सब तोरे।। " (पेज.42)
तब ब्रह्मज्ञानी याज्ञवल्क्य के मुंह से तुलसी रामकथा कहलवाते हैं और इसी में वे शिव की सबसे महत्वपूर्ण स्थापना को अपदस्थ करते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी (बनारस) में मरने पर शिव मोक्ष प्रदान करते हैं। लेकिन तुलसी कहते हैं कि शिव स्वयं राम के उपासक हैं। जो उपासक हैं वो कैसे मोक्ष देने का अधिकारी हो गया? राम मोक्ष देते हैं, शिव तो एक मध्यस्थ हैं -
"राम नाम कर अमित प्रभावा।संत पुरान उपनिषद गावा।।
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी।।
आकर चारि जीव जग अहहीं।कासीं मरत परम पद लहहीं।।
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया।।" (पेज.43)
शिव जैसे अविनाशी, ज्ञानी और गुणी भगवान जब राम की ही महिमा से लोगों को भवसागर से पार लगाते हैं, तो लोग शिव के चक्कर में ही क्यों पड़ते हैं? उनको राम की शरण में जाना चाहिए। प्रकारांतर से तुलसी का यही कहना है।
इतना ही नहीं सती जिस 'राम' पर संदेह करने के कारण और शिव द्वारा परित्याग कर देने पर आत्महत्या कर लेती हैं। अगले जन्म में वे उसी 'राम' के बारे में जानना चाहती हैं। तब वहाँ भी शिव स्वयं कहते हैं कि मैं राम नाम के बल पर ही काशी में मरने वालों को मोक्ष प्रदान करता हूँ। तुलसी बम बम बोलने वाले काशी में इसतरह राम का प्रवेश कराते हैं। तुलसी ने शिव को बिल्कुल राम का एजेंट बना दिया है। सती जैसे ही राम पर संदेह करती हैं, वे कह देते हैं -
"होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।" (पेज.47)
इतना कहकर वो सती को त्याग देते हैं। राम तर्क से परे हैं। जो उनपर तर्क करेगा उसका हश्र सती जैसा होगा। पार्वती द्वारा राम के बारे में पूछने पर शिव दोबारा नाराज हो जाते हैं। वे कहते हैं -
"एक बात नहिं मोहि सोहानी। जदपि मोहबस कहेउ भवानी।।
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।।
कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिशाच।
पाषंडी हरिपद विमुख जानहिं झूठ न साच।।" (पेज.91)
तुलसी के यहाँ 'राम कोउ आना' कहना कितना बड़ा जुर्म है। मोह और माया कहकर तुलसी सबको चुप रहने की सलाह हमेशा देते रहते हैं। यहाँ वही काम शिव से करवा रहे हैं। यहाँ एक बात और दिलचस्प है कि 'राम कोउ आना' के जवाब में ही पूरी रामचरितमानस लिखी गई है। शिव पूरे ग्रंथ में यही समझाते हैं कि राम कोई दूसरे नहीं(मानव नहीं) ,वो तो लीलाधारी साक्षात् भगवान् हैं। ख़ैर आगे भी देखिए -
"जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहिं धरहिं मुनि ध्यान।
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान।।" (पेज.94)
शिव यहाँ पूरी तरह से अवतारवाद की उद्घोषणा करते नज़र आते हैं। यहाँ शिव सगुण में निर्गुण ब्रह्म को आरोपित कर देते हैं। आगे शिव पुनः कहते हैं कि मैं राम के बल पर काशी में मरने वालों को शोकरहित कर देता हूँ। यानी कि तुलसी के शिव में इतनी भी प्रभुता नहीं है कि वो अपने दम पर अपने पारम्परिक कार्य का निपटारा कर सकें -
"कासी मरत जंतु अवलोकी।जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी।।" (पेज.94)
तुलसी ने यहाँ शिव को राम के सेवक के रूप में प्रतिष्ठापित कर दिया है। और वो राम कैसे हैं - बुद्धि, मन और वाणी इन तीनों के माध्यम से जिनके होने/ना होने के विषय में तर्क नहीं किया जा सकता। तुलसी शिव के माध्यम से कहलवाते है -
"राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहिं सयानी।।" (पेज.96)
लंका काण्ड में भी शिव कुछ ऐसा ही कहते हैं -
"चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी।।
अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहिं भजहिं तर्क सब त्यागी।।" (पेज.668)
यानी अन्य विचारधारा और संवाद विशेष से राम के बारे में नहीं जाना जा सकता। वे अपने आप में अतर्क्य हैं। ध्यान में रखना है है कि ये कथित महत्वपूर्ण स्थापना तुलसी शिव के माध्यम से ही करवाते हैं। शिव ही तुलसी की राजनीति के वो मोहरे हैं जो राम को ब्रह्मत्व के करीब लाकर खड़ा करते हैं, अवतारवाद की प्रतिष्ठा करते हैं। तुलसी उन्हीं के मुख से 'जब जब होई धरम कै हानी... " उगलवाते हैं।
राम द्वारा रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना और पूजन को लोग तुलसी का समन्वयवाद कहते हैं। आलोचक कहते हैं कि तुलसी ने राम से शिव का पूजन कराकर शैव और वैष्णव दोनों का समन्वय किया है। लेकिन ऐसा नहीं है। दक्षिण भारत में शिवलिंग की स्थापना वैष्णव धर्म की कूटनीति का हिस्सा है। तुलसी ने राम से इस संदर्भ में जो कहलवाया है उससे इस राजनीति को समझा जा सकता है -
"सिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहिं न पावा।।
संकर विमुख भगति चहि मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास।।" (पेज.613)
बात ये है कि राम द्वारा दिया गया यह चतुराईपूर्ण भाषण है क्योंकि वे ऐसा दक्षिण में बोल रहे हैं। वे जो कहना/कहलवाना चाहते थे उसकी भूमिका भर है। जो वास्तविकता है या तुलसी की जो मंशा है वह इसी के तुरंत बाद स्पष्ट हो जाती है -
जे रामेश्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।
जो गंगा जलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि।।
होइ अकाम जे छल तजि सेइहि।भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।
मम कृत सेतु जों दरसनु करिहीं। सो बिनु श्रम भवसागर तरिहीं।। "(पेज.613)
शिव की इतनी महिमा के बावजूद भी तुलसी ये कहने से नहीं चूकते कि जो रामेश्वरम् में ये-ये करेगा उसे शिव 'राम की भक्ति देंगे'। यहाँ शिव की कोई प्रभुता ही नहीं है। समन्वय की आड़ में शिव को दोयम बताने की ये साजिश नहीं तो क्या है? तुलसी को ये लिखने से तो स्पष्ट ही हो जा रहा है कि मुक्ति तो राम ही देंगे। शिव एजेंट मात्र हैं। वे भक्त और भगवान के बीच के दलाल तक सीमित रह गये हैं। और हाँ अंतिम पंक्ति शिव को पूरी तरह से दरकिनार करने के लिए काफ़ी है। तुलसी कितनी चतुरताई से राम से कहलवाते हैं -"मेरे द्वारा बनाये गये पुल का जो दर्शन करेगा वह बिना परिश्रम किये ही मुक्ति को प्राप्त कर लेगा।" अंतिम लक्ष्य यही है। वहीं बगल में रामेश्वरम् का दर्शन/पूजन करने के लिए शिव को मध्यस्थ बनाया गया है। उनके माध्यम से शिव 'राम' की भक्ति देते हैं। और वहीं दूसरी ओर पुल का दर्शन मात्र से वही फल प्राप्त हो रहा है। यही तुलसी का समन्वयवाद है। शिव को नीचे और राम को ऊपर दिखाने को ही यदि विद्वान समन्वयवाद कहेंगे, तो हमें उनकी प्रतिबद्धता पर शक तो जरूर ही करना चाहिए।
उत्तरकाण्ड में तो राम की प्रभुता देखने लायक है। राजसिंहासन पर बैठते ही चारों वेद आकर उनकी स्तुति करते हैं। वेद कहते हैं हम आप के सगुण रूप के उपासक हैं। देवता भी स्तुति करते हैं। इसी क्रम में शिव भी त्राहिमाम्-त्राहिमाम् करते हुए राम की स्तुति करते हैं। समन्यवादियों से ये पूछना चाहिए कि जिस तरह की दीनता शिव में है और जिस तरह वे राम की स्तुति किये हैं, क्या राम के मुख से भी कभी ऐसा कुछ निकला है? क्या राम कभी ऐसा कहे हैं -
"बार बार वर माँगउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।" (पेज.733)
पूरे रामचरितमानस में स्तुति करने का जिम्मा शिव, याज्ञवल्क्य आदि लोगों के मत्थे चढ़ा है।
शिव से संबंधित तुलसी की राजनीति "काकभुशुण्डि-गरुड़ प्रसंग" में खुलकर सामने आ गई है। इस प्रसंग पर आगे स्वतंत्र रूप से बात होगी। लेकिन यहाँ बस इतना ही कहना है कि काकभुशुण्डि का चरित्र का सृजन पाठकों और कथित भक्तों को डराने के लिए किया गया है। डराने से तात्पर्य यह है कि काकभुशुण्डि शैव थे, कट्टर शैव थे, उसपर वे शूद्र थे। अन्य किसी देव पर उनकी आस्था नहीं थी -
"मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह।
हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह।। " (पेज.801)
तुलसी का मंतव्य यही है अगर कोई शूद्र है और वैष्णव नहीं है उसकी गति काकभुशुण्डि जैसी ही होगी। वह करोड़ों जन्मों तक विविध योनियों में भटकता रहेगा। गुरु का अपमान करना तो इस कथा में तुलसी ढाल के रूप में प्रयुक्त करते हैं। असलियत तो यह है कि उनकी जो गति हुई उसके पीछे उनका वैष्णव धर्म में आस्था न होना था। विविध रीति से काकभुशुण्डि शैव से वैष्णव बनाये जाते हैं। दिलचस्प बात ये है कि ये सब क्रिया स्वयं शिव के हाथों सम्पन्न होती है। शिव स्वयं काकभुशुण्डि के माध्यम से वैष्णव धर्म और वर्णव्यवस्था की स्थापना करते हुए वर देते हैं -
"पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरे। राम भगति उपजिहि उर तोरे।।
सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।।
अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेसु संत अनंत समाना।।" (पेज.805)
इस प्रसंग में भी शिव वैष्णव धर्म के प्रचारक और राम के एजेंट के रूप में आये है।
पूरे रामचरितमानस में, शिव के प्रसंग में तुलसी की राजनीति/वैचारिकी लोगों को ऊपर से देखने पर समन्वयवादी लगती है। यही विडम्बना है। असल बात तो यह है कि तुलसी शिव का उल्लेख सिर्फ़ उनके सिर पर पैर रखकर राम तक छलांग लगाने के लिए ही करते हैं। शिव हमेशा दोयम हैं। उनका कोई स्वतंत्र चरित्र नहीं है, न कोई प्रभुता है। यहाँ तक कि रामचरितमानस के शिव अपनी पत्नी सती की आत्महत्या के अपराधी भी हैं। शिव में विशेष आस्था रखने वाले, उनसे प्रेम करने वाले दो प्रमुख पात्र - सती और काकभुशुण्डि जब राम के प्रति आस्थावान नहीं होते उन्हें विविध रीति से रामभक्त बनाने का काम शिव ही करते हैं।
कुल मिलाकर रामचरितमानस के शिव, तुलसी की घनघोर राजनीति के शिकार हुए हैं और तुलसी इस मामले में समन्वयवादी तो कतई नहीं है।
(8).
रामचरितमानस में ब्राह्मण
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शुरुआत में ही स्पष्ट कर दूँ कि ब्राह्मण एक जाति है। और ऐसी जाति, जो हमेशा से अपने को सामाजिक पायदान पर सबसे ऊपर रखा है। रामचरितमानस में आये ब्राह्मण विषयक संदर्भ भी इसी से संबंध रखते हैं। सुधीजन इन्हें पण्डित/ज्ञानी के पर्याय के रूप में न देखें, सिर्फ़ एक जाति विशेष मानें।
रामचरितमानस की सबसे बड़ी स्थापना है कि ब्राह्मण 'कथित' ब्रह्म से भी बढ़कर है। इसकी पुष्टि स्वयं राम करते हैं। नहीं! अगर इसे ऐसे कहें कि इसकी पुष्टि स्वयं तुलसी करते हैं तो ठीक रहेगा। पात्र विशेष तो रचनाकार के हाथ का कठपुतली मात्र है। रचनाकार जहाँ चाहे, जैसा चाहे उसे नचा दे। यहीं रचनाकार की अपनी राजनीति काम करती है। उत्तरकाण्ड तो तुलसी की राजनीति का पिटारा है। अन्य काण्डों में कथा की आड़ में उनकी राजनीति चलती है। इन्हीं काण्डों में लोग गच्चा खा जाते हैं। हम इन्हें मात्र मध्यकालीन भाव बोध कहकर चलता नहीं कर सकते क्योंकि रामचरितमानस की एक वर्ग विशेष में लोकप्रियता/अंधभक्तता और उसका तदरूप में स्वीकारीकरण आज के समय में भी हमारी मध्यकालीन चेतना को खाद-पानी देते रहते हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं कि आधुनिक मानव अपने मध्यकालीन मूल्यों को कायम रखने के लिए बार-बार रामचरितमानस में प्रवेश कर जाता है। रामचरितमानस उसके लिए जमीन तैयार करती है। ख़ैर! हम वापस आज के विषय पर आते हैं।
"बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।" (पेज.145)
राम का अवतार आमजनमानस की पीड़ा को हरने के लिए नहीं हुआ। ब्राह्मण, गाय, देवता, संत के हित के लिए वे अवतार लेते हैं। दिलचस्प ये है कि इसमें से मनुष्य रूप में ब्राह्मण और संत ही हैं। इसमें भी तुलसी की दिलचस्पी ब्राह्मण में कुछ ज्यादा ही रही है।
आप मुझ पर गुस्सा हो सकते हैं जब मैं ये कहूँ कि अगर ब्राह्मण नहीं होते तो रामचरितमानस की रामकथा ही नहीं बनती। रामचरितमानस लिखा ही नहीं जाता। राम रामचरितमानस के केन्द्र में नहीं हैं। केन्द्र में है ब्राह्मण। कैसे? आइये देखते हैं -
सबसे पहले तो यही देखें कि राम का जन्म क्यों हुआ? मूल प्रश्न तो यही है। इसका उत्तर तलाशने पर आपको मिलेगा कि ब्राह्मणों का श्राप इसके लिए उत्तरदायी है। राम के जन्म/अवतार लेने के कई प्रसंग हैं, लेकिन जो सबसे मजबूत प्रसंग है जिसपर तुलसी कई पृष्ठ खपाये हैं, वह है प्रतापभानु प्रसंग।
प्रतापभानु विष्णु का अनुयायी था। वेदों के अनुसार राज्य चलाता था। न्यायप्रिय और लोकप्रिय शासक था और ऊपर से ब्राह्मण भक्त भी था। लेकिन अनजाने में हुई गलती से ब्राह्मणों द्वारा उसे श्राप दिया जाना इसबात का प्रमाण है कि विष्णु से भी ऊपर ब्राह्मण हैं। इसी प्रसंग की उक्ति है -
" तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा।।
जौं बिप्रन्ह बस करेहुँ नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा।।
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहेउँ दोउ भुजा उठाई।।
बिप्र श्राप बिनु सुनि महिपाला। तोर नास नहिं कवनेउँ काला।।"(पेज.125)
एकतनु नामक प्रतापभानु के प्रतिद्वंद्वी चरित्र द्वारा दिया गया यह अल्टीमेटम है। इससे डरकर प्रतापभानु ब्राह्मणों को खुश करने के इरादे से एक लाख ब्राह्मणों को नेवत देता है। वह विभिन्न प्रकार के पशुओं का माँस पकवाता है। (तुलसी जैसे वैष्णव कवि ने ऐसा लिखा है) लेकिन उसका रसोइयां षड्यंत्र के तहत उसी में ब्राह्मण का माँस मिलाकर पका देता है -
"बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र मांसु खल साँधा।।" (पेज.130)
अब बुरा होना ही था। ब्राह्मणों को जब आकाशवाणी द्वारा इसका भान होता है तब वो प्रतापभानु को राक्षस होने का श्राप दे देते हैं। यही प्रतापभानु रावण बनता है और राम का अवतार भी इसी के लिए होता है। आप कितने भी बड़े विष्णु भक्त हों, अगर ब्राह्मण भक्त नहीं हैं तो आपका पतन निश्चित है - ऐसी तुलसी की मान्यता है।
रामचरितमानस के प्रमुख पात्र 'राम' जिसे तुलसी ने जगह-जगह ब्रह्म जैसी अनेक विशेषणों से विभूषित किया है, वह स्वयं कहते हैं -
"मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भुसूर रोषू।।" (पेज.352)
ब्राह्मणों को खुश रखना ही सभी मंगलों का मूल है। अगर वो नाराज़ हो गये तो उनके क्रोध से 'करोड़ों' कुल जलकर भस्म हो जायेंगे।
वनवास के समय ज्ञान और भक्ति के संदर्भ में लक्ष्मण द्वारा पूछने पर वे कहते हैं -
"भगति के साधन कहहुँ बखानी। सुगम पंथ मोहिं पावहिं प्रानी।।
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीति।। " (पेज.506)
यहाँ राम ,लक्ष्मण से स्वयं अपनी भक्ति करने को कहते हैं। और इस भक्ति का प्रथम चरण है - ब्राह्मणों की पूजा और वर्णाश्रम व्यवस्था में मान्यता। इतना ही नहीं, सीताहरण के बाद जब राम कबंध नामक राक्षस को मारकर कथित मुक्ति प्रदान करते हैं। कबंध अपने पूर्वजन्म में गंधर्व होने और क्रोधी ब्राह्मण दुर्वासा से शापग्रस्त होने का उल्लेख करता है तब राम उससे कहते हैं -
"सुनु गंधर्व कहहुँ मैं तोहीं। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।
मन क्रम वचन कपट तजि जो कर भुसुर सेव।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।" (पेज.526)
ब्राह्मण की श्रेष्ठता ही राम का धर्म है। उनकी भक्ति का मूल है। राम जैसे आप्त पुरुष और तथाकथित ब्रह्म के मुख से ऐसी बात कहलवाना तुलसी की राजनीति नहीं तो क्या है? तुलसी ने राम को भी नहीं छोड़ा है, वे भी उनके मोहरे हैं।
सुदंरकाण्ड में यही राम कहते हैं -
"सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।। " (पेज.600)
ब्राह्मण पूजा यहाँ भी अनिवार्य है।
राम-रावण युद्ध हो रहा है। राम को देवताओं द्वारा रथ प्रदान किया जाता है जिससे कि वे उसपर आरूढ़ हो रावण का वध कर सकें। यहाँ भी राम ब्राह्मणों को प्रणाम कर युद्ध के लिए रवाना होते हैं -
"अस कहि रथ रघुनाथ चलावा।बिप्र चरन पंकज सिरु नावा।। " (पेज.683)
उत्तरकाण्ड में राम एक बार सभी पुरवासियों को बुलाकर घोषणा करते हैं -
"पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।।
सानुकूल तेहिं पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।। " (पेज.756)
इसी काण्ड में काकभुशुण्डि से राम अपने ईश्वरत्व की चर्चा करते हुए कहते हैं -
"सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सबते अधिक मनुज मोहिं भाए।।
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महँ निगम धरम अनुसारी।। " (पेज.785)
उपर्युक्त उद्धरण तुलसी के यशस्वी पात्र 'राम' के मुख से निसृत हुए हैं। तुलसी ने राम को औपनिषदिक ब्रह्म घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूरे रामचरितमानस में वे ब्रह्म की सभी अनिवार्य शर्तों के साथ सर्वव्यापी हो गए। इस हाल में जब राम स्वयं ब्रह्म हैं, दुनिया के एकमात्र निर्माता और निर्णायक हैं; तब उन्हीं के द्वारा उन्हीं द्वारा सृजित एक प्राणी विशेष (ब्राह्मण) का गुणगान करना उनके ब्रह्मत्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। तुलसी अपने ब्राह्मणवादी, वर्णव्यवस्थावादी प्रक्षिप्त/सुचिंतित चिंतन के बदौलत अपने प्रमुख पात्र 'राम' को भी ब्राह्मण धर्म के पुरोधा के रूप में घसीट लाते हैं। यहाँ यह जानना दिलचस्प होगा कि जो ब्रह्म है (सर्वसमर्थ है) वह भी ब्राह्मण नामक प्राणी के मुठ्ठी में है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि रामचरितमानस के केन्द्र में 'ब्राह्मण' है, जिसकी पूजा-अर्चना स्वयं राम करते रहते हैं।
अब आगे अन्य प्रसंगों पर चर्चा होगी। तुलसी रामचरितमानस के शुरुआत करते समय मंगलाचरण के बाद सबसे पहले ब्राह्मणों की वंदना करते हैं -
"बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना।।" (पेज.3)
इसके बाद संत-असंत आदि की वंदना और व्याख्या कई पृष्ठों में करते हैं। इसके साथ ही आगे शिव विवाह प्रसंग में आपको ये पंक्ति साधारण लग सकती है -
"बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदय सुमिरि निज प्रभु रघुराई।। " (पेज.81)
लेकिन ये उतनी साधारण नहीं है। तुलसी मात्र एक ही पंक्ति में शिव को ब्राह्मण और राम दोनों का भक्त बताने में कामयाब हुए हैं।
वशिष्ठ, विश्वामित्र और अगस्त्य ये तीन ब्राह्मण राम को न सिर्फ़ ब्राह्मण भक्त बनाते है बल्कि उन्हें ब्रह्म घोषित करके साम्राज्यवादी भी बनाते हैं। इनके संस्कार ही राम को किन्हीं मामलों में असंवेदनशील और स्त्री-विरोधी बनाने में सहायक हुए हैं। ताड़का, शूपर्णखा को कुरूप करना एवं वध करना इसका प्रमाण है। राम ब्राह्मण भक्त हैं, इस बात की खुशी विश्वामित्र को तब और होती है जब वे अपने पिता, संबंधी को छोड़कर उनके साथ चल देते हैं -
" प्रभु ब्रह्मन्य देव मैं जाना। मोहिं निति पिता तजेउ भगवाना।। "(पेज.157)
ब्राह्मणों को दान देने की परम्परा अब भी है, तब भी रही होगी। रामचरितमानस में राम ब्राह्मणों को विभिन्न प्रसंगों में दान देते हैं। सीता स्वयंवर के लिए जाते समय वे गंगा नदी में स्नान करने के उपरांत दान देते हैं -
" तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए।।" (पेज.159)
इसी तरह राम वन जाने से पूर्व ब्राह्मणों को बुलाते हैं और पूरे एक साल का राशन उन्हें दिलवाकर तब वन जाते हैं -
"कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र वृंद रघुबीर बोलाए।।
गुरु सन कहि बरषासन दीन्हें। आदर दान बिनय बस कीन्हें।। " (पेज.320)
लंका फ़तेह के बाद अयोध्या वापस लौटने के क्रम में प्रयाग में स्नानोपरांत ब्राह्मणों को दान देने का वर्णन मिलता है -
"पुनि प्रभु आई त्रिवेनी हरषित मज्जनु कीन्ह।
कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह।।" (पेज.715)
इसके अतिरिक्त उत्तरकाण्ड में तो ब्राह्मणों की बहार है। तुलसी कहीं-कहीं उनसे क्षुब्ध भी हैं। क्षुब्धता का कारण ब्राह्मणों में वर्णसंकर पैदा हो जाना है। उनका वर्णव्यवस्था से विचलन उन्हें व्यथित करता है। इसी काण्ड में काकभुशुण्डि को एक ब्राह्मण के अपमान के कारण करोड़ों योनियों में भ्रमण करने का श्राप मिलता है। गुरु और विष्णु का अनादर करना तो एक बहाना मात्र है। असल बात ये है कि काकभुशुण्डि ब्राह्मण-गुरु और ब्राह्मण-धर्म के विरुद्ध जाने पर तुलसी के शिकार होते हैं और वह साजिशतन वैष्णव एवं ब्राह्मण धर्म के अनुयायी बना दिये जाते हैं -
"सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।।
अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेसु संत अनंत समाना।। " (पेज.805)
अब अंत में रामकथा किसे सुनना चाहिए? इसके संदर्भ में तुलसी ने एक विधान रचा है। जो ब्राह्मण से द्रोह करने वाले हैं उनके लिए ये रामकथा नहीं है। उन्हें नहीं सुनाना चाहिए -
द्विज द्रोहिंहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।।
राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह के संत संगति अति प्यारी।। "(पेज.829)
ब्राह्मण और संत का घालमेल करना कोई तुलसी से सीखे। तुलसी कहीं-कहीं इनको पर्यायवाची के अर्थ में चित्रित कर दिये हैं।
रामचरितमानस में ब्राह्मण और ब्राह्मण-धर्म की स्थापना व रक्षा के लिए विशेष प्रयत्न किये गये हैं। 'राम' जैसे ब्रह्म (?) को इन ब्राह्मणों का पिछलग्गू बनाया गया है। तुलसी द्वारा रामकथा कहना तो बहाना मात्र है। असल में राम को मोहरा बनाकर मनुवादी व्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान करना तुलसी का लक्ष्य रहा है। और वे इस लक्ष्य में काफी हद तक सफल भी हुए हैं।
(9).
रामचरितमानस में हाशिये के लोग -1
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इस विषय पर बात करने को तो बहुत है, लेकिन मैं अपनी बात संक्षेप में रखूँगा। संक्षेप का मतलब कुछ पात्र विशेष पर ही बात होगी। ऐसे पात्र जो कथित मुख्यधारा के केन्द्र में नहीं है। तुलसी की निगाह में जो पतित हैं, असभ्य हैं। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से तथाकथित पिछड़े हैं। मंथरा, निषादराज गुह, आदिवासी जन एवं नारी वर्ग पर ही बात करने का मन है।
सबसे पहले मंथरा से ही बात शुरू करते हैं। अयोध्याकाण्ड में मंथरा पूरे रामकथा की दृष्टि से निर्णायक के रूप में आती हैं। मंथरा रानी कैैकेयी की दासी है, जो उनके नैहर से ही आयी हुई हैं। वो कुरूप हैं और उम्र में कैकेयी से बहुत बड़ी हैं। अपनी स्वामिनी कैकेयी की शुभचिंतक हैं और उनका सभी प्रकार से हित करने वाली हैं। तुलसी के अनुसार वह मंदबुद्धि भी हैं। देवता अपना काम साधने के लिए इन्हीं मंथरा के जिह्वा में सरस्वती का प्रवेश कराते हैं और मंथरा राम के राजतिलक का सब किया-कराया काम बिगाड़ देती हैं। इस आधार पर तो मंथरा का कोई दोष नहीं होना चाहिए। पूरा दोष तो देवताओं का और देवी सरस्वती का होना चाहिए था। लेकिन तुलसी पूरा कलंक मंथरा के सिर पर ही मढ़ देते हैं।
तुलसी इस संदर्भ में लिखते हैं -
"नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि।
अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।" (पेज.275)
तुलसी स्वयं कहते हैं कि सरस्वती ने मंथरा की बुद्धि फेरकर अपयश की पिटारी/खान बना दिया। मंथरा मंदमति भी है और ऊपर से सरस्वती ने उसके मति को फेर भी दिया है। इसके बावजूद तुलसी उसको कितने घृणित तरीके से याद किये हैं। उसका चित्रण करते हुए तुलसी ऐसे-ऐसे उपमाओं, रूपकों और विशेषणों का सहारा लेते हैं जो उनकी मतिकुंद वैचारिकी को ही सामने लाता है। उदाहरणार्थ कुछ पंक्ति देखिए -
"करइ बिचार कुबुद्धि कुजाती।" (पेज.276)
"तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनी। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनी।।" (पेज.276)
यहाँ मंथरा के लिए कुबुद्धि, कुजाती, पापिनी कहा गया है इसके साथ ही उसकी तुलना साँपिनी से किया गया है। इतना ही नहीं तुलसी कैकेयी के मुख से कुछ ऐसा कहलवाते हैं -
"काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।
तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसकानि।।" (पेज.277)
अर्थात् काना, लूला-लंगड़ा, कूबड़ा और विशेषकर स्त्री और दासी को कुटिल और जालसाज़ जानना चाहिए ;ऐसा कहकर कैकेयी मुस्कुराने लगी।' कितना अमानवीय वक्तव्य है यह?
इसके अतिरिक्त तुलसी ने मंथरा के लिए घरफोरी, साढ़ेसाती, पापिनी, करोड़ों कुटिलों की शिरोमणि आदि अनेक विशेषणों का प्रयोग किया है।
ये ठीक है कि कथा में किसी पात्र को निगेटिव रोल अदा करना पड़ता है। लेकिन मंथरा का जैसा और जिन विशेषणों से चित्रण किया गया है वो ठीक नहीं है। जब तुलसी को पता है (पाठक को भी पता है) कि मंथरा वैसी कुटिल(?) नहीं थी, देवताओं ने उसकी मति फेरकर कुटिल बनाया है। तब ऐसे पात्र का चित्रण करते हुए तुलसी इतने संवेदनहीन कैसे हो गये? कहीं इसके पीछे उनकी जाति/वर्णवादी सोच तो काम नहीं कर रही? सच ही है एक तो स्त्री उसपर से दासी, इसे तुलसी बिना धिक्कारे-गरियाये कैसे पचा पाते?
दूसरे प्रमुख पात्र हैं निषादराज। ये निषादों के राजा हैं ( वे अन्य जातियों के राजा नहीं रहे होंगे, नहीं तो उन्हें निषादराज न कहा जाता)। प्रयाग से ही कुछ दूर श्रृंगवेरपुर में रहते हैं। तुलसी ने इन्हें निम्न जाति का बताया है। ये अछूत भी थे। इसीकारण वशिष्ठ से गले लगवाकर तुलसी प्रगतिशील भी बन गये। (इस प्रसंग में एक त्रुटि है जिसका संकेत मैंने पहले की किसी पोस्ट में किया है) रामचरितमानस में निषादराज की चर्चा तब आती है जब राम वनगमन करते हुए इनके पास आकर रूकते हैं। राम निषादराज को मित्र कहते हैं।
एक संवाद में लक्ष्मण उससे कहते हैं -
"राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।।
सकल बिकार रहित मतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।।
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुरहित लागि कृपाल।
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल।।" (पेज.330)
क्या यहाँ ऐसा नहीं लगता कि लक्ष्मण "राम कोउ आना" वाली बात का निषेध कर रहे हैं? भोलेभाले निषाद को यह कह रहे हैं कि जो राम आपके यहाँ रुके हैं वे दशरथ-सुत बाद में है पहले निर्गुणिया ब्रह्म हैं। लक्ष्मण प्रकारांतर से यहाँ राम की भक्ति का उपदेश भी दे रहे हैं।
निषादराज के बारे में भरत से मिलते समय तुलसी लिखते हैं -
"लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाहँ छुइ लेइअ सींचा।।
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।।" (पेज.397)
निषादराज का शास्त्र और लोक दोनों में निम्न-स्थान है। अर्थात् वह निम्न जाति से ताल्लुक रखता है जिसकी छायामात्र छू लेने पर लोगों (उच्च वर्ण) को नहाना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति से भरत गले मिल रहे हैं। और निषादराज भी इससे खुश है -
"कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहर सब भाँती।।
राम कीन्ह आपन जबहीं ते। भयउँ भुवन भूषन तबहीं ते।। " (पेज.399)
लेकिन देखना यह है कि तुलसी की नजर में 'राम' कहना एवं उनका भक्त होना सभ्यता का प्रतीक है। जब तक जो भी राम से किसी प्रकार से जुड़ा नहीं है, तुलसी की नजर में वह असभ्य ही है। निषादराज भी ऐसे ही दिग्भ्रमित हो अपने को अब सभ्य मानने लगा है। वह कपटी, कायर, बुद्धिहीन, कुजाती (अछूत जाति) था। तथाकथित सभ्यों के बीच उसकी कोई पूछ नहीं थी, लेकिन राम के संपर्क से वह पवित्र भी हो गया और उसकी सारी कलुषता धुल गई। लोग उसे अपने बीच में स्थान देने लगे। कोई उसे गले लगाता है तो कोई उसके भाग्य की सराहना करता है।
यही निषादराज राम का मित्र कम, भक्त ज्यादा बन जाता है। भक्त बनने पर भगवान् को उससे भेदभाव नहीं करना चाहिए। लेकिन तुलसी के यहाँ एक नीच (?) कैसे इससे मुक्त हो सकता है। भले ही राम उसे गले लगा लें। उसे जमीन पर लोटते देख भरत भी खींचकर गले लगा लें। यहाँ तक की वशिष्ठ भी तुलसी की असंगत करतूत से उसे गले लगा लें। लेकिन वह रहेगा नीच ही, वह समकक्षी तो नहीं ही बन पायेगा। अगर वह ऐसा बन पाया होता तो तुलसी के अयोध्याकाण्ड में आया यह लघु चरित्र लंकाकाण्ड-उत्तरकाण्ड तक आते-आते सम्मान का पात्र बन जाता। कम से कम वह नीच तो नहीं रहता। लंका फतेह के बाद राम की जब निषादराज से भेंट होती है तब भी तुलसी उसे सब प्रकार से नीच ही कहते हैं -
"सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो" (पेज.(716)
सभी प्रकार से नीच निषादराज को राम ने भरत के समान जानकर हृदय से लगा लिया। तुलसी से ये पूछना चाहिए कि पूरा रामचरितमानस खत्म होने को है, बताइये राम के प्रिय भक्त/मित्र की नीचता कब खत्म होगी? तुलसी अपने पाठकों/भक्तों को बारबार दिखा रहे हैं कि देखो! वह नीच ही है। ये दिखाना सीधे-सीधे इस बात का संकेत है कि तुलसी की निगाह में वर्णव्यवस्था के प्रति आदर और निम्न जातियों के प्रति कितनी कुँठाएँ भरी पड़ी हैं।
अगली चरित्र हैं शूर्पनखा। ये रावण आदि की बहन थीं। पूरे रामचरितमानस में मामूली सी जगह इनके नाम हुई है। लेकिन उतनी ही भूमिका पूरे कथा को बदल देने वाली है। यानी कि महत्वपूर्ण भूमिका है इनकी। ये लंका की राजकुमारी भी रही होंगी, इसमें संदेह नहीं करना चाहिए। एक बार वन में घूमते हुए राम-लक्ष्मण पर इनकी निगाह पड़ती है। सूपनखा कामातुर हो जाती हैं। यहाँ ये भी देखना चाहिए कि सूपनखा द्वारा राम/लक्ष्मण को दिया गया काम-प्रस्ताव देव 'राम/लक्ष्मण' और राक्षसिनी 'सूपनखा' के बीच नहीं है। बल्कि दो देशों के राजकुमार-राजकुमारियों के बीच भी है। इस बाबत ये जायज़ भी है। ख़ैर! बात बहुत लंबी हो जायेगी और मुझे तो रामचरितमानस पर ही केन्द्रित रहना है। इसलिए सिर्फ़ इसी ग्रंथ से बात करते हैं। सूपनखा राम-लक्ष्मण के सौन्दर्य को देख कर कामांध हो जाती है और राम -लक्ष्मण की तरफ रुख़ करती है। दोनों ओर से उसकी खिल्ली उड़ाई जाती है जिससे उसे क्रोध आ जाता है। उसे क्रोधित देखकर सीता डर के मारे काँपने लगती हैं। सीता के डर के निवारण के लिए एक स्त्री के सामने एक स्त्री का नाक-कान काट दिया जाता है। भयंकर रूप से कुरूप हुई सूपनखा अपने भाइयों के पास जाती है और उनसे युद्ध करने को कहती है। इसी क्रम में युद्ध में उसके लगभग सभी भाई राम के हाथों मारे जाते हैं। बस सूपनखा का चरित्र रामचरितमानस में इतना ही है।
लेकिन सूपनखा के बारे में तुलसी का यह वक्तव्य गौर करने लायक है -
" भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।
होइ बिकल सक मनहिं न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।" (पेज.507)
इस चौपाई में काकभुशुण्डि कहते हैं - "हे गरुड़! जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश को देखते ही सूर्यकांत मणि पिघलने लगता है उसी प्रकार नारी, सुंदर पुरुष को देखते ही अपने मन को नहीं रोक सकती, भले ही वह उसका भाई, पिता और पुत्र क्यों न हो!"
यहाँ ये बताना जरूरी है कि यह नारी सूपनखा ही है। अगर यही 'सुभाषित' सीता पर लागू होता तो?
लेकिन ऐसा नहीं होगा/होता। सूपनखा ने कम से कम भाई, पुत्र और पिता से काम-निवेदन तो नहीं किया था। वह राजकुमारी थी और एक राजकुमार से इसकी पेशकश की थी। बहुपत्नीत्व वाले सामंती समाज में अगर वे उनको पत्नी रूप में भी स्वीकार कर लेते, तो कम से कम बिना युद्ध किये (एक कूटनीति के तहत) लंका तक उनका साम्राज्य वैसे भी फैल जाता। व्यापक नरसंहार से बचा जा सकता था। लेकिन उनके लिए तो वह रिपुभगिनी थी -
" गइ लछिमन रिपुभगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदुबानी।।" (पेज.507)
उसे पहले ही शत्रु की बहन के रूप में लक्ष्य किया गया है, जबकि राम की रावण से शत्रुता तो सीताहरण बाद होनी चाहिए। लेकिन तुलसी पहले ही उसे शत्रु भगिनी घोषित कर देते हैं। अब जब जो शत्रु है उसके साथ हर प्रकार का व्यवहार जायज़ है। तो इस आधार पर तुलसी के यहाँ नाक-कान काटना भी जायज़ होना चाहिए। और तुलसी ने ऐसा किया भी। दूसरी बात ये है कि तुलसी की सूपनखा पहले कोई आक्रमण नहीं करती। न ही किसी को शारीरिक चोट पहुँचाने की मंशा रखती है। फिर भी शत्रु की बहन होने के नाते उसका नाक-कान काटना राम जैसे पुरुषोत्तम और आदर्शवादी पुरुष के लिए कितना जायज है? एक तरफ राम की युद्ध की नीति रही है कि पहले शत्रु पक्ष आक्रमण करेगा, फिर वह करेंगे। सूपनखा प्रसंग में वह पहले ही क्यों आक्रमण कर देते हैं? उनकी नीति, उनकी मर्यादा कहाँ गई? इन सबसे बड़ी बात सूपनखा एक स्त्री है। और स्त्री होने के नाते उसके सौंदर्य को विखण्डित करना राम के(तुलसी के भी) कौन से पुरुषार्थ को दर्शाता है? क्या यह शत्रु पक्ष को चुनौती देने के लिए ही ऐसा(घृणित) कृत्य किया गया? -
" सीतहिं सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सब सयन बुझाई।।
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताकें कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।" (पेज.508)
यदि रावण को ऐसे ही चुनौती देना तुलसी/राम को अभीष्ट था तो इससे घिनौनी चुनौती कुछ नहीं हो सकती। जहाँ एक स्त्री (सूपनखा) को मोहरा बनाकर, यहाँ तक उसे कुरूप करके अपने शत्रु को ललकार दिया जाय। बहरहाल रामचरितमानस में सूपनखा ने एक स्त्री होने, उसमें भी एक विजातीय स्त्री होने का दुख भोगा; जो दुर्भाग्य से शत्रु की बहन भी थी।
(10).
रामचरितमानस में हाशिये के लोग - 2
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पिछली कड़ी में इस विषय के अंतर्गत मंथरा, निषादराज और शूपर्णखा पर बात हुई थी। अब आगे रामचरितमानस में आये कोल-भील संबंधी प्रसंग पर बात होगी। राक्षस, वानर आदि को मैं यहाँ छोड़ रहा हूँ, इसके लिए माफ़ी।
रामचरितमानस में कोल-किरात जैसी आदिवासी जातियों का उल्लेख बहुत कम ही आया है। सिर्फ़ एक दो जगह को छोड़कर ये जातियाँ उपमा/उपमेय का ही निकृष्ट अंग बनकर रह गयी हैं। सबसे प्रमुख रूप से इनका दर्शन चित्रकूट प्रसंग में होता है। जब राम आदि चित्रकूट में आकर बसते हैं तब इनके रहने-खाने का जुगाड़ इन्हीं जातियों के जिम्मे जाता है। लेकिन तुलसी की अतिशय कल्पना/राजनीति इनके प्रसंग को किरकिरा कर देती है।
बात ये है कि तुलसी जंगल में रहने वाले आदिवासी जातियों को दरकिनार कर 'रेडीमेड' आदिवासी पैदा करते हैं। रेडीमेड कोल-किरात बने विभिन्न देवता राम की कुटिया बनाते हैं। वे कहते हैं कि राम को चित्रकूट में बसता देख विभिन्न देवताओं ने किरातों का वेष धारण कर उनकी कुटिया का निर्माण किया -
"अस कहि लखन ठाहुँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।।
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुरथपति प्रधाना।।
कोल किरात वेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।।
बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक विसाला।।" ( पेज.357)
यहाँ यह जानना दिलचस्प होगा कि देवता कोल-किरात के वेष में आये जबकि वहाँ पहले से ही ये जाति मौजूद थी। अब प्रश्न तो बनता है कि जंगल में रहने वाली ये जाति क्या कुटिया-निर्माण करना नहीं जानती थी? या स्वयं राम (तुलसी को भी) को यह अभीष्ट नहीं था कि कोई आदिवासी उनकी कुटी बनाये? इतना ही नहीं वहाँ रहने वाले कोल-किरात को भी ये भनक बाद में लगी कि राम चित्रकूट में आकर बस गये हैं। क्रम देखिए, सबसे पहले कोल-किरात के वेष में देवता आते हैं। फिर नाग, किन्नर, दिग्पाल आते हैं। इसके बाद मुनिगण आते हैं। और सबसे अंत में उन्हीं के करीब रहने वाले कोल-किरात आते हैं -
"अमर नाग किन्नर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहिं काला।।
... चित्रकूट रघुनंदन छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।।
... यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।
कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।।" (पेज.358)
यही कोल-किरात जो दोने में खाद्य पदार्थ भर-भर कर राम के पास जा रहे हैं, उनकी सेवा कर रहे हैं, एक राजकुमार/राजा के रहने का स्थान नहीं बना सकते। या यों कहें कि जो उनकी कुटिया बनाया वह साधारण कोल-किरात हो ही नहीं सकता, उसका देवता होना जरूरी है। यह दैवीकरण रामचरितमानस में कई जगह देखने को मिलेगा। ख़ैर जो कोल-किरात देवता नहीं हैं, मनुष्य हैं ; वे राम की सेवकाई विविध प्रकार से कर रहे हैं -
"हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।।
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।
तहँ तहँ प्रभु तोहिं अहेर खेलाउब। सर निरझर जल ठाउँ देखाउब।।
हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।" (पेज.359)
वहाँ के आदिवासी जन नये मेहमान का आतिथ्य-सत्कार करने में कोई कोताही नहीं कर रहे हैं। जितनी जरूरी क्रियाकलाप होंगे, उनके वह सहयोगी बनना चाहते हैं। मसलन पानी कहाँ ठीक मिलेगा, शिकार करना कहाँ ठीक रहेगा - ये सब उनको बताते हैं। शेर, बाघ, सर्प आदि हिंसक जानवरों से उनकी रक्षा करने का दायित्व भी अपने ऊपर लेते हैं। लेकिन इस सबके बावजूद तुलसी की नजर में ये असभ्य हैं। अन्य स्थानों पर जहाँ भी ये आये हैं असभ्यता के रूपक के तौर पर ही आये हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत है -
मंथरा अपना षड्यंत्र कैकेयी से कहती हैं। कैकेयी उसपर बहुत अधिक विश्वास कर लेती हैं -
"सादर पुनि-पुनि पूँछति ओहीं। सबरी गान मृगी जनु मोहीं।।" (पेज.278)
'बार-बार कैकेयी उससे आदर के साथ पूछ रही हैं। मानों भीलनी के गीत पर हिरनी मोहित हो गई हो।' देखने में यह वाक्य बहुत साधारण लग सकता है लेकिन उतना साधारण नहीं है। मैदानी क्षेत्र में रहने वाला कवि ये कह सकता है कि भीलनी के गीत खराब होते हैं, श्रेष्ठ लोग उसपर मोहित नहीं होते। लेकिन यहाँ बात इतनी ही नहीं है। यहाँ भीलनी का गान 'मंथरा के षड्यंत्रकारी बोल' के लिए प्रयुक्त हुआ है। मंथरा का जैसा चित्रण तुलसी ने किया है, उसे इसके पहले वाले पाठ में बताया जा चुका है। इस तरह हाशिये पर पड़ी एक 'जाति' का ऐसा प्रयोग तुलसी ने अच्छे के लिए तो नहीं ही किया है।
इसी प्रसंग में आगे जब राम वनवास के लिए निकल पड़ते हैं तो पुरजन भी उनके पीछे लग जाते हैं। इससे संदर्भित तुलसी की चौपाई देखिए -
"बिधि कैकई किरातिनि कीन्हीं। जेहिं दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्हीं।।
सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।।" (पेज.323)
'विधाता ने कैकेयी को भीलनी बनाया, जिसने दसों दिशाओं में दुसह दावाग्नि (भयानक आग) लगा दी। राम के बिरह की अग्नि को लोग सह न सकेसके। सब लोग व्याकुल होकर भाग चले।'
हम उपमा/रूपक जो देते हैं वो हमारे सौन्दर्यबोध और संस्कार पर निर्भर करते हैं। तुलसी के यहाँ 'भीलनी' (आदिवासी जन) की समझ सही नहीं है, नहीं तो कैकेयी को भयानक आग लगाने वाली भीलनी नहीं कहते। यहाँ तुलसी द्वारा कैकेयी को भीलनी के इस क्रिया से नवाजना कैकेयी के प्रति ही नहीं, भीलनी के प्रति उनके नजरिये को दर्शाता है।
निषादराज प्रसंग में तुलसी कहते हैं -
"स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।'(पेज.398)
'मूर्ख और पापी चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी राम नाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवन में विख्यात हो जाते हैं।' यानी कि तुलसी की नज़र में ये स्वभावतः असभ्य और अपवित्र हैं। राम जैसे आर्य पुरुष इनको सभ्य बनायेंगे। तुलसी के यहाँ राम का नाम ही काफी है। उससे ही ये सभ्य और पवित्र हो जायेंगे। मतलब कि ये वैसी ही बात है जैसे विकासवादी आये थे और कहे थे कि तुम असभ्य हो हम तुमको सभ्य करने आये हैं। इस सभ्य करने के पीछे इन्होंने कितनों की जिन्दगियाँ और संस्कृति तबाह की, ये यहाँ कहने की जरूरत नहीं। बहरहाल यहाँ भी हाशिये पर पड़े लोगों का प्रसंग उनकी असभ्यता दिखाने और राम नाम की बड़ाई करने के लिए ही आया है।
न चाहते हुए भी थोड़ी सी बात वानर और राक्षस/असुर जातियों पर। वानर और असुर जाति भी असभ्य ही है तुलसी की नज़र में। उत्तरकाण्ड में तुलसी लिखते हैं -
"लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।
हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज शरीरा।।
... पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहुँ सकल सिखाए।।" (पेज.725)
यहाँ दो बातें देखने लायक है। पहली कि मनोहर मनुज शरीर प्राप्त कर राक्षस और वानर जाति के लोग उत्तर भारत की संस्कृति को अपना रहे हैं। मनुष्य बनना या उसका शरीर प्राप्त करना एक प्रकार की सभ्यता का ही द्योतक है। दूसरी कि ये दक्षिण की जातियाँ वशिष्ठ का पैर नहीं छू रही हैं। राम उन्हें उनका पैर छूना सिखा रहे हैं। हो सकता है कि वशिष्ठ, विश्वामित्र और अगस्त्य जैसे मुनियों की करतूत उन्हें पता हो। या ये भी हो सकता है कि तुलसी यहाँ उन्हें 'पैर छूने' जैसे मामूली शिष्टाचार न आने के कारण असभ्य और पिछड़ा दिखा रहे हों। जो भी हो ये पूरी पंक्ति साम्राज्यवाद की बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें हारी हुई जातियाँ जीती हुई जातियों की संस्कृति को मजबूरन अपनाने को बाध्य होती हैं।
तुलसी उत्तर भारत के मैदानी भाग में रहकर कविता करने वाले कवि हैं। दक्षिण की या अन्य जगह की जातियों के बारे में उनका ऐसा ख़याल होना स्वाभाविक है। लोगबाग आज भी हाशिये पर पड़ी जातियों को जंगली, असभ्य और न जाने क्या-क्या कहते रहे हैं, मध्यकाल में कोई कवि ऐसा कह रहा है तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। फिर भी एक कवि (जिसे समदर्शी कहा जाता है) का ऐसा कहने वाला काव्य मूल्यांकन की माँग तो करता ही है।
[नोट : - लंबे समय तक इस कड़ी को घींचने के कारण रुचि कम होती जा रही है(यह पोस्ट खुद इसका उदाहरण है)। समय का भी कुछ अभाव/दबाव है जो ये करने से अब रोक रहा है। योजना तो लगभग पाँच खण्डों की और थी, पर लग रहा है वो पूरा नहीं हो पायेगा। फिर भी अनियमित ही सही चाहूंगा ये पूरी हो जायें।]
(11).
रामचरितमानस में हाशिये के लोग -3
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इस विषय पर दो कड़ियाँ लिखी जा चुकी हैं। उसमें रामचरितमानस के कुछ पात्रों एवं जातियों पर बात हुई है। प्रस्तुत कड़ी में रामचरितमानस में आये 'नारी-संबंधी मतों' पर बात होगी। यह पोस्ट विवरणात्मक ज्यादा है इसके लिए पहले ही माफी मांग रहा हूँ। नारी पात्रों को जानबूझकर छोड़ रहा हूँ क्योंकि विषय बड़ा हो जायेगा। वैसे भी पार्वती की माँ 'मैना' के सिवा मुझे कोई नारी पात्र जँचा नहीं, (ये मेरी सीमा है) । पूरे रामचरितमानस में मैना ही ऐसी पात्र हैं जो विरोध करती दिखती हैं। वह स्पष्ट कहती हैं कि मैं पार्वती को लेकर डूब मरूँगी, पर्वत पर से छलांग लगा दूंगी, लेकिन इस बावले आदमी (शिव) से उसका विवाह होने ही नहीं दूंगी। आखिर नारद की तिकड़मबाजी से उन्हें भी बरगला लिया जाता है। अहिल्या का भी प्रसंग ठीक नहीं लगा क्योंकि वह राम का गुन गाते हुए अपने पति के श्राप को उचित बताती हैं। जबकि रामचरितमानस में ही राम जन्म हेतु बताते समय एक प्रमुख कारण विष्णु द्वारा वृंदा का शीलभंग(बलात्कार) बताया गया है। एक व्यक्ति जिसने खुद बलात्कार किया हो, वह एक बलात्कार पीड़िता को छूकर अपना प्रभुत्व दिखाए, ये मुझे जँचा नहीं। तारा और मंदोदरी इन दोनों का चित्रण अच्छे से हो सकता था, लेकिन तुलसी ने किया नहीं। दोनों अपने मरे पति को गोद में रखकर राम का प्रवचन सुनते हुए राम का गुणगान कर रही हैं। दिलचस्प बात ये है कि वे अपने पति के मृत्यु को उसी समय जायज भी ठहरा रही हैं। शबरी, सती, पार्वती, सीता, कौशल्या, कैकेयी आदि सभी स्त्री पात्रों पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, लेकिन फिलहाल के लिए इसपर कुछ नहीं।
पूरे भक्तिकाल में स्त्री को 'माया' के रूप में निरूपित किया गया है। हालांकि प्रेमकाव्यों (सूफी काव्यों) में उनकी केन्द्रीय स्थिति है, यहाँ तक की अधिकांश ग्रंथों के नाम भी उनके नामों को लेकर रखे गये हैं। फिर भी स्त्री के प्रति उनकी धारणा मध्ययुगीनता बोध से ग्रसित है। तुलसी इसके अपवाद नहीं हैं। रामचरितमानस एक वैष्णव ग्रंथ है और वैष्णव धर्मी हिंदू समुदाय में स्त्रियों के प्रति लोगों के जो विचार होते हैं, इसमें साफ प्रतिलक्षित होता है। इसमें तमाम स्मृतियों पर आधारित सामाजिक आचार-विचार और वैवाहिक एवं गृहस्थ जीवन की एक आदर्श छवि गढ़ी गई है। विभिन्न पात्रों से नारी संबंधित उपदेश दिलाये गये हैं।
तुलसी जिसके लिए सबसे ज्यादा 'गाली' खाते हैं, और जिसके संरक्षण में कई भाष्य करके उनको प्रगतिशील बताया गया है वह प्रसिद्ध पंक्ति है -
ढोल गँवार सूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।(पेज.608, सुंदरकांड)
बात सरल है, लोग गूढ़ार्थ लगा लेते हैं। इस एक पंक्ति पर सर खपाना विद्वतजनों का काम है, हमारा नहीं। रामचरितमानस नारी और शूद्र विरोधी रचना है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। जिस तरह से इसमें वर्णव्यवस्था और पितृसत्तात्मक व्यवस्था की स्थापना के लिए कथा-विन्यास को तोड़ा-मरोड़ा गया है, या यों कहें कवि ने अपनी स्वच्छंदता दिखलाई है, वह काबिलेगौर है। इसे न मानने वालों को बहुत तरह से श्राप, पुनर्जन्म आदि हथकण्डों के माध्यम से डराया भी गया है। इस डरावने मुहिम में नारी भी शामिल हैं।
रामचरितमानस में नारी को स्वभाव से ही मूर्ख, अपवित्र, अवगुणों की खान बताया गया है। और इस बताने की व्याप्ति पूरे ग्रंथ भर में है, सिर्फ़ एकाक-दो पंक्तियों में नहीं। मसलन बालकाण्ड में शिव-पार्वती प्रसंग से लेकर उत्तरकाण्ड के रामराज्य और कलयुग वर्णन तक तुलसी ने अपने नारी संबंधी वक्तव्य कहलवाये हैं। दो-तीन जगहों पर तो थोड़ा ठहरकर ज्ञान दिया गया है बाकी जगहों पर चलते-चलते कह गये हैं।
नारी-धर्म की स्थापना की दृष्टि से रामचरितमानस का अनुसूइया प्रसंग विशेष रूप से देखा जाना चाहिए। जहाँ वे सीता को नारी विषयक पातिव्रत धर्म बतलाते हुए कहती हैं -
"मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।
धीरजु धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परखिअहिं चारी।।
वृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना।।
ऐसेहुँ पति कर किए अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।।
एकइ धरम एक ब्रत नेमा। काँय बचन मन पति पद प्रेमा।।
... पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।।
... पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई।।
सहज अपावन नारि पति सेवत सुभ गति लहई।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय।।"(पेज.594-595)
ये पूरा उद्धरण मात्र उपदेश ही नहीं है, अल्टीमेटम भी है। वैष्णव पंथियों का यही आदर्श है कि स्त्रियाँ ऐसे ही आचरण करें। बूढ़े, रोगी, मूर्ख, दरिद्र, अंधा, बहरा, क्रोधी आदि चाहे जैसा पति हो उसका अपमान न करें। यदि पत्नियाँ उनका अपमान (उन्हें छोड़ने की बात ही दूसरी है) करती हैं तो यमपुरी में जाकर बहुत दुख सहती हैं। पत्नियों का एक ही कर्तव्य है कि वह अपने शरीर, वाणी और मन तीनों से पति को संतुष्ट करें। यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि शरीर पर पतियों का एकाधिकार जैसा होता ही है, उसके मन और वचन को भी कंट्रोल करने की कोशिश की जा रही है। जिससे वह न तो विरोध कर सके और न ही पर पुरुष के बारे में सोच सके। इसीलिए आगे डराते हुए कहा गया है कि जो पत्नी पति के मौजूद रहते हुए दूसरे पुरुष के साथ रति करती है, वह रौरव नरक में पड़ती है। पुराणादि की मान्यता है कि रौरव नरक से भयानक यातना कहीं की होती नहीं है। इतना ही नहीं जो पत्नी पति के प्रतिकूल हो जाती है वह दूसरे जन्म में युवावस्था में ही विधवा हो जाती है। कितना भयावह है न ये! पुनर्जन्म के सहारे कैसा डरावना भविष्य? मध्यकाल में (यहाँ तक की आधुनिक काल में भी) विधवा होना, और वो भी तरुनाई के समय... घनघोर यातना।
अनुसूइया के ये ही वचन अधिकांश हिंदू परिवारों की स्त्रियों को अब भी सिखाये जाते हैं। ये ही उनकी आदर्श हैं। तुलसी इस आदर्शीकरण के लिए अहले दर्जे के उत्तरदायी हैं।
रामचरितमानस में नारी वस्तु मात्र की तरह ही दर्शायी गई है। एक जगह तो महाभारत की तरह एक स्त्री को दाँव पर लगाया गया है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह नारी और कोई नहीं, रामकथा की प्रमुख स्त्री पात्र सीता हैं। ये दाँव अंगद लगाते हैं -
"जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी।।" (पेज.637)
सीता को दाँव पर लगाकर अंगद रावण को चुनौती दे रहे हैं। उनका कहना है कि अगर मेरे पैर को कोई धरती से छुड़ा दे तो मैं सीता को हार जाऊँगा और राम वापस चले जायेंगे। यहाँ एक बात बड़ी दिलचस्प है कि सीता राम के लिए वस्तु है ही, अंगद के लिए भी हैं। नहीं तो अंगद क्यों सीता को हारने-हराने की बात करते। यहाँ अंगद के बल की अहंमयता मात्र को देखकर चलता नहीं किया जा सकता।
लक्ष्मण के मूर्छित होने पर जरा देखिए राम क्या कहते हैं -
"सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।।
... जैहउँ अवध कवन मुँहु लाई। नारि हेतु प्रिय भाई गँवाई।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि विशेषि छति नाहीं।।" (पेज.658)
मान लीजिए कि प्रिय के विरह में आदमी थोड़ा विक्षिप्त सा हो ही जाता है लेकिन किसी दूसरे प्रिय की कमी को कहे कि उसके न होने से कोई विशेष हानि नहीं होती, यह थोड़ा अटपटा लगता है।
इसके बाद उत्तरकाण्ड आता है जिसमें रामराज्य की प्रस्तावना है और कलयुग की घोर बिडम्बना। तुलसी की चिंता यहाँ साफ़ दृष्टिगोचर होने लगती है। नारी, शूद्र, ब्राह्मण, निर्गुनिये संत एवं स्वयं राम की क्या स्थिति होनी चाहिए, इस परिप्रेक्ष्य में तथाकथित ज्ञानकाण्ड की आगे के किसी पोस्ट में अलग से चर्चा होगी।
अब कुछ चलते-चलते उद्धरण -
" अब मोहिं आपन किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी।।" (पेज.95) - पार्वती शिव से रामकथा सुनाने की प्रार्थना करते हुए यह स्वयं कहती हैं।
"मैं नारि अपावन प्रभु जगपावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।।" (पेज.158) - अहिल्या राम की वंदना करते हुए नारी (खुद)को अपवित्र कहती हैं।
"बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानीं। सकल कपट अघ अवगुन खानीं।।" (पेज.376) - यह पंक्ति कैकेयी के प्रति है, जिसमें सम्पूर्ण नारी समुदाय को कपटी, पापी और अवगुणों की खान बताया गया है।
"अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।। " (पेज.527) - शबरी ऐसा राम से कह रही हैं।
"महाबृष्टि चलि फूटि किंआरी। जिमि सुतंत्र भए बिगरहि नारी।। "(पेज.552) - किष्किन्धाकाण्ड में चित्रित प्रकृति वर्णन में भी नारी की यह छवि द्रष्टव्य है।
"सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।" ( पेज.592) - रावण मंदोदरी से ऐसा कहता है।
"नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।।
साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।। " ( पेज.623) - यहाँ भी रावण ही ऐसा कहता है।
रामचरितमानस अन्य धार्मिक ग्रन्थों की तरह 'जातीय शुद्धता' पर भी जोर देता है। इसके लिए हिंदू धार्मिक ग्रंथों में 'वर्णसंकर' शब्द की व्युत्पत्ति की गई है। गीता में अर्जुन भी इसी उहापोह में है कि मेरे द्वारा कुल बंधु-बांधवों के मार दिये जाने पर वर्णसंकरता व्याप्त हो जायेगी। हमारे कुल की स्त्रियों से वर्णसंकर पुत्र उत्पन्न होंगे। कृष्ण अर्जुन की इस शंका का अपने ढंग से समाधान करते हैं। इधर रामचरितमानस में तुलसी के कलयुग वर्णन के केन्द्र में मूल चिंता इसी वर्णसंकरता की ही है। ख़ैर इस विषय पर बात फिर कभी... । लेकिन ये सच है कि इस जातीय शुद्धता का खामियाज़ा सबसे ज्यादा स्त्री को ही भोगना पड़ता है। इसीलिए स्त्रियों पर कड़े प्रतिबंध लगाये गये हैं कि वो परपुरुष से रति न करे। अगर करेगी तो रौरव नरक मिलेगा। तमाम तरह से डराने का काम रामचरितमानस में भी किया गया है।
अंत में एक प्रसंग के साथ बात समाप्त करता हूँ। बालकाण्ड में शिव विवाह के बाद मैना अपनी पुत्री पार्वती से कहती हैं -
"करेउ सदा संकर पद पूजा। नारि धरमु पति देउ न दूजा।।
... कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।।" (पेज.82-83)
मैं पहले भी कह चुका हूँ, तुलसी द्वारा वर्णित स्त्री-चरित्रों में मैंना जैसा स्त्री चरित्र किसी का भी नहीं है। विदा होती बेटी को परंपरागत सिखावन वह देती जाती हैं लेकिन स्त्री जाति की वास्तविकता भी वह नहीं भूलती और कह ही देती हैं - पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। ऐसा मैंना इसलिए कह रही हैं क्योंकि वह अपने पुत्री के अनुकूल वर से पार्वती की शादी करना चाहती थीं, लेकिन नारद की तिकड़मबाजी और अपने पति की घनघोर पुरुषवादी सोच के चलते किसी अड़भंगें (शिव) से शादी करने को विवश हैं। यही विवशता उपर्युक्त पंक्तियों में लक्षित होती है।
रामचरितमानस की यही बिडम्बना है कि जो तुलसी "पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं" कहते हैं, वही "जिमि स्वतंत्र भए बिगरहिं नारी" कहने से भी नहीं चूकते। नारी उनके यहाँ पुरुष की दासी है। एक वस्तु विशेष है जो पुरुषों के उपभोग के लिए बनी है। पुरुष के खिलाफ़ जाना मतलब धर्म के खिलाफ़ जाना है। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण सती हैं, जो अपने पति के खिलाफ जाती है और अंत में उन्हें आत्महत्या करना पड़ता है।
रामचरितमानस में आये नारी संबंधी वक्तव्यों को युगविशेष की बात कहकर टाला नहीं जा सकता। यहाँ तुलसी की अपनी राजनीति है, वे एक ऐसी सत्ता स्थापित करना चाहते थे जिसमें ब्राह्मण के प्रभुत्व के साथ-साथ समाज पर पुरुष का भी प्रभुत्व बना रहे। तुलसी इसमें काफी हद तक सफल भी हुए क्योंकि समाज की मानसिकता अाज तक इसी को आत्मसात किये हुए है। उन्होंने समाज पर आचार-संहिता लागू करने के लिए कविता का रास्ता चुना, इसलिए वे चतुर कवि और धार्मिक पुनरुत्थानवादी संत हैं।
जब भी समानता और स्वतंत्रता जैसे मूल्यों को लेकर रामचरितमानस का मूल्यांकन किया जायेगा, तुलसी कटघरे में खड़े किये जाते रहेंगे...
(12).
रामचरितमानस में नाक-कान विच्छेदन
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इसके पहले लम्बी-छोटी, संगत-असंगत, तरतीब-बेतरतीब 11 किस्तें लिखी जा चुकी हैं। सबमें ये प्रयास रहा है कि पाठ मौलिक रहे (अब है या नहीं, इसे पाठक तय करें)। इसी की अगली कड़ी में रामचरितमानस के उन प्रसंगों पर बात होगी, जिसमें नाक-कान काटने जैसे प्रसंग आये हों। सूपनखा पर बात पहले हो चुकी है, फिर भी संक्षिप्त में ही सही विषय संदर्भित होने के कारण यहाँ भी उनका उल्लेख रहेगा। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में कई बार नाक-कान काटने का जिक्र आया है, उसपर ही बात करने की योजना है।
किसी का अंग-भंग करना अपने अहं की तुष्टि करना है। यह तुष्टि अधिकतर प्रदर्शन के लिए होती है। कभी-कभी दूसरे पक्ष में डर पैदा करने एवं चुनौती देने के लिए भी होती है। रामचरितमानस में भी इन्हीं संदर्भों में इसका प्रयोग हुआ है। पूरे रामचरितमानस में नाक-कान काटने का जिक्र चार जगह मिलता है। ये चारों स्थल अरण्यकाण्ड, सुंदरकांड और लंकाकाण्ड में आये हैं। अरण्यकाण्ड की लगभग शुरुआत ही इंद्र के पुत्र जयंत को काना करने से होती है। जयंत ने कौआ का वेष धरकर सीता के पैर में चोंच मार दिया था, जिसको राम ने दण्डस्वरूप काना करके छोड़ दिया। (तभी से कुछ लोगों में मान्यता है कि कौआ काना होता है, उसे एक ही आँख से दिखाई देता है)। इसके अतिरिक्त रामचरितमानस के अन्य प्रसंगों में, खासकर राम-राक्षस युद्ध में अंग-भंग के दृश्य बहुतायत में मिल जायेंगे। लेकिन विषय की विषदता के कारण इसके एक ही पक्ष (नाक-कान काटने से संदर्भित) पर ही बात होगी।
रामचरितमानस में पहले-पहल रामप्रेरित लक्ष्मण द्वारा सूपनखा का नाक-कान काटा जाता है। रति-निवेदन के कारण या कहें शत्रु की बहन होने के नाते सूपनखा की ये दशा होती है। एक बात और, तुलसी की सूपनखा किसी पर आक्रमण भी नहीं करती। मात्र सीता को भयभीत देखकर राम के इशारे पर लक्ष्मण उसका नाक-कान काट देते हैं -
"पुनि फिर राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।।
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।।
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगट भई।।
सीतहिं सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सब सयन बुझाई।।
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।" (अरण्यकाण्ड, पेज.508)
रावण को चुनौती देने के लिए पुरुषोत्तम राम का सबसे घृणित काम यही है। जिसके लिए उन्हें कभी माफ़ नहीं किया जायेगा। इस घटना-विशेष में आवश्यक परिवर्तन न कर तुलसी भी घृणा के पात्र बन गये हैं। वे कवि थे, चाहते तो इस कथा में से इसे या तो उड़ा देते(जैसे शंबूक वध और सीता निर्वासन को उड़ा दिया है) या संशोधित रूप रखते। ख़ैर! राम का चरित्र तो स्त्री-विरोधी था ही, तुलसी भी इसमें कम नहीं थे। रामचरितमानस इससे पटा पड़ा है। उनसे अतिरिक्त उम्मीद रखनी ही व्यर्थ है।
अन्य प्रसंग बंदरों द्वारा नाक-कान काटने के हैं। दिलचस्प बात ये है कि रामचरितमानस में सिर्फ़ एक पक्ष द्वारा ही ये काम किया गया है। क्या इसे राम-लक्ष्मण एवं वानरों का स्वाभाविक गुण (?) माना जाये? या स्वामी के वीरतापूर्ण काम का अनुकरण माना जाये? (क्योंकि सूपनखा के बाद ही अन्य राक्षस व्यक्तियों का नाक-कान काटा गया) या इसे युद्ध-कौशल के रूप में गिना जाये?
दूसरी बार सुंदरकांड में इसका जिक्र आता है। रावण द्वारा लात खाने के बाद विभीषण राम के गोल में शामिल हो गये हैं। रावण ने विभीषण के पीछे दो गुप्तचर भी लगा रखे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से ये गुप्तचर वानरों द्वारा पहचान लिये जाते हैं। वानर उनको खूब पीटते हैं। यहाँ तक की इस पीटने के क्रम में वे गुप्तचरों के नाक-कान काटने लगते हैं -
"बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना। तेहिं कोसलाधीस कै आना।।" (पेज.603)
राम ने गुप्तचरों को छोड़ दिया और लक्ष्मण ने एक चिट्ठी रावण के नाम इनके हाथों भिजवाया। दोनों गुप्तचर रावण से अपनी हाल बताते हुए फिर कहते हैं कि -
"रावन दूत हमहिं सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना।।
श्रवण-नासिका काटन लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे।।" (पेज.604)
अन्य दोनों बार लंकाकाण्ड में ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ है। राम सेना सहित लंका पहुँच गये हैं। प्रत्येक वानर में इतना उत्साह है कि अगर रावण भी मिल जाये तो मसल डालें। वे इधर-उधर दौड़ रहे हैं। इस दौड़ने के क्रम में जहाँ भी कोई राक्षस (लंका निवासी) दीख पड़ता है, उसे पकड़कर परेशान करते हैं। नचाते हैं, नाक-कान काटते हैं और राम की बड़ाई कहकर(यहाँ 'जय श्रीराम' का नारा भी लगवा सकते हैं) छोड़ देते हैं -
"जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं।।
दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना।।" (पेज.613)
अगली बार स्वयं सुग्रीव 'कुम्भकर्ण' का नाक-कान काटते हैं। कुम्भकर्ण युद्ध-भूमि में उतर आया है। चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई है। शत्रु पक्ष के बड़े-बड़े योद्धा घायल होकर पड़े हैं। हनुमान और सुग्रीव मुष्टिका प्रहार से मूर्छित हो गये हैं। कुम्भकर्ण सुग्रीव को काँख में दबाकर युद्ध लड़ रहा है। सुग्रीव की जब मूर्छा टूटती है तो वह मरने का नाटक कर चुपचाप वहाँ से सरक जाते हैं और कुम्भकर्ण की नाक-कान काटकर भाग जाते हैं -
"सुग्रीवहुँ के मुरछा बीती। निबुकि गयऊ तेहिं मृतक प्रतीती।।
काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना।।" (पेज.662)
इस नासिका-कान विच्छेदन में लक्ष्मण जहाँ धारदार हथियार का प्रयोग करते हैं, वहीं सुग्रीव सहित वानरगण अपने दाँत का उपयोग करते हैं। स्वाभाविक है बंदरों के पास उनका वही हथियार है। सनद रहे कि ये विच्छेदन राक्षसों द्वारा कहीं नहीं किया गया है। सभ्य कहे जाने वाले दूसरे पक्ष ने ही ऐसा हमला किया है। जिसका शुभारंभ राम-लक्ष्मण करते हैं। रावण कुल के दो लोगों का नाक-कान काटा गया है। ये दोनों भाई-बहन हैं - कुम्भकर्ण और सूपनखा। और ये दोनों कृत्य दो बड़े लोग (राजघराने के लोग) करते हैं। शास्त्र भले ही इसे युद्ध के दौरान की कारवाई कहे, लेकिन लोक इसपर सदैव प्रश्न उठाता रहेगा। इस प्रक्रम में पूरी रामकथा के साथ ही तुलसी को भी कटघरे में खड़ा किया जायेगा।
इसके अलावा राम-पक्ष ने राक्षस समझी जाने वाली जातियों पर बहुत ही जुलुम ढाहे हैं। सुंदरकांड में ही हनुमान की गर्जना से कितनी ही राक्षस स्त्रियों के गर्भपात होने की बात है -
"चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।" (पेज.558)
इसी भयावहता के कारण मंदोदरी रावण को समझाती भी हैं कि सीता को वापस भेज दीजिए -
"समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहुँ कंत जो चहहुँ भलाई।।" (पेज.591)
अब तुलसी ऐसा क्यों कह रहे हैं? एक क्षण के लिए हम मान भी लें कि हनुमान के बल की बड़ाई में ये अतिश्योक्ति पूर्ण बातें है। लेकिन क्या इसे मात्र 'अतिश्योक्ति' कहकर टाला जा सकता है? क्या यहाँ हनुमान का उत्पात (दरिंदगी भी कह सकते हैं) नहीं दीखता, जिसके कारण राक्षस स्त्रियों का गर्भपात हो जाता है? क्या 'रजनीचर घरनी' और 'निसिचर नारी' स्त्री नहीं है, उनका मातृत्व (जो कि इनके निगाह में महत्वपूर्ण पद है) इन्हें नहीं दिखता? तुलसी द्वारा ऐसा लिखा जाना हनुमान और तुलसी दोनों को मनुष्य विरोधी खाँचे में रख देता है।
आगे लंकाकाण्ड में भी युद्ध के दौरान जब रावण यज्ञ करने चला जाता है तब विभीषण के सौजन्य से वानरगण उसके यज्ञ के विध्वंस कर देते हैं। यज्ञ विध्वंस के क्रम में रावण को बहुविधि से मारा-काटा जाता है, उसके न डिगने पर अन्ततः नारियों कोे बाल पकड़कर घसींटा जाता है। नारियों के करुण पुकार सुनकर ही रावण यज्ञ करना छोड़ता है -
"नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं।
धरि केस नारि निकारि बाहेर ते अतिदीन पुकारहीं।।
तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई।
एहि बीच कपिन्ह विधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई।।" (पेज.679)
कहा जाता है कि युद्ध में सब जायज़ है, वहाँ नैतिकता नाम की कोई चीज़ नहीं होती। लेकिन उपर्युक्त दोनों प्रसंगों में एक बात गौर करने लायक है। राजा और रानी (रावण और मंदोदरी) दोनों इंसानियत से लबरेज़ हैं। अपने राज्य की स्त्रियों के गर्भपात पर रानी को दुख होता है और वह इसे बहुत भारी क्षति मानते हुए और युद्ध की भावी आशंकाओं को देखते हुए सीता को लौटाने की बात करती हैं। वहीं राजा रावण अपने राज्य की स्त्रियों को दीन होकर पुकारते देख यज्ञ छोड़कर उठ पड़ता है और ऐसा करने वाले बंदरों को मसल डालता है।
युद्ध में सबसे ज्यादा स्त्रियों का शोषण होता है, जबकि उनका युद्ध से कोई वास्तविक संबंध नहीं रहता। यहाँ भी वही है। दिलचस्प बात ये है कि ऐसा सब कारनामा तथाकथित असभ्य कहे जाने वाले राक्षसों द्वारा नहीं किया है। इसके कर्ता-धर्ता राम सेना ही हैं। एक पवित्र कथा में ऐसे घृणित काम तो शत्रु पक्ष द्वारा ही किया जाना चाहिए था, लेकिन यहाँ प्रभु वर्ग ऐसा कर रहा है। आज जब रामचरितमानस का चहुँओर मूल्यांकन हो रहा है तब इस पक्ष पर भी ध्यान जाना ही चाहिए।




