सोमवार, 24 नवंबर 2025

समुद्री रास्ते से भारत आने वाला पहला यूरोपीय एक रूसी था


ये सच है कि समुद्र मार्ग से भारत आने वाला पहला यूरोपीय वास्कोडिगामा नहीं, रूसी यात्री अफ़नासी निकीतिन था। वह रूस के त्वेर शहर (अब कालीनिन) का निवासी था। वह 1466-1472 तक सफ़र में रहा। जिसमें से तक़रीबन तीन साल उसने भारत में बिताये। उसने अपने इस यात्रा के अभूतपूर्व अनुभव को एक पुस्तक में दर्ज़ किया, जिसका नाम है - Voyage Beyond Three Seas. जिसका हिन्दी अनुवाद रादुका प्रकाशन, मॉस्को से 'तीन समुद्र पार यात्रा' नाम से प्रकाशित हुआ है। और ये तीन समुद्र हैं - कैस्पियन सागर, हिन्द सागर और काला सागर। रूस से आते वक़्त वह कैस्पियन सागर और हिन्द सागर के रास्ते आया था, जबकि जाते वक़्त वह हिन्द सागर और काला सागर होते हुए गया। यहाँ एक बात बहुत दिलचस्प है कि वह होर्मुज़ से लेकर भारत तक के सागर को हिन्द सागर कहता है। आज उसे हम ओमान की खाड़ी और अरब सागर कहते हैं। इस क़िताब में उसने सबसे ज़्यादा भारत के बारे में ही लिखा है। यहाँ के लोग, उनका धर्म, उनकी आस्थाएँ, उनके पहनावे, मौसम, फसलें, सब्जियाँ आदि का बहुत सूक्ष्मता से वर्णन है। इसके साथ ही तत्कालीन बहमनी साम्राज्य और विजयनगर राज्य की गतिविधियों को भी दर्ज़ किया है। 


यह किताब कुछ धारणाओं का खण्डन करती है। मसलन -

1. भारत में दास-प्रथा नहीं थी और उनका ख़रीद-फ़रोख़्त नहीं होता था।

2. भारत में बारूद सबसे पहले बाबर के साथ आई और उसने इसे युद्ध में प्रयोग किया।

3. बंदर सिर्फ़ एक जानवर होता है और इनकी सेना नहीं होती।




निकीतिन भले ही तीन साल भारत में रहा, लेकिन वह पूरा भारत नहीं घूम सका। उसके पीछे बहुत से कारण थे। पहला तो यही कि रूस से निकलते ही उसका सब कुछ लूट लिया गया। जैसे-तैसे वो भारत पहुँचा था। दूसरे, वह ईसाई धर्म का कट्टर अनुयायी था। जब यहाँ के सुल्तान और जागीरदारों ने उसे इस्लाम धर्म कबूलने को कहा तो वह किसी तरह उससे बच सका था। इसलिए उसे राजसत्ता से उतनी सहायता नहीं मिल सकी। वह सिर्फ़ आज के महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्से ही जा पाया। उस समय के हिसाब से सिर्फ़ बहमनी सल्तनत में ही उसका रहना हुआ।


वह भारत में समुद्र के रास्ते से पहले-पहल खम्भात पहुँचा था, पर किनारे-किनारे आते हुए सबसे पहले चौल बंदरगाह (महाराष्ट्र) में उतरा था। फिर वहाँ से जुन्नार होते हुए बीदर गया था। भारत की भूमि पर पाँव रखते ही उसने यहाँ के बारे में पहली बात कुछ इस तरह से लिखी  - "और यही भारत देश है, जहाँ लोग नंगे घूमते हैं। स्त्रियाँ खुले सिर और वक्षस्थल पर बिना कोई वस्त्र धारण किये हुए जाती हैं। वे बालों की चोटी करती हैं। अधिकांश स्त्रियाँ माताएँ हैं, वे हर साल बच्चा जनती हैं और उनके कई-कई बच्चे हैं। स्त्री-पुरुष सभी काले हैं। जहाँ कहीं भी मैं जाता था, लोगों का झुण्ड मेरे पीछे लग जाता था और वे मुझ श्वेत आदमी को बड़े आश्चर्य के साथ देखते थे। उनका राजा सिर पर फेटा बाँधता है और धोती पहनता है; उनके जागीरदार गले में दुपट्टा डालते हैं और धोती पहनते हैं; उनकी रानियाँ गले में दुपट्टा डालती हैं और साड़ी पहनती हैं। जहाँ तक राजाओं और जागीरदारों के नौकरों का संबंध है, वे धोती पहनते हैं और अपने हाथों में ढाल और तलवार लिए रहते हैं, जबकि दूसरों के पास भाले, चाकू या कटारें या धनुष और तीर होते हैं। और वे कमर से ऊपर कोई वस्त्र धारण नहीं करते, नंगे पाँव रहते हैं और बड़े हट्टे-कट्टे होते हैं। स्त्रियाँ खुले सिर और वक्षस्थल पर बिना कोई वस्त्र धारण किये जाती हैं। छोटे लड़के-लड़कियाँ सात साल तक बिल्कुल नंगे घूमते हैं।" (पृ. 17-18) और "भारत में परदेशी सरायों में ठहरते हैं और स्त्रियाँ उनके लिए खाना पकाती हैं और वे ही मेहमानों के लिए बिस्तर लगाती हैं। वहाँ जाड़ों में लोग धोती पहनते हैं, कंधों पर चादर डालते हैं और पगड़ी बाँधते हैं। जहाँ तक राजाओं और जागीरदारों का संबंध है, जाड़ों के मौसम में वे चूड़ीदार पायजामा, कमीज़ और खफ्तान पहनते हैं, वे अपने गले में दुपट्टा डालते हैं, कमर में पट्टा और सिर पर फेटा बाँधते हैं।" (पृ. 21)

यह 15 वीं शताब्दी के भारत का चित्र है। जिसमें न सिर्फ़ भारतवासियों के पहनावे को बताया गया है बल्कि समाज में अलग-अलग वर्ग के पहनावे के माध्यम से उनमें अंतर भी दिखाया गया है। स्त्रियों और बच्चों की दयनीय स्थिति है। सिर्फ़ अमीर लोग ही अपने पूरे बदन को ढँक पाते हैं। इसके पीछे गरीबी और सामाजिक स्थिति के साथ ही साथ हो सकता है कि कोई अन्य कारण भी रहा हो। अगर स्त्रियों के वक्षस्थल खुले हैं तो इसके भी गहरे निहितार्थ हैं। नांगेली का प्रसंग याद करिए... एक बात ये भी है कि उस समय में निर्मित की गई स्त्रियों की तमाम मूर्तियाँ अधोवस्त्र ही धारण किये हुए हैं। उनका वक्षस्थल पूरा खुला हुआ है। (ऐसा मैंने बीदर किले के म्यूजियम में रखी मूर्तियों में देखा है)


इसके साथ ही निकीतिन ने बीदर सल्तनत के बारे में ये भी दिखाने का प्रयास किया है - "भूमि पर आबादी का भार अत्यधिक है। किसान बहुत गरीब हैं, लेकिन जागीरदार बहुत अमीर हैं और ऐशोआराम से रहते हैं। वे चाँदी की पालकियों में लाये-ले जाये जाते हैं। उनके आगे स्वर्ण-साज़ों में सज्जित 20 घोड़े और पीछे 300 घुड़सवार, 500 पैदल सिपाही, 10 तुरहीवादक, 10 नगाड़े बजाने वाले और 10 शहनाई वादक चलते हैं।" (पृ. 28-29) गरीबी और अमीरी की खाई आज की बनी हुई नहीं है, यह बहुत पुरानी है। आम मेहनतकश जनता हमेशा से कुछ चंद शासकों के लिए ही अपना खून-पसीना बहाती रही है। उसके श्रम का मूल्य उसे कभी दिया ही नहीं गया। यह निकीतिन की ईमानदारी है कि वो उस दौर की स्थितियों का यथार्थ चित्रण करता है। उसे कम से कम अन्याय होता दिख तो रहा है।


चूंकि ये रूसी यात्री बीदर सल्तनत में ही रहा। उसके लिए बीदर ही पूरा हिंदुस्तान था। उसने उत्तर भारत के बारे में कुछ नहीं लिखा है। सुनी-सुनाई बातें भी नहीं। जबकि उसे बीदर में रहते हुए ये बातें पता थी कि कालीकट, श्रीलंका, बर्मा और चीन में क्या प्रसिद्ध है और वहाँ का रास्ता किस तरफ से होकर जाता है। इतना ही नहीं, वह उनकी दूरी भी बताता है। इसलिए भारत के बारे में उसकी पूरी राय बीदर सल्तनत केंद्रित ही थी। बीदर के बारे में उसने बहुत कुछ लिखा है। जैसे कि - "बीदर मुस्लिम हिंदुस्तान की राजधानी है। यह एक बड़ा शहर है और इसमें बड़ी संख्या में लोग रहते हैं। सुल्तान 20 साल का नौजवान है और शासक खुरासान के राजा और जागीरदार हैं। लड़ाईयों में लड़ने वाले सिपाही भी खुरासानी हैं।" (पृ. 28) यहाँ मुस्लिम हिंदुस्तान इसलिए कहा क्योंकि बीदर के दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य था, जिसके शासक हिन्दू थे। कहीं-कहीं तो वह पूरे भारत का सामान्यीकरण कर देता है। लगता है बीदर ही पूरा भारत है। वह लिखता है - "भारत के सभी राजा खुरासान के हैं और वैसे ही सभी जागीरदार भी।" (पृ. 24) ये बात सच है कि बीदर क्या दिल्ली सल्तनत के भी शासक खुरासान (मध्य-एशिया में स्थित ईरान का भाग) के ही थे। 


वह बीदर के बारे में आगे लिखता है - "बीदर में घोड़े और तरह-तरह की वस्तुएँ बेची जाती हैं : कमख़ाब, रेशम और अन्य सभी वस्तुएँ। काले लोगों का भी क्रय-विक्रय होता है। यहाँ और कोई चीज़ नहीं बेची जाती। और सभी वस्तुएँ देशी हैं। जहाँ तक खाद्य पदार्थों का संबंध है, केवल शाक-सब्जियाँ ही बेची जाती हैं। रूस देश के लिए कोई वस्तुएँ नहीं मिलतीं।" (पृ. 24)


इस विवरण में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है - 'काले लोगों का भी क्रय-विक्रय होता है।' अमूमन ये धारणा प्रचलित है कि पश्चिम के देशों में ही दास-प्रथा थी और दास खरीदे-बेचे जाते थे। लेकिन भारत में ऐसी कोई परम्परा नहीं रही। निकितिन ने ये लिखा है कि वे भी बाज़ार में बिकते थे। यहाँ काले लोगों से आशय अफ़्रीकी जनता से शायद ही रहा हो। क्योंकि एक ज़गह और उसने लिखा है कि विजयनगर के एक छोटे से नगर पर आधिपत्य करने के बाद कैद किये गये बहुत से लोगों को बेच दिया गया था - "जब नगर पर कब्ज़ा हुआ, तो 20 हज़ार स्त्री-पुरुषों को मार डाला गया और 20 हज़ार लोगों और बच्चों को बंदी बना लिया गया। कुछ बंदियों को 10 टके, कुछ को 5 टके और बच्चों को 2 टकों की दर से बेच दिया गया। लेकिन कोई खज़ाना हाथ नहीं लगा। वह बड़े नगर पर कब्ज़ा करने भी असफल रहा।" (पृ. 59) तो ये दास यही हारे हुए लोग थे, जो भारतीय ही थे।


निकितिन बीदर में लंबे समय तक रहा, जो बहमनी सल्तनत की राजधानी थी। ऐसे में वहाँ के सुल्तान और प्रमुख जागीरदार के बारे में लिखने से वैसे चूक सकता था? पहले भी ज़िक्र किया जा चुका है कि सुल्तान बीस साल का नौजवान है। जिसका नाम मुहम्मद शाह तृतीय था। बहमनी सल्तनत के अंतर्गत आने वाले बीदर, गोलकुंडा, बीजापुर आदि क्षेत्रों का शासन सुल्तान द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री/जागीरदार करता था। इसी तरह बीदर इलाके का जागीरदार महमूद गवां था, जिसका लेखक ने मलिकुत्तुज्जार नाम से जिक्र किया है। यह वही महमूद गवां था जिसके नेतृत्व में बहमनी सल्तनत सबसे ज्यादा फैली थी और जिसने बीदर में प्रसिद्ध मदरसे का निर्माण करवाया था। उसके बारे में लेखक ने लिखा है - "बीदर में खुरासानी जागीरदार मलिकुत्तुज्जार रहता है, जिसके पास दो लाख सिपाहियों की फौज़ है।" (पृ. 28) ख़ैर इस पर बात फिर कभी। सुल्तान के बारे में देखिए - "सुल्तान जब मनोरंजन पर जाता है, तो साथ में अपनी माता और बेग़म को भी ले लेता है। उसके साथ 10 हज़ार घुड़सवार और 50 हज़ार पैदल सिपाही तथा सुनहरे कवच पहने 200 हाथी चलते हैं। सुल्तान के आगे 100 तुरहीवादक, 100 नर्तक और स्वर्ण-साज़ में सज्जित 300 खाली घोड़े और उसके पीछे 100 बंदर तथा 100 गौरिकाएँ या दासियाँ चलती हैं।" (पृ. 29) यहाँ आप बंदर पर आकर एक बार रुक गये होंगे, मैं भी रुक गया था। बंदरों का क्या काम भला? लेकिन ये सच है कि ये बंदर सैनिक के रूप में काम करते थे। उनकी ट्रेनिंग होती थी। निकितिन ने एक ज़गह और लिखा है कि बंदरों की अपनी सेना होती थी। उन्हें आदमियों की नकल करना सिखाया जाता था। या ये भी हो सकता है कि ये कोई जनजाति रही हो...


बहरहाल, महल के बारे में देखिए क्या लिखा है - "सुल्तान के महल में सात फाटक हैं; हर फाटक पर 100-100 पहरेदार और 100-100 काफ़िर मुंशी तैनात होते हैं। उनमें से कुछ अंदर आनेवालों और कुछ बाहर जाने वालों का विवरण दर्ज करते हैं। लेकिन परदेशियों को महल में नहीं घुसने दिया जाता। महल बड़ा खूबसूरत है, जिस पर चारों ओर सुनहरी नक्काशी की गई है। महल के एक-एक पत्थर पर बेलबूटे बनाये गये हैं और उन पर बहुत सुंदर ढंग से सोने कलई की गयी है। महल के अंदर तरह-तरह के बर्तन हैं।" (पृ. 29-30)

इन फाटकों को दरवाज़ा कहते हैं। जिसमें से दिल्ली दरवाज़ा, दुल्हन दरवाज़ा मुझे अभी याद आ रहा है। इस विवरण में दो बातें गौरतलब हैं। पहली यह कि हर दरवाज़े पर उस समय हिन्दू मुंशी नियुक्त थे जो आने-जाने वालों की एंट्री दर्ज़ करते थे। जैसा कि विश्वविद्यालय या किसी संस्था में अब भी होता है। दूसरा यह कि महल बहुत खूबसूरत है। वाकई, रंगीन महल तो मैंने देखा है। अद्भुत है। लकड़ी के खम्भों और मेहराबों पर की गई कारीगरी बहुत आकर्षित करती है। दीवार और छत पर रंगीन टाइल्स लगाई गई है और कहीं-कहीं अरबी-फारसी में कुछ लिखा भी गया है।


अब सुल्तान की दिनचर्या पर एक टिप्पणी देखें - "सुल्तान बृहस्पतिवार और मंगलवार के दिन मनोरंजन पर जाता है और उसके साथ तीन वज़ीर भी जाते हैं। सुल्तान का भाई हर सोमवार को मनोरंजन पर जाता है, साथ में उसकी माता और बहन भी जाती हैं। 2000 स्त्रियाँ घोड़े पर सवार होकर या सोने की पालकियों में जाती हैं।" (पृ. 53)

इसी के साथ जुलूस का दृश्य - "मुस्लिम बैराम के दौरान सुल्तान का जुलूस निकला ; उसके साथ 20 वज़ीर और लोहे के कवचों तथा धातु के हौदों से सुसज्जित 300 हाथी थे। प्रत्येक हौदे में तोपों और पुराने ढंग की बंदूकों से लैस छः छः कवचधारी सिपाही और सबसे बड़े हाथी पर 12 सिपाही बैठे हुए थे।" (पृ. 47)


मनोरंजन और जुलूस के अतिरिक्त विजयनगर के एक छोटे से हिस्से पर चढ़ाई का विवरण भी पढ़ें - "मलिकुत्तुज्जार हिंदुओं पर विजय करने के लिए शेख़ अलाउद्दीन स्मृति दिवस - यानी ईश्वर की पवित्र माता की परार्थ-प्रार्थना के रूसी त्यौहार पर - को बीदर से रवाना हुआ। उसके पास 50 हज़ार सिपाहियों की फ़ौज थी। सुल्तान ने 50 हज़ार सिपाहियों की अपनी फ़ौज तथा 30 हज़ार सिपाहियों की एक और फ़ौज के साथ तीन वज़ीरों को भेजा। उनके साथ 100 बख्तरबंद हाथी गये, जिन पर हौदे कसे गये थे और प्रत्येक हाथी पर बंदूकों से लैस चार सिपाही बैठे हुए थे। मलिकुत्तुज्जार विजयनगर के हिन्दू राज्य पर विजय करने के लिए चला था।" (पृ. 54) और "सुल्तान अपनी फ़ौज के साथ आला बैराम के 15 वें दिन मलिकुत्तुज्जार के पास आया और सभी गुलबर्ग में एकत्रित हुए। वे युद्ध में हार गये, उन्होंने एक हिन्दू नगर पर कब्ज़ा कर लिया,लेकिन उनके बहुत से लोग मारे गये और ख़ज़ाने से काफ़ी कुछ खर्च करना पड़ा। हिन्दू राजा बड़ा शक्तिशाली है, उसके पास एक विशाल फ़ौज है और वह विजयनगर के पर्वत पर निवास करता है। उसका नगर बहुत बड़ा है, यह तीन खाइयों से घिरा हुआ है, इसके बीच से होकर एक नदी बहती है; नगर के एक एक ओर जंगल है और दूसरी ओर एक अति सुंदर घाटी। लेकिन मलिकुत्तुज्जार ने हिन्दू नगर पर अधिकार कर लिया और उसने यह शक्ति से, दिन-रात लड़ते हुए किया। उसकी फ़ौज 20 दिन तक बिना खाये-पिये तोपों से नगर का घेरा डाले रही। उसके 5 हज़ार सर्वोत्तम सिपाही मारे गये। " (पृ. 58-59)


इन विवरणों में एक बात ग़ौर करने लायक है - बंदूक और तोप का प्रयोग। मैंने सुना था कि बाबर ने सबसे पहले बारूद-जनित हथियारों का प्रयोग किया। लेकिन बाबर से तकरीबन 50 साल पहले यहाँ उसका ज़िक्र आया है। इतिहासकार बताते हैं कि दक्षिण एशिया में सर्वप्रथम 1368 ई. में बहमनी सल्तनत और विजयनगर साम्राज्य के बीच अडोनी के युद्ध में पहली बार बारूद का प्रयोग हुआ। यह युद्ध मुहम्मद शाह प्रथम और हरिहर द्वितीय के बीच लड़ा गया था। इसके बाद बारूद का इस्तेमाल बहमनी शासकों की सैन्य-दक्षता का सबसे शक्तिशाली प्रमाण के रूप में देखा गया।  


बीदर के बारे में एक-दो छोटे-छोटे विवरण और देखें - "बीदर में पूर्ण चंद्रमा तीन दिन तक रहता है। वहाँ कोई मीठी शाक-सब्जियाँ नहीं मिलती।" (पृ. 49)  दिलचस्प है कि एक रूसी व्यक्ति ऐसा कुछ दर्ज़ कर रहा है। तब तक आज प्रचलित अधिकांश शाक-सब्जियाँ भारत में नहीं आयी थीं। और दक्षिण भारत के जलवायु के अनुरूप की सब्जियाँ उसे बिल्कुल नहीं पसंद आयी होंगी क्योंकि वो एक ठंडे मुल्क़ से आया था।

"बीदर की सड़कों पर 14-14 फुट लंबे साँप रेंगते हैं।" (पृ. 30) इसके साथ ही उसने उल्लू, बन्दर, गाय, बैल, घोड़े पर भी अपनी टिप्पणी दर्ज़ की है।


निकितिन ने हिन्दू और मुसलमान दोनों के बारे में विस्तार से लिखा है। उनका रहन-सहन, उनकी आस्थाएँ, पूजा-पद्धति, उनका व्यवहार आदि उसके बातचीत के प्रमुख केंद्र थे। पहले इस्लाम और मुसलमानों के बारे में उसकी टिप्पणी पढ़ते हैं। भारत में प्रवेश करते ही उसका घोड़ा चोरी हो गया। जब उसने उसे प्राप्त करने के लिए जागीरदार से गुहार लगाई तो उसने इस्लाम धर्म कबूलने को कहा। जागीरदार ने 4 दिन की मोहलत दी कि अगर इसके भीतर वह इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेता है तो वह उसे सिर्फ़ घोड़ा ही नहीं, अशर्फियाँ और अन्य सुविधाएँ भी देगा। मगर किसी तरह वह वहाँ से निकलने में सफल रहा। इस बात के लिए उसे जोख़िम भी उठाना पड़ा। निकितिन ईसाई धर्म का कट्टर अनुयायी था। वह हमेशा डरता रहता था कि कहीं उसका धर्म उससे छूट न जाय। उसने कई ज़गह इस बात का जिक्र किया है कि मैं अपने धर्म का सही से पालन नहीं कर पा रहा, मेरे ईश्वर मुझे क्षमा करना। उसके सब सामान, यहाँ तक कि धार्मिक किताबें भी, भारत आने से पहले ही लूट ली गयी थी। इसलिए वह मुस्लिम तीज-त्यौहार के साथ ही ईस्टर रखता था और उसे इस बात का मलाल रहता था कि वो सही समय और सही दिन पर अपने धार्मिक-कर्मकांड नहीं कर पाता था। इसी कारण से वह ईसा से बार-बार क्षमा माँगते रहता था। तभी वह भारी मन से कहा था -

"इस तरह रूस के मेरे ईसाई भाइयों, तुममें से अगर कोई हिंदुस्तान जाना चाहता है तो तुम्हें अपना धर्म रूस में ही त्याग देना चाहिए और हिंदुस्तान के लिए रवाना होने से पहले मुहम्मद की प्रार्थना करनी चाहिए।" (पृ. 22-23)


जब उसे भारत से वापस लौटना था तब पश्चिमी एशिया में युद्ध शुरू हो गये थे। कई ज़गह तख़्तापलट हो चुका था। जिस रास्ते से वह आया था, उस रास्ते से उसका लौटना मुमकिन न था। इसलिए वह लिखता है - "मक्का के रास्ते जाने का मतलब इस्लाम धर्म का अपनाना होगा। अपने धर्म के कारण ही ईसाई मक्का नहीं जाते, क्योंकि वहाँ उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने के लिए विवश किया जाएगा। और हिंदुस्तान में रहने का मतलब वह सब कुछ खर्च कर देना होगा, जो मेरे पास है, क्योंकि यहाँ हर चीज़ महँगी है। केवल भोजन पर ही मैं रोज़ाना ढाई अल्तीन ख़र्च कर रहा हूँ। जहाँ तक शराब या मध्यासव का संबंध है, मैंने यहाँ उन्हें कभी नहीं पिया।" (पृ. 50-51)


इस्लामी-संस्कृति से उसका परिचय पुराना था, क्योंकि वह पहले भी यात्राएँ कर चुका था। इसलिए उस पर उसने उतनी टिप्पणी नहीं की है जितनी कि हिन्दू संस्कृति पर। हिन्दू-संस्कृति उसके लिए अजूबे की तरह थी। वह उस पर विस्तार से लिखा है। इससे पहले भी कई ज़गह ऊपर के उद्धरणों में इसका उल्लेख हो चुका है, फिर भी और देखें - "मैं बीदर चालीसे तक ठहरा। वहाँ मैंने अनेक हिंदुओं से परिचय किया और उन्हें बताया कि मैं ईसाई हूँ न कि मुस्लिम और कि मेरा नाम अफ़सानी या मुस्लिम भाषा में ख्वाज़ा युसूफ़ खुरासानी है। इसके बाद उन्होंने मुझसे न तो अपना खान-पान, व्यापार, पूजापाठ या और कोई चीज़ को छिपाया और न ही अपनी पत्नियों को।" (पृ. 30-31) यानी वहाँ के हिंदुओं के लिए ईसाई धर्म बिल्कुल नयी चीज़ थी। इसलिए उन्होंने लेखक से कुछ छिपाया नहीं। मुसलमानों से हिन्दू अछूत जैसा व्यवहार करते थे। 

आगे उसने लिखा - "भारत में कुल 84 धर्म पाये जाते हैं और वे सब लोग बुत पर विश्वास करते हैं और अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ खान-पान नहीं करते, न ही अंतर्जातीय विवाह करते हैं। कुछ लोग माँस, मुर्ग़े-मुर्गियाँ, मछली और अंडे खाते हैं, लेकिन किसी भी धर्म के लोग गाय का माँस नहीं खाते।" (पृ. 31) यहाँ धर्म से आशय हिन्दू धर्म में प्रचलित 84 सम्प्रदाय से है। लेकिन दिलचस्प बात है कि वो उनमें व्याप्त छुआछूत और अंतर्जातीय विवाह-निषेध को भी दिखाता है। उनके खान-पान और गाय को लेकर उनकी मान्यता को भी। लेकिन एक जगह उसने कुछ लोगों द्वारा माँस-भक्षण की बात को काटते हुए लिखा है कि हिन्दू बिल्कुल माँस नहीं खाते - "हिन्दू बिल्कुल माँस नहीं खाते - वे न तो गाय, बकरे, मुर्गे-मुर्गियों का माँस खाते हैं, न ही मछली और सुअर का माँस, हालांकि सुअर बड़ी संख्या में मिलते हैं। वे दिन में दो बार खाना खाते हैं और रात के समय कुछ नहीं खाते। वे न तो शराब और न ही मध्यासव पीते हैं। वे मुस्लिमों के साथ खान-पान नहीं करते। उनका भोजन रूखा-सूखा होता है और वे एक-दूसरे के साथ खाना नहीं खाते, यहाँ तक कि अपनी पत्नियों के साथ भी खाना नहीं खाते।वे चावल और घी के साथ खिचड़ी और तरह-तरह की जड़ी-बूटियाँ खाते हैं, जिन्हें वे दूध और घी में पका लेते हैं। वे दाएँ हाथ से खाते हैं, बाएँ हाथ से खाने की कोई चीज़ नहीं छूते। वे छुरी का इस्तेमाल नहीं करते, चम्मच के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। यात्रा करते समय वे खाना पकाने के लिए एक हंडिया अपने साथ ले लेते हैं। वे हँड़िये को ढँककर रखते हैं ताकि मुस्लिम उसमें रखे खाने को देख न सकें। और यदि खाने पर किसी मुस्लिम की नज़र पड़ जाएगी, तो उसे हिन्दू नहीं खाएगा।" (पृ. 34)


हिंदुओं के पूजा-पद्धति और संस्कार पर ये टिप्पणी देखें - "वे रूसी ढंग से पूर्व की ओर मुँह करके प्रार्थना करते हैं; वे साष्टांग योग से पूजा करते हैं। खाना खाने से पहले वे अपने हाथ-पैर और मुँह धो लेते हैं। उनके बुतखाने में कोई दरवाज़े नहीं होते और बुतखानों का रुख़ पूर्व की ओर होता है। जब कोई मरता है, तो वह उसका दाह-संस्कार करते हैं और भस्मी को नदी में प्रवाहित कर देते हैं। जब स्त्री बच्चे को जन्म देती है तो उसका पति ही बच्चे को प्राप्त करता है। पुत्र का नाम पिता द्वारा और पुत्री का नाम माता द्वारा दिया जाता है। मिलते या विदा लेते समय लोग संन्यासियों की भाँति झुककर दोनों हाथों से चरणस्पर्श करते हैं।" (पृ. 35)


नीचे की टिप्पणी में जो पर्वत आया है, शायद इससे आशय तिरुपति का है या ऐसी किसी जगह का जहाँ बहुतायत में मंदिर हैं। जहाँ पत्थरों पर मूतियाँ उकेरी गई हैं। जहाँ गुफ़ा-मंदिर है और हर साल वहाँ मेला लगता है। 

"चालीसे के दौरान वे अपने बुत की पूजा करने के लिए पर्वत जाते हैं। मुस्लिम भाषा में यह उनका यरुशलम या मक्का है। वहाँ आने वाले पुरुष केवल अधोवस्त्र और स्त्रियाँ केवल धोती पहने हुए होती हैं। कुछ स्त्रियाँ मोतियों की मालाएँ और नीलमणियाँ, सोने के कंगन और अपनी-अपनी राशियों की अंगूठियाँ भी पहने हुए होती हैं। लोग बैलों पर सवार होकर बुतखाना जाते हैं। बैलों के सींगों पर पीतल मढ़ा होता है और उनकी गर्दन में 300 छोटी-छोटी घंटियों की मालाएँ बांधी जाती हैं। तथा उनके पैरों में नाल लगे होते हैं। वे गाय को माता कहते हैं। वे गोबर के उपले बनाते हैं। यह उनका धर्मसार है। वे रविवार और सोमवार को दिन में केवल एक बार ही भोजन करते हैं।" (पृ. 35-36)

वहीं का एक और विवरण देखें - "बुतखाने आने वालों की संख्या 20 हज़ार और कभी-कभी 1 लाख तक पहुँच जाती है। बुतखाने में बुत पत्थर का और बहुत बड़ा है; उसकी पूँछ कंधे से लगी हुई है और उसका दायाँ हाथ कुस्तुन्तुनिया के सम्राट जुस्टिनियन की भाँति अभयदान की मुद्रा में ऊँचा उठा हुआ है। वह अपने बाएँ हाथ में भाला पकड़े हुए है। उसके शरीर पर अधोवस्त्र के अलावा कुछ नहीं है। उसका चेहरा बन्दर का है। अन्य बुत बिल्कुल नंगे हैं और उनकी पत्नियाँ भी एकदम नंगी हैं और वे अपने बच्चों के साथ हैं। बुत के सामने काले पत्थर का नंदी है, जिस पर सोने की कलई की गई है। वे नंदी का खुर चूमते हैं और उस पर फूल चढ़ाते हैं। बुत पर भी फूल चढ़ाया जाता है।" (पृ. 33) इसके साथ ही वह इस पवित्र स्थल पर मुंडन कराने की प्रथा को बताता है।


अब कुछ व्यापार पर की गई टिप्पणियों को देखें - "मैं कुछ मुसलमानों के बहकावे में आ गया; उन्होंने मुझ से कहा था कि वहाँ वस्तुओं का बाहुल्य है, लेकिन मैंने पाया कि वहाँ हमारे देश में काम आने वाली कोई चीज़ नहीं है। सभी चुंगी-मुक्त वस्तुएँ केवल मुस्लिम देश के लिए हैं। काली मिर्च और रंग-रोगन सस्ते हैं। कुछ लोग अपनी वस्तुएँ समुद्र से ले जाते हैं, अन्य लोग वस्तुओं पर कोई चुंगी नहीं अदा करते। लेकिन वे हमें अपनी वस्तुओं को बिना चुंगी के नहीं ले जाने देंगे। चुंगी बहुत ऊँची है और इसके अलावा समुद्र में बहुत से लुटेरे हैं। और सभी लुटेरे काफ़िर हैं, वे न ईसाई हैं न मुस्लिम; वे पत्थर की मूर्तियों की पूजा करते हैं और ईसा को बिल्कुल नहीं मानते।" (पृ. 23)

उसने अपने देश में मुस्लिम सौदागरों से भारत देश की तारीफ़ सुनी थी। यहाँ आकर पहले-पहल तो उसे निराशा हुई। मुस्लिम शासन होने के नाते एक ग़ैर-मुस्लिम (ईसाई) व्यापारी को वो छूट प्राप्त नहीं थी, जो मुस्लिम सौदागरों को प्राप्त थी। एक बात और उसने बताया कि जितने भी समुद्री लुटेरे हैं सब हिन्दू हैं। रूस जैसे ठंडे देश के लिए और उनकी संस्कृति के अनुसार यहाँ वस्तुओं का न मिलना स्वाभाविक ही था। मसालों को छोड़कर यहाँ अधिकतम वस्तुएँ विलासिता की ही थीं। जिनका अन्य मुस्लिम देशों में बहुत आदर था। फिर भी आगे उसकी धारणा टूटती है और वह यहाँ के बारे में लिखना शुरू करता है - "वहाँ एक स्थान - एल्लन्दु में शेख अलाउद्दीन का मक़बरा है, जहाँ हर साल मेला लगता है। वहाँ भारत देश के कोने-कोने से लोग आते हैं और दस दिन तक वस्तुओं का क्रय-विक्रय करते हैं। यह बीदर से 12 कोस है। वहाँ लगभग 20 हज़ार घोड़े और अन्य सभी वस्तुएँ बिक्री के लिए लायी जाती हैं। यह हिंदुस्तान का सबसे बढ़िया मेला है।" (पृ. 25-26) यह स्थान बीदर में है और अब भी यहाँ मेला लगता है।

नील, लाख और हीरे के बारे में वह लिखता है -"गुजरात में नील और लाख तथा खम्भात में कोर्नेलियन पैदा होता है। रायचूर में नये या पुराने हीरों की खुदाई होती है। हीरे की बिक्री प्रति पोच्का पाँच रूबल की दर से होती है। यदि हीरा बहुत अच्छा होता है, तो वह प्रति पोच्का दस रूबल की दर से बिकता है। लेकिन नये हीरे का एक पोच्का का मूल्य पाँच कनी, काले हीरे का मूल्य चार से छः कनी और सफ़ेद हीरे का मूल्य एक टंका होता है। हीरों की खुदाई चट्टानी क्षेत्रों में होती है। नये हीरों की खानें प्रति हस्त-परिमाण 2000 स्वर्ण पौंड तथा पुराने हीरों की खानें 10000 स्वर्ण पौंड की दर से बेची जाती हैं। हीरे की खानें सुल्तान के नौकर मलिक ख़ान के अधिकार में हैं और यह बीदर से तीस कोस की दूरी पर है।" (पृ. 42-43) और "गुलबर्ग से मैं कुलुर गया, जहाँ कोर्नेलियन की खुदाई और तैयारी होती है और बाद में इसे दुनिया के विभिन्न भागों में भेजा जाता है। कुलुर में 300 हीरा-कर्मी काम करते हैं, वे हथियारों को सजाते हैं। कुलुर में मैं पाँच महीने रहा और वहाँ से गोलकुंडा गया, जहाँ एक बहुत बड़ा बाजार है।" (पृ. 59-60)


मसालों पर देखें - "कालीकट हिन्द सागर के तट पर एक विशाल बंदरगाह है और यहाँ से गुज़रने वाले जलपोत को भगवान बचाये! इससे आगे जाने वाला कोई भी व्यक्ति समुद्र को सही-सलामत ढंग से नहीं पार कर सकेगा। यहाँ काली मिर्च, अदरक, जायफ़ल, दालचीनी, लौंग और मसाले तथा तरह-तरह की जड़ी-बूटियाँ पैदा होती हैं। यहाँ वस्तुएँ बहुत सस्ती हैं। दास-दासियाँ काले और बहुत अच्छे हैं।" (पृ. 40) शुरुआती पंक्ति में वह हिन्द महासागर के बारे में बात कर रहा है। क्योंकि उधर स्थल-क्षेत्र नहीं है और उस समय तक आगे सब कुछ अज्ञात था।


आगे उसने लिखा है - "श्रीलंका में बंदर, लालमणियाँ, स्फटिक तथा कालीकट में काली मिर्च, जायफ़ल, लौंग, सुपारी और रंग-रोगन पाये जाते हैं।" (पृ. 42) और "श्रीलंका हिन्द सागर में एक बड़ा बंदरगाह है। वहाँ आदम एक ऊँचे पर्वत पर खड़ा हुआ था। श्रीलंका के निकट मूल्यवान पत्थर, माणिक्य, स्फटिक, गोमेदक, डामर, बेरिल और एमरी पाये जाते हैं। वहाँ हाथी पाले जाते हैं और हस्त-परिमाण के अनुसार बेचे जाते हैं ; शुतुरमुर्ग तौल कर बेचे जाते हैं।"( पृ. 40) माना जाता है कि श्रीलंका के किसी पहाड़ पर एक बहुत बड़े पैर का निशान है और वह पूज्य है। इसमें उसी का ज़िक्र है।


विदेशों से वस्तुओं के आदान-प्रदान का उसने उल्लेख किया है - "खम्भात बंदरगाह से जलपोत हिन्द सागर में सभी दिशाओं में जाते हैं। खम्भात में वस्तुओं का बाहुल्य है : वहाँ अलाचा (फारस का दुरंगा कपड़ा), ताफ़्ता, ऊन के मोटे कपड़े, नील, लाख, कार्नेलियन और लौंग भी मिलते हैं। धाबुल एक बड़ा बंदरगाह है और वहाँ मिस्र, अरब, खुरासान, तुर्की और पुराने होर्मुज़ से घोड़े लाये जाते हैं। यहाँ से बीदर या गुलबर्ग पहुंचने में एक महीना लगता है।" (पृ. 39-40)


भारत आने-जाने के लिए सबसे प्रमुख बंदरगाह होर्मुज़ था। निकितिन भी उसी जगह से होकर ही भारत आया था। वह उसके बारे में भी लिखता है- "होर्मुज़ एक बड़ा बंदरगाह है। यहाँ दुनिया के सभी भागों के लोग आते हैं और इसके बाज़ार में सभी वस्तुएँ उपलब्ध हैं। पृथ्वी पर जो कुछ भी पैदा होता है, वो होर्मुज़ में मिल सकता है। लेकिन चुंगी अत्यधिक - वस्तु का दसवाँ भाग है।" (पृ. 39)


निकितिन भारत में रहा तो तकरीबन तीन बरस, लेकिन वह भारत घूम नहीं पाया। फिर भी वह भारत के समुद्री मार्ग से होने वाले व्यापार को और उन जगहों को भी चिन्हित किया है। वह कालीकट, श्रीलंका, बर्मा, चीन नहीं गया लेकिन वहाँ के बारे में लिखा है। यह सब उसने भारत के सौदागरों से सुनी होंगी। ऐसे ही उसने शाबात नाम की ज़गह का जिक्र किया है। जो शायद गोवा या बंगाल में कोई जगह हो। उसने उसके बारे में लिखा है - "यहूदी शाबातियों को अपना मानते हैं, लेकिन यह सही नहीं है। शाबाती न तो यहूदी हैं, न मुस्लिम और न ही ईसाई। उनका अपना अलग एक हिन्दू सम्प्रदाय है। वे यहूदियों और मुस्लिमों के साथ खान-पान नहीं करते, न ही मांस खाते हैं। शाबात में सभी चीजें बहुत सस्ती हैं और वहाँ रेशम और शक्कर बनाये जाते हैं जो बहुत सस्ते हैं।" (पृ. 43)


अंत में बस यही कहना है कि अफ़नासी निकितिन पहला यूरोपीय यात्री था, जो समुद्र-मार्ग से भारत आया था। यहाँ आकर उसने बीदर के इलाके में तकरीबन तीन बरस बिताये। यहाँ के लोग और उनकी संस्कृति के बारे में उसने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। पर अफ़सोस कि भारत से वापस लौटते वक़्त अपने देश के करीब पहुँचते-पहुँचते ही उसकी मृत्यु हो गई। लेकिन उसकी किताब सुरक्षित रही और आज भारत के बारे में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में हमारे सामने उपस्थित है। अफ़नासी निकितिन की इस यात्रा के ऊपर भारत और रूस के परस्पर सहयोग से ख्वाज़ा अहमद अब्बास ने परदेशी (1957) फ़िल्म भी बनाई थी। जिसमें अन्य किरदारों के अलावा पृथ्वीराज कपूर और नरगिस ने भी अभिनय किया है। थोड़ी रोमांटिसाइज करती हुई पर अपने दौर के हिसाब से अच्छी फिल्म है।


कुल मिलाकर ये किताब पठनीय है। पतली-सी किताब है। मध्यकालीन दक्षिण भारत को समझने के लिए इसमें बहुत-सी सामग्री है। समय मिले तो ज़रूर पढ़ें।

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