बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

जीवन के अंतिम वर्षों में गाँधी की वैचारिक सफलता-असफलता को व्यक्त करती सुधीर चंद्र की किताब - गाँधी : एक असंभव संभावना
               _विनोद मिश्र


गाँधी का जिक्र दोनों तरफ से होता रहा है - उनके तथाकथित अनुयायियों की तरफ से भी और उनके धुर विरोधियों की तरफ से भी। एक तीसरा पक्ष भी साथ-साथ चलता है जो उनसे काफी हद तक असहमत होते हुए भी आज के संदर्भों में उनको सकारात्मक रूप से याद करता है। गाँधी को एक तबका मुसलमानों का हितकारी एवं हिंदुओं का अशुभचिंतक बताता है और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी किसी भी भूमिका को नकारता है। अहिंसा, सत्याग्रह, चरखे से आजादी का मजाक उड़ाता है। ऐसी स्थिति में गाँधी इनपर क्या सोचते थे, खासकर अपने अंतिम वर्षों में, इसको दिखाती है सुधीर चंद्र की किताब 'गाँधी : एक असम्भव सम्भावना'।
आजादी के इतने वर्ष बाद आज भी लोग गाँधी को प्रासंगिक बनाने लगते है। वहीं आजादी के समय गाँधी की प्रासंगिकता कितनी बची थी, उसको टटोलती है ये किताब। हत्या के दो- सवा दो वर्ष पहले गाँधी के आदर्श एवं उनका नेतृत्व कैसे आमजनमानस में अलग-थलग होता गया, उनकी जिजीविषा जो 125 साल की थी, क्यों शिथिल पड़ गई और अपने अंत की कामना करने लगी, एक आशावादी व्यक्ति कैसे दुखों के गुबार से गुजरने लगा, अनशन के दौरान वे अपनी लोकप्रियता घटने के बावजूद दंगे शांत कराने में कितने सफल हुए, इन सब सवालों को ध्यान में रख यह किताब लिखी गई है। सबसे खास बात कि ये किताब कहीं आपको निष्कर्ष या निर्णय प्रदान करती नहीं दिखती , बल्कि एक बहस को सामने रखती प्रतीत होती है। एक ऐसी बहस जो हमेशा समकालीन रहेगी।

सुधीर चंद्र के ही शब्दों में, "यह किताब सीधे-सीधे उस अंत - कह लें गाँधी के आखिरी दो-सवा दो साल के बारे में तो है ही जब उन्हें अपने तीस साल के किये-धरे पर पानी फिरता नजर आने लगा। एक त्रासद अंत जब वह रोज-ब-रोज अपने दुःख की गाथा सुनाने लगे सरेआम।" यही आदमी जो पहले 125 साल जिंदा रहकर भारत के लोगों की सेवा करना चाहता था और मृत्यु से कभी नहीं डरता था, उस समय मृत्यु की कामना करने लगा। इसलिए कि उससमय पूरब से लेकर पश्चिम तक भारत दंगे की आग में जल रहा था और गाँधी के पूरे सपने चकनाचूर हो रहे थे और उनकी बात कोई नहीं सुन रहा था, यहाँ तक कि कांग्रेस भी नहीं।अक्टूबर-नवम्बर 1945 में गाँधी और नेहरू के बीच भारत के भविष्य से संबंधित पत्र-व्यवहार हुआ था।जिसमें गाँधी ने अपने सपनों के भारत के रूप में हिंद-स्वराज के अनुसार आजाद भारत बनाने की बात की थी, लेकिन नेहरू इसको सिरे से अवास्तविक कहते हुए नकार दिये थे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से अलग बड़ी-बड़ी मशीनों की आवश्यकता और आधुनिकता के प्रयोग पर बल दे रहे थे। इसके साथ ही आजाद भारत का स्वप्न अभी परिस्थिति के अनुकूल न मानकर बाद में प्रतिनिधियों द्वारा तय करने की बात कही थी। यहाँ तक कि इसी से संबंधित गाँधी के एक पत्र का उन्होंने जवाब भी नहीं दिया था। जबकि गाँधी इसी पत्र में नेहरू को अपना वारिस बताते हैं। इसे ही लेखक ने गाँधी के पराभव का निर्णायक क्षण कहा , जब उनके उसूलों पर पहली बार उनके वारिस नेहरू द्वारा सीधे चोट की गई। इन्हीं पत्रों में गाँधी को यह कहने कि आवश्यकता महसूस हुई कि 'हमें अब एक दूसरे को समझ लेना चाहिए।'इन्हीं पत्रों में नेहरू ने गाँधी के हिंद-स्वराज के जवाब में कहा कि 'इसे अपनाना तो दूर, कांग्रेस ने इसपर कभी विचार ही नहीं किया।' गाँधी के ऊपर सबसे बड़ा प्रहार यही था कि जैसा भारत वह चाहते थे देश की कर्णधार कांग्रेस पार्टी उससे तनिक भी सहमत नहीं थी। 


इसके बाद गाँधी के दुःख का सिलसिला शुरू होता है, यद्यपि वह पहले भी था लेकिन इस बार उनके दुःख का सबसे बड़ा कारण था -अहिंसा की विफलता यानी कि उनकी पूरी साधना की विफलता।इसके साथ ही इससमय तक देश का बँटवारा हो चुका था, कस्तूरबा गाँधी एवं उनके पंचम पुत्र कहे जाने वाले महादेव देसाई की मौत हो चुकी थी, कांग्रेस ही नहीं जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल भी उनसे दूरी बनाने लगे थे, हिंदू और मुसलमान दोनों गाँधी को गालियाँ दे रहे थे और इस भयानक दंगे के लिए दोनों उनको एकतरफा और गैरजिम्मेदार व्यक्ति घोषित कर रहे थे, उनपर कट्टरपंथी हिंदुओं की तरफ से हमले भी हो चुके थे। ये घटनाएं उनको और भी दुखी कर रही थी। अब तो उन्हें यह बात सामने लगी थी कि अब तक उनके नेतृत्व में आंदोलन चला, वह सत्याग्रह नहीं था। अगर वह सत्याग्रह होता तो अहिंसा के बाद हिंसा कैसे जन्म लेती? यानी वे हृदय-परिवर्तन करने में बुरी तरह असफल हो गये थे। उन्हें अब लगने लगा था कि लोगों ने जबरन हिंसा को दबाया था अब समय मिलने पर वह फूट पड़ा है। वे इसे नहीं पहचान पाये थे। इसके बावजूद उन्हें अब भी विश्वास था कि दंगे तभी स्थायी रूप से रूक सकेंगे जब लोगों के सोचने का तरीका बदलेगा, उनका हृदय-परिवर्तन होगा। इसी लिए वे शांति स्थापना के लिए पुलिस या फौज को उतना जरूरी नहीं मानते थे, जितना कि लोगों के विचारों को बदल कर शांति बनाई जा सके।

गाँधी पाकिस्तान के कारण कुछ लोगों द्वारा याद किये जाते हैं। लेखक ने इस पुस्तक में स्पष्ट किया है कि गाँधी ने बंटवारे को हमेशा ही नकारा है। कांग्रेस ने जब 3 जून 1947 को पाकिस्तान बनने की औपचारिक घोषणा की तो गाँधी उससे असहमत थे और उन्होंने उसका विरोध किया। लेकिन बाद में वे बुझे मन से सहमत हो गये। वो कहते थे कि 'अगर तमाम गैर-मुस्लिम लोग मेरे साथ में हों तो मैं हिंदुस्तान के टुकड़े न होने दूँगा।' लेकिन तमाम हिंदू भी दंगे को देखकर एवं अपनी राजनीति के चलते पाकिस्तान बनाने के पक्ष में थे। गाँधी ने पहले ही कह दिया था 'एक दिन था उनकी सब मानते थे, लेकिन आज उनकी कोई नहीं सुनता।' इसलिए वे बँटवारे की अनिवार्यता मानने के बावजूद, मानते थे कि हमारे दिलों के बँटवारे न होने पाये। हम जहाँ भी रहें शांति से प्रेमपूर्वक रहें। इसके लिए गाँधी ने ज्यादा जोर दिया, जो उससमय की जरूरत भी थी। लेकिन वह कितने सफल हुए ये बाद की बात है। उन्होंने इसके लिए अनशन किया और उस दौरान दंगे तो बंद हो गये। लेकिन क्यों बंद हुए, उनके अनशन के प्रभाव में आकर। नहीं। यह हृदय-परिवर्तन नहीं था लेखक ने इसे 'इमोशनल-ब्लैकमेल' माना है। जिसे गाँधी ने समझने की कोशिश नहीं की, और जब वो थोड़ा जानने लगे तभी उनकी हत्या कर दी गई। याद रहे लेखक ने एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु पर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है वह है - गाँधी के अनशन पर बैठने से भारत में दंगे की कमी जो हुई  उसके पीछे गाँधी की 'इमोशनल-ब्लैकमेलिंग' थी, जिसे वे खुद नहीं समझ सके थे। लेकिन पाकिस्तान में भी काफी हद तक दंगे कम हुए, उसके पीछे उनकी अहिंसा की नीति थी। यानी कि उन्होंने शांति बनाने का निर्णय किसी दबाव में नहीं लिया था, वे स्वयं गाँधी से प्रभावित होकर ऐसा किये। इसके विपरीत भारत में कई लोग मजबूर किये गये थे, जिसमें हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी था। इसके साथ ही यहाँ के मुसलमानों के प्रतिनिधि भी किसी भीतरी दबाव से दस्तख़त करने को राजी हुए थे।

कुल मिलाकर वह गाँधी जो अपने सत्याग्रह के चलते लोगों के दिलों में उतरते थे, उनका अस्तित्व अब गायब होने के कगार पर आ गया था। उनकी इन गहनतम पीड़ाओं में कोई साथ देने को तैयार न था। वे असहाय थे लेकिन अपने बूते तक शांति कायम करने एवं दिलों के जोड़ने के पक्ष मेें अग्रिम पंक्ति में खड़े थे।

यह पुस्तक इसलिए अनूठी बन जाती है कि यह उस दौर के गाँधी को उनके ही प्रवचनों एवं भाषणों के माध्यम से सामने रखती है, जिस दौर में वे ऐसी मानसिक त्रासदी को झेलने के लिए बाध्य हुए और लोगों का सहयोग भी न मिला। उनके सिद्धांत और आदर्श उनके ही आँखों के सामने बिखर गये। लेकिन फिर भी दंगे रोकने में काफी हद तक सहायक भी हुए। 

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