गुरुवार, 30 जनवरी 2020

हमारे इतिहास पर लगी कालिमा
                    - राहुल सांकृत्यायन

आज तक भारत में किसी महान् पुरुष पर उसके विचारों की भिन्नता के लिए ऐसा नृशंस कार्य नहीं किया गया था। बुद्ध ने बहुत ही कड़वी मीठी बातें कही, समाज के कोढ़ों पर गहरा प्रहार किया। किन्तु वह अपना पूरा जीवन बिता कर निर्वाण प्राप्त हुए। महावीर के विचार तत्कालीन समाज के बहुत अंशों में विरोधी रहते हुए भी किसी ने उनके रक्त से अपना हाथ नहीं रंगना चाहा। जो घृणित कार्य हमारे सारे इतिहास में नहीं देखा गया  - हमारी संस्कृति जिससे अपरिचित थी उसकी कालिमा हमारे इतिहास पर लगाई गयी।
गांधी जी की हत्या अत्यंत कायरतापूर्ण कृत्य है। उनका प्राण लेना कोई कठिन काम नहीं था। वह सर्वदा अरक्षित, लाखों की भीड़ में घूमते थे, उन्हें अपने जीवन की परवाह नहीं थी। उन्होंने अपने सारे जीवन के एक एक क्षण का मूल्य चुका लिया था। उनका स्वप्न - भारत की स्वतंत्रता - सत्य हो चुका था। वह कृतकृत्य थे, भारमुक्त थे, उनके हत्यारों ने अपने इस जघन्य काम से क्या लाभ समझा था। हाँ, गाँधी जी की हत्या का पाप केवल गोडसे पर नहीं है, इसके पीछे बहुत से बड़े-छोटे लोग हैं जिनके संकल्पों की भनक महीनों से हमारे कानों में आ रही थी। गाँधीजी और देश के राष्ट्रीय नेताओं की हत्या करके जबरदस्ती राज्य शासन को हाथ में लेने की बातें कितने दिनों से हमारे वायुमंडल में फैली हुई थी। गाँधी जी अपराधियों का क्षमा कर सकते थे किन्तु राष्ट्र क्षमा नहीं कर सकता।

जो नहिं दण्ड करहुँ खल तोरा, भ्रष्ट होहिं सन्मारक मोरा।

गाँधी जी ने जीवन के क्षण-क्षण का मूल्य तो चुका ही लिया, उन्होंने मृत्यु का मूल्य भी बाएँ न जाने दिया। 78 वर्ष का वह निर्बल शरीर, बुद्ध के वचनानुसार रस्सी से बाँधकर चलाये जाते शकट की तरह चल रहा था, कुछ दिन और चल जाता, इसे तो एक दिन विश्राम कर लेना ही था। गाँधी जी ने असाधारण विश्राम लिया। उनकी यह मृत्यु भी जीवन की तरह यशस्वी हुई। जहाँ तक कि उसका गाँधी जी से संबंध है, गाँधी जी वह महान् पुरुष थे जिनका स्थान शताब्दियों में भी पूरा नहीं हो सकता। वह वास्तविक अर्थ में हमारे राष्ट्र के पिता थे, भारत के नये जन्म में उनका सबसे बड़ा हाथ है। भारत अमर है, उसके साथ गाँधी जी अमर रहेंगे। गाँधी जी ने वह रास्ता दिखलाया है, वह प्रदीप हमारे हाथ में दिया है जिससे हम अपना पथ देख सकते हैं। यदि यह न होता उनके सारे जीवन का प्रयत्न निष्फल होता, निर्वाण शय्या पर लेटे हुए बुद्ध की भाँति हमारे राष्ट्रपिता भी चाहते थे।

"अत्तदीपा भवथ,                            अत्तसरणा भवथ"
आप अपने प्रकाश बनो।               आप अपनी शरण बनो।

- सम्मेलन पत्रिका(भाग -35 , संख्या - 4-6, माघ-चैत्र, संवत् -2004-05, पृष्ठ -1-2)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें