खेतिहर मजदूर के जीवन की अभिव्यक्ति हैं 'चंद्र' की कविताएँ
हिंदी की एक राजनीति रही है कि जो कथित हिंदी-क्षेत्र से नहीं है उनकी रचनाओं पर बहुत कम चर्चा की जाती है। ऐसा नहीं है कि हिंदी प्रदेश में ही अच्छा हिंदी साहित्य लिखा जा रहा है, उसके बाहर नहीं। सुदूर उत्तर-पूर्व में भी साहित्य-सृजन हो रहा है और वहाँ से अच्छी रचनाएँ सामने आ रही हैं। अपनी भी सीमाएँ हैं सूचना-तंत्र के इतने विकसित होने के बावज़ूद हम उनसे लगभग न के बराबर जुड़ पाये हैं। जो जुड़े हैं उनमें से एक हैं असम निवासी 'चंद्र'।
चंद्र गाँव में रहते हैं और खेतीबाड़ी करते हैं। इसी के बीच वे कविताएँ भी लिखते हैं जिनमें वे, उनका पूरा गाँव, खेत-खलिहान, चिरई-चुरूंग, कपिली नदी आदि पूरी संजीदगी से मौज़ूद हैं। एक खेतिहर मजदूर जो सुविधाओं से दूर रहने के कारण किसी तरह काट-कपट के अपना पेट पालता है, उसके मन में निराशा स्थायी भाव की तरह घर किये रहती है। लेकिन चंद्र की कविताओं की एक ख़ासियत रही है कि उनमें निराशा तो है, हताशा नहीं। उनमें एक आग है जो मशाल की तरह उनका पथ आलोकित करती रहती है।
ग्रामीण प्रकृति से इनकी कविताओं का जुड़ाव लोगों को आकर्षित करता है। इन कविताओं के भाव कहीं से उधार लिये हुए नहीं हैं, सर्वथा मौलिक हैं। चंद्र की कविताएँ इतनी सहज हैं कि वह जो कहना चाहती हैं, पाठक उस तक आसानी से पहुँच जाता है। चंद्र का जैसा जीवन है उनकी कविताएँ ठीक वैसी ही हैं। उनकी कविताओं से उनका जीवन अलग करके नहीं देखा जा सकता, यही उनकी कविताओं की सार्थकता है।
वे देश-दुनिया समाज के प्रति भी जागरूक हैं। समकालीन घटनाओं पर भी उनकी नज़र है। आने वाले दिनों में उनकी कविताएँ और भी निखरेंगी इसी उम्मीद के साथ उनकी कुछ कविताएँ यहाँ दी जा रही हैं -
अवसाद में आत्महत्या
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खेतों में काम करते-करते
जब-जब थोड़ा मरने का मन करता है
तब-तब मैं इस नदी के तट पर घंटों नदी से बतियाता हूँ
ज्यादा उदास हो जाता हूँ
तो बस यहीं कहीं विशाल गूलर के वृक्ष के पास चुपचाप
पत्थर घाट के शमशान में कई दिनों के जले हुए
किसी किसान की पुरातन राख को अँजूरियों से उड़ा कर
संध्या के अकेले सूरज की तरह रंगीन सपने देखने लगता हूँ
तो ऐसा लगता है मुझे
कि कबीर और बुद्ध के रास्ते की ओर लौटना चाहिए।
ज्यादा रोने का मन करता है
तो दिनभर के हारे-थाके हुए बचपन की तरह
समतल बालू पर
पेट के बल लेट जाता हूँ
तो कुछ संताप और विलाप से
सुकून मिलता है सीमाहीन।
श्रम से दुही गई छाती की बाती-बाती में
एक ऐसी बेचैनी की मौन-हाहाकार गूँजती है
कि अचानक करवटें बदलने लगता हूँ
चीखने लगता हूँ पुरजोर
पीड़ा के शब्दों के अथाह काल-जल में
डूबने लगता हूँ इस तरह कि
आँसू बहता रहता है बहुत देर तक
और मायावी मछलियाँ पीती रहती है घुट-घुट।
कुछ देर बाद तो होश ही उड़ जाती है
कि मुझे यहाँ से पलायन करना चाहिए
मुझे अब जीना नहीं चाहिए, जीना नहीं चाहिए
मैं बस एक अंतहीन भार हूँ
प्रेमिका,संगी-साथियों के लिए
और इस घूमती हुई पृथ्वी के लिए
कब जंगली हाथी आएँगे और मुझे मार देंगे कब,पता नहीं
सामने गहरी नदी है कूद जाऊँ क्या
पुरखों के पुराने बक्से में रखी सल्फास की गोली भी
अब नहीं बची
नहीं,नहीं
खेती में दवाई मारने वाली दवाई भी नहीं
फिर सोचना लगता हूँ देवता ईश्वर कैसे मरे?मैं भी मर जाता हूँ कि तमाम नकारात्मक मिथ्य-कथाओं से भर जाता हूँ मैं
कि कविता कहानी सब मोह माया है
कि कलंक का बेहया मेरे बदन पर छाया है
कि मैंने इतना सहन का हँस-हलाहल जहर पिया है कि
इतना सहा नहीं जाता,अब जिया नहीं जाता
कि मेरी गरीब दुनिया अब इस पृथ्वी पर रहने के लायक नहीं बची है दोस्त।
फिर खुद ही थक-हार कर लेटने लगता हूँ वहीं के वहीं
सोचने लगता हूँ कुछ
फिर सफेद बालू के बियाबानों में घास के घुंघरूओं की तरह
रोने लगता हूँ इस तरह कि
नदी नींद के लिए वही दादी की “चंदा मामा आरे आवा
पारे आवा नदिया किनारे आवा”लोरी सुनाती है
बरौनी मुदाने लगती हैं हौले-हौले
नींद लग जाती है
तो सो जाता हूँ रात भर बेफिक्र!
उठता हूँ जब सुबह
तो देखता हूँ-
नदी के इर्द-गिर्द पत्थर
पत्थर पर जमे हुए
अनाम-अनाम फूल के पौधे
इन तमाम खुशबूओं के शोर में
पशु-पंछियों का कलरव
नदी का कल-कल
रंग-बिरंगी तितलियाँ
घने-घने जंगल
आमने-सामने पर्वत-अंचल
हँसते-खिलखिलाते सुन्दर-सुन्दर वन फूल
नदी की निश्चल धार
नदी में मछुआरे,नाव
पुल पर चलते अमर लोग
और ज़िन्दा बालू
तो एक सुन्दर जीवन से भर जाता हूँ
और जीने की सौगंध खाकर अपनी धूल और धुएँ और बालू से उठता हूँ एक मज़दूर की तरह
फिर खेतों की ओर जाता हूँ काम पर
फिर संध्या को लौटता हूँ घर,घर से फिर नदी
नदी में सूरज का वही सत्य बिम्ब
नदी के गोद में झड़ती हुई वही बियाबानों की विरानी
वही बिरहा का धुन वही बगानिया बिहू गीत
वही प्रीतम के होठ के ओट में से चुमी हुई पिली बाँसुरी
और ऐसा सिलसिला चलता ही रहता है हर दिन
हर रोज
इस नदी से पूछो
यह बताएगी
कि अवसाद में आत्महत्या को कैसे रोका जाता है।
“मैं पृथ्वी से बहुत प्यार करता हूँ "
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मैं पृथ्वी से बहुत प्यार करता हूँ
बहुत... बहुत ...प्यार करता हूँ
इतना स्नेह के साथ प्यार करता हूँ
इतना स्नेह के साथ
कि पता ही नहीं चलता
मेरे देह से लाल लहू ,पसीना और आँसू
कब गिर-गिर जाते हैं पृथ्वी पर
और कब सोख लेती है पृथ्वी
मेरे देह का अनमोल रतन
और जाने कब भर देती है
लहूलुहान ज़ख्म!
पता ही नहीं चलता
पता ही नहीं चलता
जब पृथ्वी को अपनी बाहों में
कस के पकड़ लेता हूँ!!
(चंद्र)
बहुत ऐसी कविताएँ थीं
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बहुत ऐसी कविताएँ थीं
जिन्हें लिखा न गया कागज पर
जोत कर ज़मीन हल से
रोप दिया गया
गन्ने की तरह!
ये गेहूँ के कटने का मौसम है
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ये गेहूँ के कटने का मौसम है
इस मौसम में
देशी-परदेशी चिड़ियाएँ
उदास होती हुईं
लौटेगीं
कपिली नदी के उस पार घने वन जँगलों में दूर कहीं
इस मौसम में
गेहूँ के खेतों में झड़े हुए गेहूँ के दानों को
पँडूक खूब खाएँगे
और फुर्र-फुर्र उड़ जाएँगे बड़े ही अफसोस के साथ
जब हम गेहूँ को काट कर घर आँगन में ढोने लगेंगे
दाँने के लिए
इस मौसम में
गेहूँ काटने के लिए
गाँव-जवार के सभी खेत मज़दूर-किसान
लोहारों के यहाँ
हँसुवे को पिटवाएँगे
धार दिलवाएँगे
ये गेहूँ के कटने का मौसम है
इस मौसम में
हँसी-खुशी मज़दूरी मिलेगी खेत मज़दूरों को
इस मौसम में
गेहूँ के खेतों में बनिहारिन स्त्रियाँ
कटनी की लहरदार गीतें गाएँगी
तब झुरू-झुरू बहेंगी
शीतल बयरिया भी
तब चिलकती धूप भी रूप को मुरझा देंगी
ये गेहूँ के कटने का मौसम है दोस्तों !
इस मौसम में
चौआई हवाएँ भी खूब बहेंगी
और यह बहुत डर भी है
कि धूप तो तेज होगी ही
धूप में हम श्रमिकों की समूची देह जलेगी ही
लेकिन हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं
कि इस बार जले न गेहूँ किसी का
न फँसे खेत में ही बारिश के चलते
न जमे खेत में ही गेहूँ बारिश के चलते !!
“मेरे दुनिया के बच्चों”
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मेरे दुनिया के बच्चों
तुम पर कविता लिख नहीं सकता कभी भी
क्योंकि
यदि तुम पर कविताएँ लिख सकता
तो तुम्हें जरूर,जरूर
इस कड़ाके की सर्दी में
एक छोटा सा जाँघिया और फटही गंजी को
पहने हुए
थरथराते-काँपते तुम्हारे रोयें-रोयें को
देखकर
तरस जाता
रहम और वफ़ा से भर जाता !
और सारे संसार में
चुप-चुप के छापेमारी नहीं करता
तुम्हारे नंगे बदन पर एक बित्ता कपड़ा न होने पर
बल्कि तुमसे तुम्हारे देह की हकों को
छिनने वालों के
आलीशान महलों पर टंगे हुए
कई-कई कपड़ों को बरीयाई खींचकर
अपने कंधों पर बोझा बना कर लाता
तुम्हारे दिल-देह में जमे हुए बर्फ-से खूनों को
हृदय के भीतर तेज रफ्तार में दौड़ाने का करता मदद भी!
माफ करना मेरे दुनिया के तमाम बच्चों
मैं तुम पर कविता लिख नहीं सकता कभी भी!
पर तैयारी में हूँ,मेरे दुनिया के बच्चों!
अब खेत में अनाज के साथ-साथ
गर्म कपड़ों का बीज बोऊँगा
और रुई और मखमली कपड़ों को
आसमान तक लहलहाने के लिए
मैं किसानी-मज़दूरी करूँगा!
अन्यथा
भविष्य में
मैं खुद सर्दी से सिकुड़ कर
बर्फ का पत्थर बन जाऊँगा !!!!!!
(चंद्र)
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
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अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
सच को सच बोलो तो भी खतरा है
झूठ को झूठ बोलो तो भी खतरा है
पर, झूठ मत बोलो
झूठ बोलने से ज़बान का खतरा है
मत चलो पहनकर गले में सोना-चाँदी का गहना
महँगी चीजों पर गद्दारों का अनवरत पहरा है!
अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
यह वर्दी वाले,कानून वाले,पुलिस वाले,नेता,अफसर,गद्दार इन्होंने ईमान बेच दिया
ये ईमान बेच सकते
क्योंकि यह जानते हैं कि यह मुर्दों का देश है
इस देश का काला कानून,आवारे पूँजीपतियों के रखैलों की तरह गूँगा है,बहरा है
कि यहाँ बड़ी दलदल है,खून का पानी बड़ा गहरा है
अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
क्या भरोसा कब खरोच देंगे ये
क्या भरोसा कब माँस के चिथड़े नोच देंगे ये
कब खेतों के बेटों के अनाजों के दाम गोदाम में बंद कर देंगे ये
क्या भरोसा कि कब गू-गोबर भर जाए इन नाखूनों में
इन नाखूनों को अब जहरीली लताओं की तरह पसरने मत दो-
मादरे-हिंद के धरती पर
क्योंकि नमकीन खून इनमें नहीं होता है
पर,खून बहुत करते हैं
खून करके ये देश के दीवारों पर रंग-बिरंगे अलते से रंगते हैं
कि कोई चिन्ह भी न पाएगा इन नाखूनों को
अब इन नाखूनों से तोप-तलवारों से भी अधिक खतरा है
अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढते नाखूनों से खतरा है!
“तब तो मुझे ही मर जाना चाहिए
थोड़ी-सी सुन्दर पृथ्वी के लिए”
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यदि मुझ में नहीं है तनिक भी प्यार
यदि मैं आदमी नहीं हूँ मिलनसार
यदि मैं सीख नहीं सकता तनिक भी ज्ञान
यदि मैं लिख नहीं सकता अपनी लोक भाषा में मधुर गान
यदि मैं पढ़ नहीं सकता और कवियों की कविताएँ
यदि मैं अपने श्रम का लहू बहाकर
इस धरती पर उपजा नहीं सकता अनाज
यदि मैं इस धरती पर रोप नहीं सकता एक भी पेड़ का बीज
यदि मैं पीड़ितों की पीड़ाएँ देख
नहीं सकता भीतर बाहर पसीज
यदि मैं दुनिया के अनाथ और मासूम-मासूम
बच्चे बच्चियों के होठों पर नहीं सकता चुम
और नहीं दे सकता यदि इन्हें दो जून की रोटी औ’ नून
यदि मैं थोड़ी सी दुनिया में
अपने पैरों पर खड़ा हो कर नहीं सकता घुम
यदि मैं अपने जीवन में कभी भी न करूँ दान पुण्य
यदि मैं बचा नहीं सकता चिड़ियों के सुन्दर घोंसलों के लिए
घास-फूस का घर
यदि मैं बचा नहीं सकता नदी पर्वत झील सरोवर और विश्व पर्यावरण
यदि मैं सिर्फ अपने ही दुखों को दुख कहूँ ,समझूँ
और औरों के दुखों पर दूँ लात मार
यदि मेरे जीने से पृथ्वी भी धीरे-धीरे मरने लगे..
तो मुझे ही मर जाना चाहिए
मर जाना चाहिए मेरे भाई
थोड़ी-सी सुन्दर पृथ्वी के लिए
मुझे ही मर जाना चाहिए!!!
सदानंद चाचा
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गेहूँ के खूबसूरत खेतों की तैयारी के लिए
अभी कल ही मिर्च के गाँछों को
कुदाली से काट रहे थे सदानंद चाचा
संग-साथ कटवा रही थीं सदानंद बो चाची
सदानंद चाचा के अपाहिज पिता काट रहे थे
सदानंद चाचा का नन्हा यश काट रहा था
छुटकी खुशी काट रही थीं
लगभग सब अपने-अपने कुदालियों से काट रहे थे
लगभग सब मिर्च के बगानों को दुख के साथ विदा कर रहे थे
और मैं गन्ने के खेत में गन्ना काट रहा था!
अचानक देखा कि
चाचा इस बार पुरजोर देकर मिट्टी में कुदाल मार रहे हैं
फिर अचानक देखा कि
मिर्च के जड़ में न लगकर सदानंद चाचा के पाँव में
कुदाल का धारदार फाल लग कर आधा पाँव ही कट गया
उफ!वहाँ का माँस कटकर फेंका गया वहीं कहीं
लाज़मी है कि खून बहेगा ही!
दुख-दरद तो बढ़ेगा ही!
चाचा वहीं मिट्टी को बाहों में कस के पकड़कर बेहोश हो गए
चाची दौड़ी-दौड़ी पानी लाईं
उनकी आँखों पर छिड़कीं
चाची अपने आँचल के बेने से हवा आँख पर स्नेह से हाँकीं
चाची अपने आँचल के छोर को फाड़ कर बाँध दीं
और अपाहिज पिता करते भी क्या
खेत के इर्द-गिर्द वनतुलसी के पल्लव ढूँढ रहे थे
बहते हुए लाल लहू को बन्द करने के लिए
बाबू यश और बनी खुशी अपनी भूखी आँखों से पिता के आँखों में टुकुर-टुकुर ताक रहे थे सिर्फ!
आज जब सुबह सुबह उठा
पहले आँख नहीं धोया
रात के बहे हुए बर्फीले आँसुओं को भी नहीं पोंछ पाया
बाँस के अलगनी पर रखा हुआ पिता का पुराना धुराना कुर्ता पहना
दीवार के कोने में धरा हुआ दाव लिया
दाव को रेती से पिजाया और पत्थरों से पिजाया
और लाल गमछा मस्तक पर लिए
लहराता हुआ चल दिया
दूर गन्ने के खेतों में
कुछ देर बाद देखा कि
बिजली के तारों पर बैठे हुए पँक्तिबद्ध पंछी
प्रातः के गज़ल-गीत गा रहे थे
इस खुशी में गीत गा रहे थे कि
एक दो टेटनिस का इंजेक्शन और दस बीस लगे हुए कटे पाँव में टाँके और ढेर सारे बेंडिसों के
आथाह दर्द का चादर ओढ़े हुए सुबह-सुबह
अपने उसी खेत में लंगड़ाते हुए
हल जोत रहे हैं
गेहूँ के दाने छिट-बो रहे हैं
मैं देख रहा हूँ सामने से
वहाँ से खून रिस कर बह रहा है
और खून के रंग पर छीटे हुए दाने को
चुग रहें हैं
देसी-परदेसी पंछी!
मैं देख रहा हूँ अपनी खुली आँखों से
सदानंद चाचा रो नहीं रहे हैं
रो रही है छाती पीट-पीटकर
पृथ्वी की पसरी हुई अन्तहीन आत्मा!!
[ऐ पूँजीपति कवियो ! ]
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ऐ पूँजीपति कवियो !
क्या तुम्हारी महँगी-महँगी
और ब्राण्डेड डायरियों में
ज़रा जगह नहीं
लिखने को
उनका नाम भी
जिनकी समूची देह से अंग-अंग से
लहू, पसीना, स्वेद-रक्त और आँसू
पूरी तरह से,
बुरी तरह से दूहे जा चुके हैं
और जिनकी देह, देह नहीं रह गई है अब
जिनके नेत्र, नेत्र नहीं रह गए हैं अब
जिनका मस्तक, मस्तक नहीं रह गया है अब
जिनके हाथ, हाथ नहीं रह गए हैं अब
जिनके पाँव, पाँव नहीं रह गए हैं अब
जिनके दाँत, दाँत नहीं रह गए हैं अब
जिनकी छाती, छाती नहीं रह गई है अब
जिनकी छाती की बाती-बाती
रूई की तरह धुनी जा चुकी है
जिनका पूरा शरीर
श्रम के लोहाें की मसलन से,
भय़ावह चिन्ता, रोग, भूख, घोर दुख की जलन से
खेतों में खटते हुए चुपचाप शहीदों जैसे मरण से
अब बचा है कृषकाय
मुट्ठी भर
उनके लिए
क्या तुम्हारी क़ीमती क़लमों को लिखने का
टैम नहीं है
चिकन-बिरयानी खाकर भी
लिखने की थोड़ी सी भी शक्ति नहीं बची है
आत्मा में
तुम सिगरेट और शराब पीने के बाद भी
लिखने के मूड में नहीं हो
या फुर्सत नहीं है प्रेमिकाओं के बारे में लिखने से
तो कहो न, साहब जी !
मैं अपनी देह में बचा लहू का आख़िरी कतरा भी
दे दूँगा तुम्हें
तुम्हारी क़लम के रिफिल में लाल स्याही के लिए !
ये धान के रोपने का सुनहरा मौसम है
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ये धान के रोपने का सुनहरा मौसम है
इस मौसम में रिमझिम-रिमझिम बारिश होंगी
नद-नदी ,वन-जंगल ,पर्वत-अँचल
प्रेमी ,कवि और पागल की तरह मौसमी बंसी बजाएंगे
जो कविता की कजरी आधी अधूरी रह गई थीं पिछले बरस
उसे पर्वतों के बादलों के पेड़ों के झूलों पर झुलते-झुलते
ताल सुर दे, लय छंद दे, कल-कल निनाद बनाएंगे
हल्की-हल्की धूप भी श्रमिक रूप को मुरझाएगी
चहूँ दिशि मस्तानी हवाएँ सरसराएगी
भंवरे, मधुमक्खियाँ और तितलियाँ
रंग-बिरंगे खिले,हरी-भरी लताओं से गले मिले ,
फूलों के पृथ्वी पर, नृत्य पर नृत्य कर, झूमेंगे , झूमेंगे
चूमेंगे, चूमेंगे सुख-दुख भरे जीवन के इंद्रधनुषी तरंग को
उत्साह और उमंग से
सिरजेगें ,सिरजेगें किलकता हुआ शिशुपन...
मिट्टी का कीचड़ हम मजदूर-किसान बनेंगे
बच्चे और बच्चियाँ इन्हीं कीचड़ों में खूब खेलेंगे
दूर-दूर से देशी-परदेशी चिरई – चुरूँग आस लगाकर आएंगे
मेरे कृषक भाई, बहिनी नन्ही-नन्ही कुदालिओं से आलियाँ छाँटेंगे
पथारों की पगडंडी की तरह मेड़ बनाएंगे
हल-बैलों-हेंगिंओं से खेतिओं को मुलायम दही की तरह मह- मह कर
धान रोपने लायक गीली मिट्टी और कीचड़ बनाएंगे
कविता से भी सुंदर, बहुत सुंदर-सुंदर ,पंक्तिबद्ध-पंक्तिबद्ध
क्यारियाँ बनाएंगे
ये धान – रोपनी का सुनहरा मौसम है
इस मौसम में
दिन होगा चाहे रजनी होगी
हाड़-तोड़ की खटनी होगी
पिया गया होगा परदेस मगर
मस्तक पर ओढ़े बदरिला आसमान
चुपचाप धान रोपती उसकी सजनी होगी
बनिहारिन स्त्रियाँ धानों की बिता -बिता भर की
हरियर-हरिहर बीजें
अपने कर्मठ हाथों से उखाड़ेगीं ,बोयेंगी
रसीली,लसीली मिट्टी में
हाथों की उंगलियों को गोद-गोद कर, टप-टप ,टप-टप..
हंस-हंसकर, खिल-खिल कर, मिल-मिल कर
बच्चे बच्चियाँ जवान बूढ़े सब के सब
पंकीली मिट्टी में रोपते जाएंगे, रोपते जाएंगे
गाते हुए धन-रोपनी की लहरें दार गीतें
जीवन का नव-नव रंगरूप रोपते जाएंगे
मन सावन-सावन होता जाएगा
चहूँ ओर हरियाली लहराएगी
हम कीचड़ के बच्चे
हमारी मेहनतकश आत्माएँ
कीचड़ में धरती भर नहाएंगी
झींगुर-दादुर खूब मस्ती में मल्हार गाएंगे
जब तक न खिल जाते धानों में धान
जब तक न सफल हो जाते हमारी मेहनत की धरती से बहे लहू और पसीने और श्रम और प्यार
जब तक न कमल के लह-लह फूल बन जाते
पथारों में रेगिस्तान की तरह समतल, अनंत श्रम के कीचड़
तब तक हरे-हरे धान के पत्तों को
चुप-चुप कर,
छुप-छुपकर, चुग-चुग कर
ये चिरई -चुरूँग खाएंगे!
कि मिट्टी अपना गुण धर्म निभाएंगी
हम मिट्टी के बच्चे नन्हें-नन्हें धान
नीले आसमान में फहरेंगे सयान बनकर एक दिन..!
“जब-जब मेरी माई रोतीं हैं!!!!”
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जब-जब मेरी माई रोतीं हैं
तब-तब
तब-तब
कल- कल ,कल-कल बहती हुई
कपिली – नदी माई भी
चुपचाप -चुपचाप रोतीं हैं
तब-तब,
तब-तब
धीमी धीमी
झीनी झीनी
धरती माई भी
रोतीं हैं
तब -तब
तब -तब
शिवफल -वृक्ष के
शितल छईंयाँ में
बँधाई हुई
छूटकी खुँटियाँ में
उदास नन्हकी बछिया भी
माँ-माँ ,माँ-माँ
बाँ -बाँ , बाँ बाँ चिघरते हूए
रोने लगतीं हैं
तब -तब ,
तब -तब ,
झोपड़ी के मुरेड़ पर बैठी हुई प्यारी चिरईयाँ भी
चिहूँ -चिहूँ , चिहूँ -चिहूँ
रोने लगतीं हैं
और
तब -तब
तब -तब
मैं औरी मोर अनपढी बहिनि भी
माई का लहूलूहान हाथ – पांव के घाव पर
बड़ी ही सनेह के साथ
अपना गर्म और सुंदर हाथ धर -धर के
झर -झर के
डर -डर के
कहंर कहंर के
आह् उउफ से
भर -भर के
मर -मर के
मर -मर के
रोने लगते हैं
रोने लगती हैं
कपिली नदी तट पर की
वंशी सी
आहतम्यी आवाज में बजती हुई
झूरमूठ -बांस -झाड़ियाँ !!!!!!
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
(नोट- सभी कविताएँ और ऊपर की तस्वीरें चंद्र के फेसबुक वॉल से ली गई हैं)
विनोद मिश्र
शोधार्थी, भारतीय भाषा केन्द्र
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

(चंद्र)
हिंदी की एक राजनीति रही है कि जो कथित हिंदी-क्षेत्र से नहीं है उनकी रचनाओं पर बहुत कम चर्चा की जाती है। ऐसा नहीं है कि हिंदी प्रदेश में ही अच्छा हिंदी साहित्य लिखा जा रहा है, उसके बाहर नहीं। सुदूर उत्तर-पूर्व में भी साहित्य-सृजन हो रहा है और वहाँ से अच्छी रचनाएँ सामने आ रही हैं। अपनी भी सीमाएँ हैं सूचना-तंत्र के इतने विकसित होने के बावज़ूद हम उनसे लगभग न के बराबर जुड़ पाये हैं। जो जुड़े हैं उनमें से एक हैं असम निवासी 'चंद्र'।
चंद्र गाँव में रहते हैं और खेतीबाड़ी करते हैं। इसी के बीच वे कविताएँ भी लिखते हैं जिनमें वे, उनका पूरा गाँव, खेत-खलिहान, चिरई-चुरूंग, कपिली नदी आदि पूरी संजीदगी से मौज़ूद हैं। एक खेतिहर मजदूर जो सुविधाओं से दूर रहने के कारण किसी तरह काट-कपट के अपना पेट पालता है, उसके मन में निराशा स्थायी भाव की तरह घर किये रहती है। लेकिन चंद्र की कविताओं की एक ख़ासियत रही है कि उनमें निराशा तो है, हताशा नहीं। उनमें एक आग है जो मशाल की तरह उनका पथ आलोकित करती रहती है।
ग्रामीण प्रकृति से इनकी कविताओं का जुड़ाव लोगों को आकर्षित करता है। इन कविताओं के भाव कहीं से उधार लिये हुए नहीं हैं, सर्वथा मौलिक हैं। चंद्र की कविताएँ इतनी सहज हैं कि वह जो कहना चाहती हैं, पाठक उस तक आसानी से पहुँच जाता है। चंद्र का जैसा जीवन है उनकी कविताएँ ठीक वैसी ही हैं। उनकी कविताओं से उनका जीवन अलग करके नहीं देखा जा सकता, यही उनकी कविताओं की सार्थकता है।
वे देश-दुनिया समाज के प्रति भी जागरूक हैं। समकालीन घटनाओं पर भी उनकी नज़र है। आने वाले दिनों में उनकी कविताएँ और भी निखरेंगी इसी उम्मीद के साथ उनकी कुछ कविताएँ यहाँ दी जा रही हैं -
अवसाद में आत्महत्या
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खेतों में काम करते-करते
जब-जब थोड़ा मरने का मन करता है
तब-तब मैं इस नदी के तट पर घंटों नदी से बतियाता हूँ
ज्यादा उदास हो जाता हूँ
तो बस यहीं कहीं विशाल गूलर के वृक्ष के पास चुपचाप
पत्थर घाट के शमशान में कई दिनों के जले हुए
किसी किसान की पुरातन राख को अँजूरियों से उड़ा कर
संध्या के अकेले सूरज की तरह रंगीन सपने देखने लगता हूँ
तो ऐसा लगता है मुझे
कि कबीर और बुद्ध के रास्ते की ओर लौटना चाहिए।
ज्यादा रोने का मन करता है
तो दिनभर के हारे-थाके हुए बचपन की तरह
समतल बालू पर
पेट के बल लेट जाता हूँ
तो कुछ संताप और विलाप से
सुकून मिलता है सीमाहीन।
श्रम से दुही गई छाती की बाती-बाती में
एक ऐसी बेचैनी की मौन-हाहाकार गूँजती है
कि अचानक करवटें बदलने लगता हूँ
चीखने लगता हूँ पुरजोर
पीड़ा के शब्दों के अथाह काल-जल में
डूबने लगता हूँ इस तरह कि
आँसू बहता रहता है बहुत देर तक
और मायावी मछलियाँ पीती रहती है घुट-घुट।
कुछ देर बाद तो होश ही उड़ जाती है
कि मुझे यहाँ से पलायन करना चाहिए
मुझे अब जीना नहीं चाहिए, जीना नहीं चाहिए
मैं बस एक अंतहीन भार हूँ
प्रेमिका,संगी-साथियों के लिए
और इस घूमती हुई पृथ्वी के लिए
कब जंगली हाथी आएँगे और मुझे मार देंगे कब,पता नहीं
सामने गहरी नदी है कूद जाऊँ क्या
पुरखों के पुराने बक्से में रखी सल्फास की गोली भी
अब नहीं बची
नहीं,नहीं
खेती में दवाई मारने वाली दवाई भी नहीं
फिर सोचना लगता हूँ देवता ईश्वर कैसे मरे?मैं भी मर जाता हूँ कि तमाम नकारात्मक मिथ्य-कथाओं से भर जाता हूँ मैं
कि कविता कहानी सब मोह माया है
कि कलंक का बेहया मेरे बदन पर छाया है
कि मैंने इतना सहन का हँस-हलाहल जहर पिया है कि
इतना सहा नहीं जाता,अब जिया नहीं जाता
कि मेरी गरीब दुनिया अब इस पृथ्वी पर रहने के लायक नहीं बची है दोस्त।
फिर खुद ही थक-हार कर लेटने लगता हूँ वहीं के वहीं
सोचने लगता हूँ कुछ
फिर सफेद बालू के बियाबानों में घास के घुंघरूओं की तरह
रोने लगता हूँ इस तरह कि
नदी नींद के लिए वही दादी की “चंदा मामा आरे आवा
पारे आवा नदिया किनारे आवा”लोरी सुनाती है
बरौनी मुदाने लगती हैं हौले-हौले
नींद लग जाती है
तो सो जाता हूँ रात भर बेफिक्र!
उठता हूँ जब सुबह
तो देखता हूँ-
नदी के इर्द-गिर्द पत्थर
पत्थर पर जमे हुए
अनाम-अनाम फूल के पौधे
इन तमाम खुशबूओं के शोर में
पशु-पंछियों का कलरव
नदी का कल-कल
रंग-बिरंगी तितलियाँ
घने-घने जंगल
आमने-सामने पर्वत-अंचल
हँसते-खिलखिलाते सुन्दर-सुन्दर वन फूल
नदी की निश्चल धार
नदी में मछुआरे,नाव
पुल पर चलते अमर लोग
और ज़िन्दा बालू
तो एक सुन्दर जीवन से भर जाता हूँ
और जीने की सौगंध खाकर अपनी धूल और धुएँ और बालू से उठता हूँ एक मज़दूर की तरह
फिर खेतों की ओर जाता हूँ काम पर
फिर संध्या को लौटता हूँ घर,घर से फिर नदी
नदी में सूरज का वही सत्य बिम्ब
नदी के गोद में झड़ती हुई वही बियाबानों की विरानी
वही बिरहा का धुन वही बगानिया बिहू गीत
वही प्रीतम के होठ के ओट में से चुमी हुई पिली बाँसुरी
और ऐसा सिलसिला चलता ही रहता है हर दिन
हर रोज
इस नदी से पूछो
यह बताएगी
कि अवसाद में आत्महत्या को कैसे रोका जाता है।
“मैं पृथ्वी से बहुत प्यार करता हूँ "
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मैं पृथ्वी से बहुत प्यार करता हूँ
बहुत... बहुत ...प्यार करता हूँ
इतना स्नेह के साथ प्यार करता हूँ
इतना स्नेह के साथ
कि पता ही नहीं चलता
मेरे देह से लाल लहू ,पसीना और आँसू
कब गिर-गिर जाते हैं पृथ्वी पर
और कब सोख लेती है पृथ्वी
मेरे देह का अनमोल रतन
और जाने कब भर देती है
लहूलुहान ज़ख्म!
पता ही नहीं चलता
पता ही नहीं चलता
जब पृथ्वी को अपनी बाहों में
कस के पकड़ लेता हूँ!!
(चंद्र)
बहुत ऐसी कविताएँ थीं
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बहुत ऐसी कविताएँ थीं
जिन्हें लिखा न गया कागज पर
जोत कर ज़मीन हल से
रोप दिया गया
गन्ने की तरह!
ये गेहूँ के कटने का मौसम है
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ये गेहूँ के कटने का मौसम है
इस मौसम में
देशी-परदेशी चिड़ियाएँ
उदास होती हुईं
लौटेगीं
कपिली नदी के उस पार घने वन जँगलों में दूर कहीं
इस मौसम में
गेहूँ के खेतों में झड़े हुए गेहूँ के दानों को
पँडूक खूब खाएँगे
और फुर्र-फुर्र उड़ जाएँगे बड़े ही अफसोस के साथ
जब हम गेहूँ को काट कर घर आँगन में ढोने लगेंगे
दाँने के लिए
इस मौसम में
गेहूँ काटने के लिए
गाँव-जवार के सभी खेत मज़दूर-किसान
लोहारों के यहाँ
हँसुवे को पिटवाएँगे
धार दिलवाएँगे
ये गेहूँ के कटने का मौसम है
इस मौसम में
हँसी-खुशी मज़दूरी मिलेगी खेत मज़दूरों को
इस मौसम में
गेहूँ के खेतों में बनिहारिन स्त्रियाँ
कटनी की लहरदार गीतें गाएँगी
तब झुरू-झुरू बहेंगी
शीतल बयरिया भी
तब चिलकती धूप भी रूप को मुरझा देंगी
ये गेहूँ के कटने का मौसम है दोस्तों !
इस मौसम में
चौआई हवाएँ भी खूब बहेंगी
और यह बहुत डर भी है
कि धूप तो तेज होगी ही
धूप में हम श्रमिकों की समूची देह जलेगी ही
लेकिन हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं
कि इस बार जले न गेहूँ किसी का
न फँसे खेत में ही बारिश के चलते
न जमे खेत में ही गेहूँ बारिश के चलते !!
“मेरे दुनिया के बच्चों”
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मेरे दुनिया के बच्चों
तुम पर कविता लिख नहीं सकता कभी भी
क्योंकि
यदि तुम पर कविताएँ लिख सकता
तो तुम्हें जरूर,जरूर
इस कड़ाके की सर्दी में
एक छोटा सा जाँघिया और फटही गंजी को
पहने हुए
थरथराते-काँपते तुम्हारे रोयें-रोयें को
देखकर
तरस जाता
रहम और वफ़ा से भर जाता !
और सारे संसार में
चुप-चुप के छापेमारी नहीं करता
तुम्हारे नंगे बदन पर एक बित्ता कपड़ा न होने पर
बल्कि तुमसे तुम्हारे देह की हकों को
छिनने वालों के
आलीशान महलों पर टंगे हुए
कई-कई कपड़ों को बरीयाई खींचकर
अपने कंधों पर बोझा बना कर लाता
तुम्हारे दिल-देह में जमे हुए बर्फ-से खूनों को
हृदय के भीतर तेज रफ्तार में दौड़ाने का करता मदद भी!
माफ करना मेरे दुनिया के तमाम बच्चों
मैं तुम पर कविता लिख नहीं सकता कभी भी!
पर तैयारी में हूँ,मेरे दुनिया के बच्चों!
अब खेत में अनाज के साथ-साथ
गर्म कपड़ों का बीज बोऊँगा
और रुई और मखमली कपड़ों को
आसमान तक लहलहाने के लिए
मैं किसानी-मज़दूरी करूँगा!
अन्यथा
भविष्य में
मैं खुद सर्दी से सिकुड़ कर
बर्फ का पत्थर बन जाऊँगा !!!!!!
(चंद्र)
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
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अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
सच को सच बोलो तो भी खतरा है
झूठ को झूठ बोलो तो भी खतरा है
पर, झूठ मत बोलो
झूठ बोलने से ज़बान का खतरा है
मत चलो पहनकर गले में सोना-चाँदी का गहना
महँगी चीजों पर गद्दारों का अनवरत पहरा है!
अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
यह वर्दी वाले,कानून वाले,पुलिस वाले,नेता,अफसर,गद्दार इन्होंने ईमान बेच दिया
ये ईमान बेच सकते
क्योंकि यह जानते हैं कि यह मुर्दों का देश है
इस देश का काला कानून,आवारे पूँजीपतियों के रखैलों की तरह गूँगा है,बहरा है
कि यहाँ बड़ी दलदल है,खून का पानी बड़ा गहरा है
अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो
अपनी देह को अपने ही बढ़ते नाखूनों से खतरा है!
क्या भरोसा कब खरोच देंगे ये
क्या भरोसा कब माँस के चिथड़े नोच देंगे ये
कब खेतों के बेटों के अनाजों के दाम गोदाम में बंद कर देंगे ये
क्या भरोसा कि कब गू-गोबर भर जाए इन नाखूनों में
इन नाखूनों को अब जहरीली लताओं की तरह पसरने मत दो-
मादरे-हिंद के धरती पर
क्योंकि नमकीन खून इनमें नहीं होता है
पर,खून बहुत करते हैं
खून करके ये देश के दीवारों पर रंग-बिरंगे अलते से रंगते हैं
कि कोई चिन्ह भी न पाएगा इन नाखूनों को
अब इन नाखूनों से तोप-तलवारों से भी अधिक खतरा है
अपने देश के हाथ और पाँवों के नाखून बढ़ने मत दो!
अपनी देह को अपने ही बढते नाखूनों से खतरा है!
“तब तो मुझे ही मर जाना चाहिए
थोड़ी-सी सुन्दर पृथ्वी के लिए”
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यदि मुझ में नहीं है तनिक भी प्यार
यदि मैं आदमी नहीं हूँ मिलनसार
यदि मैं सीख नहीं सकता तनिक भी ज्ञान
यदि मैं लिख नहीं सकता अपनी लोक भाषा में मधुर गान
यदि मैं पढ़ नहीं सकता और कवियों की कविताएँ
यदि मैं अपने श्रम का लहू बहाकर
इस धरती पर उपजा नहीं सकता अनाज
यदि मैं इस धरती पर रोप नहीं सकता एक भी पेड़ का बीज
यदि मैं पीड़ितों की पीड़ाएँ देख
नहीं सकता भीतर बाहर पसीज
यदि मैं दुनिया के अनाथ और मासूम-मासूम
बच्चे बच्चियों के होठों पर नहीं सकता चुम
और नहीं दे सकता यदि इन्हें दो जून की रोटी औ’ नून
यदि मैं थोड़ी सी दुनिया में
अपने पैरों पर खड़ा हो कर नहीं सकता घुम
यदि मैं अपने जीवन में कभी भी न करूँ दान पुण्य
यदि मैं बचा नहीं सकता चिड़ियों के सुन्दर घोंसलों के लिए
घास-फूस का घर
यदि मैं बचा नहीं सकता नदी पर्वत झील सरोवर और विश्व पर्यावरण
यदि मैं सिर्फ अपने ही दुखों को दुख कहूँ ,समझूँ
और औरों के दुखों पर दूँ लात मार
यदि मेरे जीने से पृथ्वी भी धीरे-धीरे मरने लगे..
तो मुझे ही मर जाना चाहिए
मर जाना चाहिए मेरे भाई
थोड़ी-सी सुन्दर पृथ्वी के लिए
मुझे ही मर जाना चाहिए!!!
सदानंद चाचा
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गेहूँ के खूबसूरत खेतों की तैयारी के लिए
अभी कल ही मिर्च के गाँछों को
कुदाली से काट रहे थे सदानंद चाचा
संग-साथ कटवा रही थीं सदानंद बो चाची
सदानंद चाचा के अपाहिज पिता काट रहे थे
सदानंद चाचा का नन्हा यश काट रहा था
छुटकी खुशी काट रही थीं
लगभग सब अपने-अपने कुदालियों से काट रहे थे
लगभग सब मिर्च के बगानों को दुख के साथ विदा कर रहे थे
और मैं गन्ने के खेत में गन्ना काट रहा था!
अचानक देखा कि
चाचा इस बार पुरजोर देकर मिट्टी में कुदाल मार रहे हैं
फिर अचानक देखा कि
मिर्च के जड़ में न लगकर सदानंद चाचा के पाँव में
कुदाल का धारदार फाल लग कर आधा पाँव ही कट गया
उफ!वहाँ का माँस कटकर फेंका गया वहीं कहीं
लाज़मी है कि खून बहेगा ही!
दुख-दरद तो बढ़ेगा ही!
चाचा वहीं मिट्टी को बाहों में कस के पकड़कर बेहोश हो गए
चाची दौड़ी-दौड़ी पानी लाईं
उनकी आँखों पर छिड़कीं
चाची अपने आँचल के बेने से हवा आँख पर स्नेह से हाँकीं
चाची अपने आँचल के छोर को फाड़ कर बाँध दीं
और अपाहिज पिता करते भी क्या
खेत के इर्द-गिर्द वनतुलसी के पल्लव ढूँढ रहे थे
बहते हुए लाल लहू को बन्द करने के लिए
बाबू यश और बनी खुशी अपनी भूखी आँखों से पिता के आँखों में टुकुर-टुकुर ताक रहे थे सिर्फ!
आज जब सुबह सुबह उठा
पहले आँख नहीं धोया
रात के बहे हुए बर्फीले आँसुओं को भी नहीं पोंछ पाया
बाँस के अलगनी पर रखा हुआ पिता का पुराना धुराना कुर्ता पहना
दीवार के कोने में धरा हुआ दाव लिया
दाव को रेती से पिजाया और पत्थरों से पिजाया
और लाल गमछा मस्तक पर लिए
लहराता हुआ चल दिया
दूर गन्ने के खेतों में
कुछ देर बाद देखा कि
बिजली के तारों पर बैठे हुए पँक्तिबद्ध पंछी
प्रातः के गज़ल-गीत गा रहे थे
इस खुशी में गीत गा रहे थे कि
एक दो टेटनिस का इंजेक्शन और दस बीस लगे हुए कटे पाँव में टाँके और ढेर सारे बेंडिसों के
आथाह दर्द का चादर ओढ़े हुए सुबह-सुबह
अपने उसी खेत में लंगड़ाते हुए
हल जोत रहे हैं
गेहूँ के दाने छिट-बो रहे हैं
मैं देख रहा हूँ सामने से
वहाँ से खून रिस कर बह रहा है
और खून के रंग पर छीटे हुए दाने को
चुग रहें हैं
देसी-परदेसी पंछी!
मैं देख रहा हूँ अपनी खुली आँखों से
सदानंद चाचा रो नहीं रहे हैं
रो रही है छाती पीट-पीटकर
पृथ्वी की पसरी हुई अन्तहीन आत्मा!!
[ऐ पूँजीपति कवियो ! ]
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ऐ पूँजीपति कवियो !
क्या तुम्हारी महँगी-महँगी
और ब्राण्डेड डायरियों में
ज़रा जगह नहीं
लिखने को
उनका नाम भी
जिनकी समूची देह से अंग-अंग से
लहू, पसीना, स्वेद-रक्त और आँसू
पूरी तरह से,
बुरी तरह से दूहे जा चुके हैं
और जिनकी देह, देह नहीं रह गई है अब
जिनके नेत्र, नेत्र नहीं रह गए हैं अब
जिनका मस्तक, मस्तक नहीं रह गया है अब
जिनके हाथ, हाथ नहीं रह गए हैं अब
जिनके पाँव, पाँव नहीं रह गए हैं अब
जिनके दाँत, दाँत नहीं रह गए हैं अब
जिनकी छाती, छाती नहीं रह गई है अब
जिनकी छाती की बाती-बाती
रूई की तरह धुनी जा चुकी है
जिनका पूरा शरीर
श्रम के लोहाें की मसलन से,
भय़ावह चिन्ता, रोग, भूख, घोर दुख की जलन से
खेतों में खटते हुए चुपचाप शहीदों जैसे मरण से
अब बचा है कृषकाय
मुट्ठी भर
उनके लिए
क्या तुम्हारी क़ीमती क़लमों को लिखने का
टैम नहीं है
चिकन-बिरयानी खाकर भी
लिखने की थोड़ी सी भी शक्ति नहीं बची है
आत्मा में
तुम सिगरेट और शराब पीने के बाद भी
लिखने के मूड में नहीं हो
या फुर्सत नहीं है प्रेमिकाओं के बारे में लिखने से
तो कहो न, साहब जी !
मैं अपनी देह में बचा लहू का आख़िरी कतरा भी
दे दूँगा तुम्हें
तुम्हारी क़लम के रिफिल में लाल स्याही के लिए !
ये धान के रोपने का सुनहरा मौसम है
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ये धान के रोपने का सुनहरा मौसम है
इस मौसम में रिमझिम-रिमझिम बारिश होंगी
नद-नदी ,वन-जंगल ,पर्वत-अँचल
प्रेमी ,कवि और पागल की तरह मौसमी बंसी बजाएंगे
जो कविता की कजरी आधी अधूरी रह गई थीं पिछले बरस
उसे पर्वतों के बादलों के पेड़ों के झूलों पर झुलते-झुलते
ताल सुर दे, लय छंद दे, कल-कल निनाद बनाएंगे
हल्की-हल्की धूप भी श्रमिक रूप को मुरझाएगी
चहूँ दिशि मस्तानी हवाएँ सरसराएगी
भंवरे, मधुमक्खियाँ और तितलियाँ
रंग-बिरंगे खिले,हरी-भरी लताओं से गले मिले ,
फूलों के पृथ्वी पर, नृत्य पर नृत्य कर, झूमेंगे , झूमेंगे
चूमेंगे, चूमेंगे सुख-दुख भरे जीवन के इंद्रधनुषी तरंग को
उत्साह और उमंग से
सिरजेगें ,सिरजेगें किलकता हुआ शिशुपन...
मिट्टी का कीचड़ हम मजदूर-किसान बनेंगे
बच्चे और बच्चियाँ इन्हीं कीचड़ों में खूब खेलेंगे
दूर-दूर से देशी-परदेशी चिरई – चुरूँग आस लगाकर आएंगे
मेरे कृषक भाई, बहिनी नन्ही-नन्ही कुदालिओं से आलियाँ छाँटेंगे
पथारों की पगडंडी की तरह मेड़ बनाएंगे
हल-बैलों-हेंगिंओं से खेतिओं को मुलायम दही की तरह मह- मह कर
धान रोपने लायक गीली मिट्टी और कीचड़ बनाएंगे
कविता से भी सुंदर, बहुत सुंदर-सुंदर ,पंक्तिबद्ध-पंक्तिबद्ध
क्यारियाँ बनाएंगे
ये धान – रोपनी का सुनहरा मौसम है
इस मौसम में
दिन होगा चाहे रजनी होगी
हाड़-तोड़ की खटनी होगी
पिया गया होगा परदेस मगर
मस्तक पर ओढ़े बदरिला आसमान
चुपचाप धान रोपती उसकी सजनी होगी
बनिहारिन स्त्रियाँ धानों की बिता -बिता भर की
हरियर-हरिहर बीजें
अपने कर्मठ हाथों से उखाड़ेगीं ,बोयेंगी
रसीली,लसीली मिट्टी में
हाथों की उंगलियों को गोद-गोद कर, टप-टप ,टप-टप..
हंस-हंसकर, खिल-खिल कर, मिल-मिल कर
बच्चे बच्चियाँ जवान बूढ़े सब के सब
पंकीली मिट्टी में रोपते जाएंगे, रोपते जाएंगे
गाते हुए धन-रोपनी की लहरें दार गीतें
जीवन का नव-नव रंगरूप रोपते जाएंगे
मन सावन-सावन होता जाएगा
चहूँ ओर हरियाली लहराएगी
हम कीचड़ के बच्चे
हमारी मेहनतकश आत्माएँ
कीचड़ में धरती भर नहाएंगी
झींगुर-दादुर खूब मस्ती में मल्हार गाएंगे
जब तक न खिल जाते धानों में धान
जब तक न सफल हो जाते हमारी मेहनत की धरती से बहे लहू और पसीने और श्रम और प्यार
जब तक न कमल के लह-लह फूल बन जाते
पथारों में रेगिस्तान की तरह समतल, अनंत श्रम के कीचड़
तब तक हरे-हरे धान के पत्तों को
चुप-चुप कर,
छुप-छुपकर, चुग-चुग कर
ये चिरई -चुरूँग खाएंगे!
कि मिट्टी अपना गुण धर्म निभाएंगी
हम मिट्टी के बच्चे नन्हें-नन्हें धान
नीले आसमान में फहरेंगे सयान बनकर एक दिन..!
“जब-जब मेरी माई रोतीं हैं!!!!”
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जब-जब मेरी माई रोतीं हैं
तब-तब
तब-तब
कल- कल ,कल-कल बहती हुई
कपिली – नदी माई भी
चुपचाप -चुपचाप रोतीं हैं
तब-तब,
तब-तब
धीमी धीमी
झीनी झीनी
धरती माई भी
रोतीं हैं
तब -तब
तब -तब
शिवफल -वृक्ष के
शितल छईंयाँ में
बँधाई हुई
छूटकी खुँटियाँ में
उदास नन्हकी बछिया भी
माँ-माँ ,माँ-माँ
बाँ -बाँ , बाँ बाँ चिघरते हूए
रोने लगतीं हैं
तब -तब ,
तब -तब ,
झोपड़ी के मुरेड़ पर बैठी हुई प्यारी चिरईयाँ भी
चिहूँ -चिहूँ , चिहूँ -चिहूँ
रोने लगतीं हैं
और
तब -तब
तब -तब
मैं औरी मोर अनपढी बहिनि भी
माई का लहूलूहान हाथ – पांव के घाव पर
बड़ी ही सनेह के साथ
अपना गर्म और सुंदर हाथ धर -धर के
झर -झर के
डर -डर के
कहंर कहंर के
आह् उउफ से
भर -भर के
मर -मर के
मर -मर के
रोने लगते हैं
रोने लगती हैं
कपिली नदी तट पर की
वंशी सी
आहतम्यी आवाज में बजती हुई
झूरमूठ -बांस -झाड़ियाँ !!!!!!
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(नोट- सभी कविताएँ और ऊपर की तस्वीरें चंद्र के फेसबुक वॉल से ली गई हैं)
विनोद मिश्र
शोधार्थी, भारतीय भाषा केन्द्र
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली




बढ़िया
जवाब देंहटाएंबढ़िया
जवाब देंहटाएंबहुत ही रचना
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