रविवार, 10 दिसंबर 2023

कोरोना, हताशा और ज़िंदगी

(कोरोना ने हमें ही नहीं, पूरे देश को तबाह कर दिया था। इस बीच सरकारों का क्रूरतम चेहरा देखने को मिला। ऊँच-नीच की खाईं और ज्यादा स्पष्ट रूप से ज़ाहिर हुई। इस दौरान हम हताश हुए, निराश हुए और अपने कुछ प्रियजनों की असमय अंतिम विदाई भी की। यहाँ जो कुछ कवितानुमा लिखा प्रकाशित हो रहा है उसमें ये सब दिख जाएगा। ये बहुत नकारात्मक माहौल में और बहुत हताश होकर लिखी गई पंक्तियाँ हैं। ये कच्ची कविताएँ हैं और उन्हें और पकाना चाहिए था, पर नहीं हुआ। इसपर फिर से ध्यान देना फिर से उसी यातना से गुजरना होगा। आईंदा इसपर ध्यान न जाये इसलिए यहाँ प्रकाशित करके उस यातना से मुक्ति की कोशिश कर रहा हूँ।)



 (1).

हम कलाओं के इतने प्रेमी थे
कि राजन मिश्र की मृत्यु एक हादसे की तरह थी
और बाकी की जिन्दगी
अगर राम हैं, तो उनके भरोसे

हम संतई के हद तक संत
और लंठई के हद तक लंठ थे
हमें शुभकामनाओं और श्रद्धांजलियों को
एक साथ साधने में महारत हासिल हो गयी थी

हम सूचनाओं के इतने करीब थे
फिर भी संवेदनहीन थे

हम बारिश में मिलने वाले खरबूजे थे
जो बाहर से दिखने में सुंदर
और अंदर से सड़े थे

हम इतने खलिहर और निष्ठुर थे
कि न चाहते हुए भी
'स्वाद-सुख' की अभिजात्यता हमारे स्क्रीन पर आ जाती
और पुष्पेश पंत का हँसमुख चेहरा ही
भुखमरी का कारण लगने लगता था


इस सरकार ने हमें इतना पतित कर दिया था
कि प्यार करने की उम्र में हम
दूसरे मोर्चों पर शिफ़्ट कर दिये गए थे
पूरे देश में पसरे खून से नहाते
और अपनी ही शिनाख़्त करते
एक हतास उम्र काटने को मजबूर थे

हम चाहते
तो दुनिया की पटरी पर आ सकते थे
पर हमारी इच्छाशक्ति पर ही हमले होने शुरू हो गए थे
हमारे सपनों को उसी तरह रौंद दिया गया था
जैसे दिल्ली-पुलिस विरोध-प्रदर्शनों में
अपनी लाठियों से हमारे प्राइवेट पार्ट को निशाना बनाकर रौंदती थी

महँगाई सातवें आसमान पर थी
और हम अपनी ही कब्र खोद रहे थे
नौकरियाँ इतनी कम थी
और हमें पैसों की इतनी जरूरत थी कि
हम चोर उचक्के आतंकवादी जैसे कुछ भी हो सकते थे

इतनी नाउम्मीदी पसरी थी
फिर भी रात में यह सोच के सोते थे कि
सुबह कुछ अच्छा होगा
पर नहीं होता था

मेरे देश का सनकी प्रधानमंत्री
लोकतंत्र को गोबर से नहला रहा होता था
और लोग
इस बात पर बहस करते थे कि यह गोबर
देशी गाय का क्यों नहीं है?

वह एहतियात बरते बिना लोगों से मिलता था
और इधर पुलिस
हमें सिर्फ़ मास्क न लगाने पर ही पीट देती थी
वह दिव्य बनता जा रहा था
और हम खोखले होते जा रहे थे

हम चाहते थे
प्यार की दुनिया
हम चाहते थे
अमन की दुनिया
पर ये दुनिया जो हमें सौंप दी गयी
कहीं से भी हमारे सपनों की दुनिया नहीं थी



               (2).
सुंदर चेहरों पर फासिस्टों की मुस्तैदी देख
मन काँप जाता था
वैसे गीत चतुर्वेदी से भागता रहता था
पर उनकी एक पंक्ति
सपने में पीछे पड़े साँप की तरह पीछा करती रहती थी -
"इतिहास गवाह है
जालिमों को अत्यंत समर्पित प्रेमिकाएँ मिलती हैं"
मेरा एक दोस्त कहता था
ये सच है, यहाँ जो कुछ दिखता है टू-मच है
मैंने देखा है प्रेमियों को, पीटकर
फिर प्रेमिकाओं के गले लिपटते हुए

मैं चुप रहता था
और दूसरी दोस्त से 'समर्पित प्रेमिकाएँ' पर प्रश्नचिन्ह
लगाते तर्कों को गुनता रहता था।

रात होती थी
बिस्तर फैल जाता था और दीवारें और ज्यादा सिकुड़कर
मेरी बात सुनने लगती थी
तकिये मुझे साँस लेने देते थे
और चादर
गले में लिपटकर भी
जिंदा होने के एहसास से भर देती थी
मैं चाहता था पंखे
मेरा शुक्राना ठुकरा दें और मुझे
ठंडा होने दें
पर दीवार के बीचोबीच झूलता
एक 23 बरस का नौजवान
मुझपर हँसने लगने था
और मैं दीवारों से बात करते वक्त हकलाने लगता था

सुबह होते-होते बियाबान हुआ ये मन
बाग में लगे उस लंगड़े आम पर टिक जाता था
जिसके सीने में एक दिल बना कर कोई
आई लव यू लिखकर छोड़ गया था
उसने उस दिल में तीर इतने जतन से घुसाया था
कि उसका ज़ख्म मेरे दिल तक उतर आया था
पर अभी पता चला वो आम भी सूख गया है

सभ्यता के दबाव के चलते
गालियों को मुँह पर सीते-सीते
ये मन अब गालीबाज हो चला था
जब कभी रोने का मन करता
तो उन सीनों से लिपटकर रोना चाहता
पर पता चलता
वह फासिस्टों के लिये धड़क रहा है

फिर यहीं से वापस
नदी-नालों को पार करता ये मन
गाँव की तरफ भागता
जहाँ तालाब आँसुओं से भरे होते थे
घर झगड़े के लिए थे
और कुएँ आत्महत्या के लिए

खेती तो पूरी तरह से सामंतशाही बचाये रखने की
हैसियत से की जा रही थी

वहाँ सम्बन्ध
दुत्कार और चीत्कार के बीच कहीं पेंडुलम बनके झूलता रहता था

पानी की लड़ाई
उसे पीने से ज्यादा बहाने में थी
और आज़ादी
सिर्फ़ गाली देने में

वहाँ भी कुछ नहीं था
सिवाय इसके
कि जी सको मर-मर के

ये मन भन्नाया हुआ फिर वापस आ जाता
जहाँ कहा जाता था कि प्रेम करने की आज़ादी है
और मर जाने की स्वतंत्रता।



             (3).
नाम से ज्यादा एक आईडी नंबर से
पहचाने जाते हुए हम
'शहर अब भी संभावना है'
मानते हुए शहर में घूमते रहे

ये शहर है या ओपी शर्मा का जादू
ठीक-ठीक समझ नहीं आता
अपनी टोपी से हमेशा सफेद कबूतर निकालने वाला ये शहर
सचमुच कितना क्रूर है

ये जादू ही है
जो बाँधे रखता है लोगों को
एक और हादसे के लिए
वो तैयार करता है हमें
एक भयंकर कौतूहल के लिए

ये कौतूहल ही है
जिसे एक पागल ताली पीट-पीटकर देखता है

दूसरा पागल
इसीलिए तैयार है हाथ में पत्थर लिए
जिससे तोड़ दे इस शहर का जादू

तीसरा पागल जिस बिल्डिंग के सामने खड़ा होकर मूत रहा है उसी के एक छोटे से कमरे में
कल रात एक लड़के ने सिर्फ़ इसलिए आत्महत्या कर ली थी कि 4 साल से आयी नहीं नौकरी
जिसके लिए तैयारी करता रहा वह 5 साल

इस (आत्म) हत्या पर कोई नहीं रो रहा

एक लड़की जिसकी उम्र 9 साल थी
और अपना नाम हिना बताती थी
और गुटखा खाती थी
और अपने भाई को कमर पे लटकाए रखती थी
और सड़कों पर गुलाब बेचती थी
गायब हो गयी है
इस शहर की खुशबुओं ने उसे लील लिया

ये शहर सचमुच एक जादू है
जादू...



          (4).
नींद एक ऐसी चिड़िया
जो उड़ गयी थी अपनी शाख से
बहेलिये की तरह घात लगाये सपने
थक गये थे
रात एक बीहड़ जंगल
जिसके अंधेरे में सब कुछ तो नहीं
पर बहुत कुछ दिखता था ऐसा
जिसे नहीं देखना था
जिसे अभी नहीं देखना था
जिसे फ़िलहाल अभी नहीं देखना था...


(मई, 2021)

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